लोकतंत्र के मंदिर में काला साया

भारत की संसद, जिसे लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच कहा जाता है, बुधवार को एक बार फिर विवादों की आग में घिर गई। चुनाव सुधारों पर बयान देते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा चुनाव आयोग के संदर्भ में प्रयोग किया गया

Dec 12, 2025 - 18:55
Dec 12, 2025 - 19:57
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लोकतंत्र के मंदिर में काला साया

लोकतंत्र के मंदिर में काला साया

कुनाल जायसवाल

भारत की संसद, जिसे लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच कहा जाता है, बुधवार को एक बार फिर विवादों की आग में घिर गई। चुनाव सुधारों पर बयान देते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा चुनाव आयोग के संदर्भ में प्रयोग किया गया अनुचित शब्द संसद की गरिमा पर चोट की तरह माना जा रहा है। बाद में वह शब्द रिकॉर्ड से हटा दिया गया, लेकिन घटना का असर अब भी राजनीतिक और संवैधानिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

संसदीय इतिहास में कई कलंक… और अब एक नया प्रसंग

भारत के संसदीय इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जिन्हें याद कर आज भी लोकतंत्र का सिर झुक जाता है—

संसद पर हुआ आतंकी हमला

सदन में नोटों की गड्डियाँ लहराई जाना

सांसद दानिश अली के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग

नए संसद भवन में युवकों द्वारा धुआँ छोड़ना


इन सबके बाद अब गृहमंत्री की टिप्पणी को भी इस पंक्ति में जोड़ा जा रहा है। विडंबना यह है कि इस बार गलती किसी नए या अनुभवहीन नेता ने नहीं, बल्कि देश के सबसे शक्तिशाली मंत्रियों में शामिल अमित शाह ने की है।

अमित शाह: सत्ता, रणनीति और विवाद का नया अध्याय

अमित शाह ने बीते एक दशक में भाजपा के भीतर और राष्ट्रीय राजनीति में असाधारण ऊँचाइयाँ हासिल कीं। भाजपा अध्यक्ष रहते हुए चुनावी रणनीति निर्माण से लेकर 2019 के बाद गृहमंत्री के रूप में मजबूत प्रशासनिक पकड़—इन सभी ने उनके कद को बढ़ाया।कई लोग उन्हें “आधुनिक चाणक्य” भी कहते हैं, लेकिन इस घटना ने उस छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं।सवाल यह है कि—एक अनुभवी, रणनीतिक और प्रभावशाली नेता से संसद में ऐसी चूक कैसे हो सकती है?

विपक्ष का विरोध और आधा-अधूरा प्रायश्चित

राहुल गांधी, गौरव गोगोई सहित कई विपक्षी सांसदों ने इस टिप्पणी पर तुरंत आपत्ति जताई। उस पर अमित शाह ने आसंदी से शब्द हटाने का अनुरोध तो किया, परंतु

न पछतावा दिखा

न गलती के लिए स्पष्ट माफी

न मर्यादा के प्रति संवेदनशीलता

यह रवैया कई संसदीय विशेषज्ञों की चिंता बढ़ाता है।

मर्यादा क्यों घट रही है? भाजपा पर सवाल और मीडिया की चुप्पी

संसद में गरिमा बनाए रखना हर सांसद का दायित्व है। परंतु हाल के वर्षों में—

निम्नस्तरीय टिप्पणियाँ

व्यक्तिगत हमले

झूठे आरोप

राजनीतिक लाभ के लिए सदन का उपयोग

इन सबमें तेजी आई है।प्रधानमंत्री मोदी भी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और रेणुका चौधरी के खिलाफ विवादित टिप्पणियाँ कर चुके हैं। यही राजनीतिक शैली अब सामान्य होती जा रही है।

मीडिया भी इस विषय पर लगभग मौन है।अगर यही घटना किसी विपक्षी सांसद ने की होती, तो शायद इसे “संसद का अपमान” बताकर कई दिन तक टीवी स्टूडियो में शोर मचाया जाता।

टीवी बहसों का असर संसद पर?

जब से टीवी न्यूज चैनलों पर

हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण,

चीख-पुकार,

बहसों में अपशब्द,

पैनलिस्टों के बीच हाथापाई

सामान्य हो गई है—ऐसा लगता है जैसे वही माहौल अब संसद तक पहुँचने लगा है।यह लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेत है।

अगर विपक्ष करता तो?

सवाल यह भी है कि—अगर इसी प्रकार का शब्द विपक्ष का कोई सांसद उपयोग करता, तो क्या उस पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती?क्या स्पीकर ओम बिड़ला उन्हें तुरंत नसीहत नहीं देते?जब राहुल गांधी ने अपनी बहन के गाल खींचे थे, तब सदन की मर्यादा की बात की गई थी।फिर इस मामले में वही कड़ाई क्यों नहीं दिखाई गई?

संसद—लोक की जगह, लोकलाज के साथ

संसद में बहसें हों, आरोप लगें, राजनीतिक मतभेद हों—यह लोकतंत्र की आत्मा है।परंतु—अपशब्द, तिरस्कार, व्यक्तिगत टिप्पणी और गरिमा का ह्रास—यह लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है।

देश की जनता अपनी कमाई से सांसदों को यह मंच देती है।
उन पर सुविधाएँ देती है, सम्मान देती है, अपेक्षाएँ रखती है।
यदि सदन में कार्यवाही की जगह अपमानजनक शब्द सुनाई दें, तो यह जनता के प्रति धोखा है।

अब जरूरी है गंभीर समीक्षा

अमित शाह की टिप्पणी एक घटना भर नहीं है—यह चेतावनी है किअगर हम अभी नहीं जागे तो संसद का स्तर और नीचे जा सकता है।

विपक्ष, सत्ता पक्ष, मीडिया और नागरिक—सबको मिलकर यह तय करना होगा किसंसद की गरिमा किसी भी राजनीतिक लाभ से ऊपर है।

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