बिहार : नई सियासी बिसात और बदलते समीकरण
बिहार की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी है। विधानसभा चुनाव में मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब निगाहें मतगणना के परिणामों पर टिकी हैं।
बिहार : नई सियासी बिसात और बदलते समीकरण
संजय राय
बिहार की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी है। विधानसभा चुनाव में मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब निगाहें मतगणना के परिणामों पर टिकी हैं। राजनीतिक दलों के दावे और सर्वेक्षणों के अनुमान के बीच राज्य की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। अधिकांश सर्वेक्षणों के अनुसार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को सत्ता में बढ़त मिलती दिखाई दे रही है, जबकि महागठबंधन ने इन सर्वेक्षणों को निराधार बताते हुए अपने पक्ष में नतीजों का विश्वास जताया है।
हालांकि, मतदान के बाद के सर्वेक्षण (एग्जिट पोल) हमेशा सटीक साबित नहीं हुए हैं। 2015 और 2019 के चुनावों में भी बिहार के मतदाताओं ने सर्वेक्षणों को गलत ठहराया था। फिर भी यह तथ्य भी नकारा नहीं जा सकता कि इस बार के आंकड़े महज अटकलें नहीं, बल्कि बदलते जनमत का संकेत हैं।
राजद के भीतर असंतुलन की दरार
बिहार के राजनीतिक परिदृश्य का सबसे रोचक पक्ष राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भीतर की स्थिति है। लालू प्रसाद यादव की विरासत को आगे बढ़ाने वाले दोनों पुत्र — तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव — अब दो अलग दिशाओं में जाते दिख रहे हैं। तेजस्वी जहाँ खुद को आधुनिक और विकासमुखी नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, वहीं तेजप्रताप का रुख परंपरागत राजनीति की ओर अधिक झुका हुआ है।
राजद के भीतर यह दोहरी नेतृत्व स्थिति पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। संगठन के कई पुराने नेता अब खुलकर एक पक्ष का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ अंदर ही अंदर मतभेद बढ़ा रहे हैं। यही आंतरिक असंतुलन विरोधियों के लिए अवसर बन गया है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस्वी बनाम तेजप्रताप संघर्ष ने न केवल संगठन की एकता को कमजोर किया है, बल्कि विपक्षी वोट बैंक में भी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। इससे लाभ स्वाभाविक रूप से राजग को मिलता दिख रहा है।
बदलता जनमत और नया मतदाता वर्ग
इस चुनाव की एक और बड़ी विशेषता यह रही कि युवा मतदाता और पहली बार वोट डालने वाले नागरिकों ने राज्य के मुद्दों को लेकर नई सोच के साथ मतदान किया। बेरोजगारी, शिक्षा, उद्योग और पलायन जैसे मुद्दे अब जातीय राजनीति के ऊपर छा गए हैं।
युवाओं का झुकाव अब उन दलों की ओर है जो विकास, रोजगार और पारदर्शिता की बात कर रहे हैं। यही कारण है कि भाजपा और जदयू ने अपने प्रचार अभियान में तकनीकी शिक्षा, निवेश और रोजगार सृजन को मुख्य केंद्र बनाया, जबकि विपक्ष का फोकस पुरानी सरकारों की विफलताओं पर रहा।
राजग की संभावित बढ़त और विपक्ष की चिंता
सर्वेक्षणों में राजग को स्पष्ट बहुमत के आसार बताए जा रहे हैं। यदि परिणाम इसी दिशा में आते हैं, तो यह संकेत होगा कि बिहार के मतदाता अब स्थायित्व और विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। नीतीश कुमार की “सुशासन” छवि और केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ ग्रामीण वोटरों तक पहुंचा है।
वहीं, महागठबंधन के लिए यह चुनाव आत्ममंथन का समय साबित हो सकता है। पार्टी के भीतर मतभेद, संगठनात्मक कमजोरी और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व की कमी ने इसकी जड़ों को कमजोर किया है। कांग्रेस भी इस गठबंधन में अपने अस्तित्व की तलाश में है।
चुनाव बाद की संभावनाएँ
अगर परिणाम सर्वेक्षणों के अनुरूप रहे, तो बिहार की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करेगी। राजग को जहां अपनी सरकार की नीतियों को और प्रभावी बनाना होगा, वहीं विपक्ष को आत्मविश्लेषण की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
ऐसे में यह भी संभव है कि हार के बाद विपक्ष फिर से ईवीएम या चुनाव आयोग पर आरोप लगाए, लेकिन मतदाता अब परिपक्व हो चुका है — वह देख और समझ रहा है कि गलती कहाँ है।
बिहार की राजनीति अब विरासत की नहीं, प्रदर्शन की राजनीति बन चुकी है। जनता अब यह नहीं देखती कि कौन किस परिवार से आता है, बल्कि यह देखती है कि कौन उसके जीवन में बदलाव ला सकता है।राजग यदि सत्ता में लौटता है, तो यह जीत केवल राजनीतिक दलों की नहीं, बल्कि उस जनमत की होगी जो स्थिरता और विकास की ओर बढ़ना चाहता है।
बिहार ने हमेशा बदलाव की राह खुद तय की है — और इस बार भी वही कर रहा है।राजनीति की यह नई सुबह बताती है कि जनता की अदालत में कोई वंश नहीं, केवल काम ही जीतता है।
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