अराजकता का नया नाम: मोदी शासन की प्रशासनिक विफलता

देश के कई हिस्सों में बीते दिनों जिस किस्म की भागदौड़, भ्रम और हड़बड़ी दिखाई दी, उसे सामान्य स्थिति बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। लोग सड़कों पर उतरकर जवाब मांगते नज़र आए—ऐसा माहौल आमतौर पर प्राकृतिक आपदा या किसी राष्ट्रीय संकट में दिखता है।

Dec 8, 2025 - 19:35
Dec 9, 2025 - 14:04
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अराजकता का नया नाम: मोदी शासन की प्रशासनिक विफलता

अराजकता का नया नाम: मोदी शासन की प्रशासनिक विफलता

गिरीश नारायण

देश के कई हिस्सों में बीते दिनों जिस किस्म की भागदौड़, भ्रम और हड़बड़ी दिखाई दी, उसे सामान्य स्थिति बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। लोग सड़कों पर उतरकर जवाब मांगते नज़र आए—ऐसा माहौल आमतौर पर प्राकृतिक आपदा या किसी राष्ट्रीय संकट में दिखता है। लेकिन यह दृश्य अब मोदी शासन में एक सामान्य प्रवृत्ति बनता जा रहा है।

2014 में जब नरेंद्र मोदी दिल्ली की सत्ता में आए, तो “गुजरात मॉडल” को मानो चमत्कारिक विकास का प्रतीक बताकर प्रचारित किया गया। ऐसा प्रतीत कराया गया कि मोदी के नेतृत्व में गुजरात साधारण राज्य नहीं, बल्कि दक्ष प्रशासन और अद्भुत प्रबंधन का नमूना था। प्रधानमंत्री ने देश को भी उसी तरह का “बिना भ्रष्टाचार, बिना दोष, हर तरह विकसित” भारत बनाने का वादा किया था।लेकिन 2025 की देहरी पर खड़े देश की वास्तविकता इससे कोसों दूर है।

बीते दिनों शीतकालीन सत्र से पहले प्रधानमंत्री ने फिर वही पुरानी पंक्तियाँ दोहराईं—“मजबूत शासन, नीति की स्पष्टता, कुशल प्रशासन।” इन शब्दों को सुनकर ऐसा लगता है मानो प्रधानमंत्री किसी ऐसी दुनिया में रहते हों, जहाँ वास्तविकताओं की गूंज पहुँचती ही नहीं। अगर वे ज़मीन की स्थिति देखते, तो कम से कम हवाई अड्डों पर फैले भारी अव्यवस्था पर अफसोस ज़रूर जताते। लेकिन गलती स्वीकार करना शायद अब भी अकल्पनीय है।

तीन कार्यकाल, तीन बड़े फैसले—और हर बार राष्ट्रीय अव्यवस्था

मोदी सरकार के तीनों कार्यकालों का इतिहास देखें तो मनमाने निर्णयों ने जनता को ही सबसे ज्यादा झटके दिए—

2016 – नोटबंदी: पूरे देश में दहशत, बैंक और एटीएमों पर अफरा-तफरी।

2020 – अचानक लॉकडाउन: करोड़ों मजदूर सड़कों पर, रोजगार ध्वस्त, अनिश्चितता चरम पर।

2025 – एसआईआर नीति पर बिहार से शुरू अराजकता: अब वही स्थिति 12 राज्यों में फैलती दिख रही है।


इन्हीं घटनाओं की श्रृंखला में अब हवाई यात्रा का संकट जुड़ गया है।

हवाई संकट: बिना तैयारी का नियम, और देशभर में ठप उड़ानें

इंडिगो, जो देश की सबसे बड़ी एयरलाइन है, पिछले पाँच दिनों से अव्यवस्थित है—
हजारों उड़ानें रद्द या घंटों विलंबित।

कारण?डीजीसीए का नया एफडीटीएल (Flight Duty Time Limitation) नियम, जिसमें पायलटों और क्रू को पर्याप्त विश्राम देने की अनिवार्यता शामिल है।कागज़ पर यह नियम उचित है—लेकिन बिना तैयारी के लागू कर दिया गया।नतीजा, इंडिगो के पास पर्याप्त पायलट व्यवस्था नहीं थी और उसे बड़े पैमाने पर उड़ानें रद्द करनी पड़ीं।

जब स्थिति हाथ से निकल गई तो

नागरिक उड्डयन मंत्री बैठक बुलाते हैं,

इंडिगो को नियमों में ढील दी जाती है,

और किराए आसमान छूने पर मंत्रालय तत्काल किराया नियंत्रण लागू करने की घोषणा करता है।

लेकिन यह “उपचार” तब शुरू हुआ, जब लाखों यात्री पहले ही फँस चुके थे।

संसद में सवाल, सड़कों पर गुस्सा—और एकाधिकार की बहस

इंडिगो संकट संसद में भी उठा।राहुल गांधी ने कहा कि—“यह इस सरकार के एकाधिकार मॉडल का नतीजा है। कीमत हमेशा आम नागरिक ही चुकाते हैं।”

वे जिस “मैच फिक्सिंग” का जिक्र करते हैं, वह राजनीति और कॉरपोरेट के अस्वस्थ समीकरण की ओर संकेत है।
देश की संपत्ति, संसाधन और बाजार कुछ चुनिंदा हाथों में केंद्रित होना अब नई वास्तविकता बन चुका है।

अखिलेश यादव भी चेतावनी दे चुके हैं—“अगर उद्योगपति सरकार से ज्यादा शक्तिशाली हो जाएं, तो शासन नागरिकों के नहीं, पूँजी के हित में चलने लगता है।”

कांग्रेस के आरोप सीधे और कठोर

कांग्रेस ने केंद्र से पूछा—

क्या उड्डयन मंत्री इस संकट की जिम्मेदारी लेंगे?

जब जनवरी 2024 में नियम जारी हुए थे, तो पालन सुनिश्चित क्यों नहीं किया गया?

एयरलाइन पर निगरानी विफल क्यों रही?

कांग्रेस ने आरोप लगाया किइंडिगो की प्रवर्तक कंपनी इंटरग्लोब और भाजपा के बीच चुनावी बॉन्ड के जरिए अत्यधिक वित्तीय लेनदेन हुआ है।सवाल उठा—क्या इसी नज़दीकी के कारण एयरलाइन को अभूतपूर्व छूटें दी गईं?

न्यायिक हस्तक्षेप और जनता का अधिकार

इंडिगो संकट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई है। इसमें तर्क दिया गया है किलगातार उड़ान रद्दीकरण नागरिकों के मौलिक अधिकार—जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21)—का उल्लंघन है।

अब अदालत इस पर क्या रुख अपनाती है, यह महत्वपूर्ण होगा।लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इन चार–पांच दिनों की अव्यवस्था ने हजारों नहीं, लाखों लोगों को वास्तविक पीड़ा पहुंचाई है, और उनका न्याय मिलना आवश्यक है।

आखिरी सवाल—क्या यह “नया भारत” यहीं तक सीमित है?

एक देश जिसके नागरिक बार-बार

नोटबंदी,

लॉकडाउन,

प्रशासनिक गलतियों,

नीति की गफलतों,

और कॉरपोरेट प्रभाव
का खामियाजा भुगतते रहें—

क्या उसे वास्तविक विकास की राह पर माना जा सकता है?

मुद्दा सिर्फ एक एयरलाइन का नहीं है—मुद्दा प्रशासनिक दूरदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सम्मान का है।और इस मामले में मोदी सरकार की तस्वीर बेहद धुंधली दिखती है।

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