गोवा अग्निकांड : जिम्मेदारी की राख में दबे असली अपराधी कौन?
गोवा के बैगातोर इलाके में स्थित रोमियो लेन नाइट क्लब में शनिवार रात लगी आग ने जो 25 जानें छीन लीं, वह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्ट व्यवस्था और ढीली सुरक्षा मानकों का खौफनाक आईना है।
गोवा अग्निकांड : जिम्मेदारी की राख में दबे असली अपराधी कौन?
मनोज वत्स
गोवा के बैगातोर इलाके में स्थित रोमियो लेन नाइट क्लब में शनिवार रात लगी आग ने जो 25 जानें छीन लीं, वह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्ट व्यवस्था और ढीली सुरक्षा मानकों का खौफनाक आईना है। जहां हर साल करोड़ों पर्यटक दुनिया भर से आते हैं, वहीं इतनी बड़ी सुरक्षा चूक ने पूरे गोवा पर्यटन मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हादसे की रात: लापरवाही की परतें खुलती गईं
आग लगने के समय क्लब के अंदर लगभग 150 लोग मौजूद थे। मरने वालों में ज्यादातर क्लब के कर्मचारी थे — असम, बंगाल, झारखंड, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल से आए युवा, जो बेहतर रोजगार की तलाश में गोवा पहुंचे थे। इनके साथ पांच पर्यटक भी इस त्रासदी का शिकार बने, जिनमें दिल्ली के एक ही परिवार के चार सदस्य शामिल थे।
मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सुबह घटनास्थल पहुंचकर जांच के आदेश दिए और ‘दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा’ जैसे बयान दिए, लेकिन उसी समय तक असली आरोपी देश छोड़कर निकल चुके थे।
क्लब मालिक देश से कैसे भाग गए?
क्लब के मालिक सौरभ और गौरव लूथरा पर सीधा आरोप है। एफआईआर भी दर्ज हुई, लेकिन कार्रवाई का वक्त आया तो दोनों शनिवार देर रात ही देश से निकल गए।सबसे चौंकाने वाली बात—7 दिसंबर की सुबह 5:30 बजे दोनों इंडिगो की सीधी फ्लाइट से फुकेत जा चुके थे, जबकि गोवा पुलिस उसी दिन शाम को दिल्ली पुलिस से लुकआउट नोटिस जारी करने की मांग कर रही थी।
यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या गोवा प्रशासन को आरोपी के भागने की भनक तक नहीं लगी, या फिर यह भागदौड़ जानबूझकर देर से शुरू की गई?
अब पुलिस इंटरपोल की मदद लेने की तैयारी में है, मगर पिछले अनुभव साफ इशारा करते हैं कि भगोड़ों को वापस लाने में सरकारों का रिकॉर्ड बेहद कमजोर रहा है—विजय माल्या, नीरव मोदी, ललित मोदी, मेहुल चोकसी जैसे नाम इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं।
थाईलैंड क्यों? क्योंकि भागना आसान था
थाईलैंड भारतीयों के लिए वीज़ा-ऑन-अराइवल वाला देश है, इसलिए भागने में कोई बाधा नहीं आई। फुकेत अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र है, जहां किसी भारतीय का भीड़ में खो जाना बेहद आसान होता है।
इसके अलावा लूथरा बंधुओं का होटल और क्लब बिजनेस भारत के अलावा चार देशों में फैला है, जिससे उन्हें वहां मदद मिलना भी संभव है।
संधि होने के बावजूद प्रत्यर्पण आसान नहीं
भारत और थाईलैंड के बीच 2015 की प्रत्यर्पण संधि जरूर है, लेकिन वापस लाने के लिए भारत को गंभीर अपराध, ठोस सबूत और उचित न्यायिक प्रक्रिया को साबित करना होगा। विदेशी अदालतें मानवाधिकारों और केस की गुणवत्ता को परखकर ही फैसला करती हैं।
यानी पहले लूथरा भाइयों का लोकेशन मिलना है, फिर लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी।
अवैध निर्माण का अड्डा बना क्लब
रोमियो लेन क्लब उस इलाके में बनाया गया था, जो सीआरजेड (Coastal Regulation Zone) के तहत आता है—जहां निर्माण की अनुमति ही नहीं होती।
फिर भी:
क्लब बन गया
क्लब चलता रहा
हजारों लोग यहां आते रहे
प्रशासन चुप रहा
क्लब की छत लकड़ी की थी, और शो के दौरान चलाए गए इलेक्ट्रिक पटाखों की चिंगारियों से आग तेजी से फैल गई। क्लब में सिर्फ एक प्रवेश–निकास रास्ता था, इसलिए लोग बेसमेंट की ओर भागे और दम घुटने से मौत का शिकार हो गए।दमकल की गाड़ियां भी 400 मीटर पहले ही रुक गईं, क्योंकि वहां पहुंचने की सड़क बेहद संकरी थी।
सिर्फ मैनेजर गिरफ्तार—असल गुनहगार कौन?
पुलिस ने अब तक क्लब के जनरल मैनेजर, गेट मैनेजर, बार मैनेजर और अन्य कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है।
लेकिन क्या यह असली दोषी हैं?
अवैध निर्माण किसने अनुमति दी?
किसने जांच रिपोर्ट दबाई?
किसने सालों से आंखें मूंदे रखीं?
किसने सीआरजेड नियमों का उल्लंघन रोकने में ढिलाई बरती?
जब मालिक विदेश भाग गए, कर्मचारी जेल में हैं और प्रशासन बचाव की मुद्रा में है, तो असली जिम्मेदारी आखिर किस पर है?
राजनीतिक जवाबदेही से बचना आसान नहीं
गोवा सरकार और भाजपा प्रशासन के लिए यह सवाल बेहद असहज है कि इतने बड़े हादसे के बावजूद क्या सिर्फ नीचे के स्तर के कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर बात खत्म कर दी जाएगी?क्या 25 मौतों के बाद भी सत्ता पक्ष केवल औपचारिक बयानबाजी कर अपना दायित्व खत्म मान सकता है?
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