भारत रूस की मित्रता और विश्व राजनीति
विभिन्न प्रकार की जटिलताओं को साधना वास्तव में विश्व राजनीति के लिए बड़ा कठिन होता है। विशेष रूप से तब जब दो देश पर मित्रता रखते हुए विश्व शक्ति के रूप में जाने जाते हों ,तब उन दोनों में से कोई सा एक अवश्य ही अहंकारी हो सकता है
भारत रूस की मित्रता और विश्व राजनीति
विभिन्न प्रकार की जटिलताओं को साधना वास्तव में विश्व राजनीति के लिए बड़ा कठिन होता है। विशेष रूप से तब जब दो देश पर मित्रता रखते हुए विश्व शक्ति के रूप में जाने जाते हों ,तब उन दोनों में से कोई सा एक अवश्य ही अहंकारी हो सकता है और दूसरे को गिराने की चेष्टा कर सकता है।
परंतु रूस ने भारत के साथ कभी ऐसा करने का कुटिल प्रयास नहीं किया। भारत से तो ऐसी अपेक्षा ही नहीं की जा सकती कि वह अपने मित्र के हितों को नजरअंदाज कर अपने हितों को वरीयता प्रदान करे। भारत ' कम खाने और गम खाने' में विश्वास करता है। वह मित्र के लिए उदार होना जानता है। यहां तक कि एक बार शत्रु को भी छोड़ना अपना धर्म मानता है। पिछले लगभग 8 दशकों में संसार की राजनीति ने विभिन्न प्रकार के तनाव देखे हैं। पिछड़े युग से प्रगति के नए युग में प्रवेश करती हुई दुनिया को देखा है। परंतु इन सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि विश्व ने भारत और रूस को मित्रता को पूरी ईमानदारी के साथ निभाते हुए भी देखा है। दोनों देशों ने एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया है और जहां आवश्यकता पड़ी है वहां पर विश्व मंचों पर भी एक दूसरे का साथ देने का अपना प्रण बार-बार निभाया है।
रूस ने पहले दिन से कश्मीर समस्या को लेकर संयुक्त राष्ट्र में भारत का साथ दिया है तो भारत ने भी चाहे यूक्रेन-रूस युद्ध हो या उससे पहले की इसी प्रकार की कोई जटिल स्थिति रही हो प्रत्येक अवसर पर अपनी मित्रता को अच्छे ढंग से निभाने का सफल प्रयास किया है। अपनी इसी परंपरागत मित्रता के प्रति वचनबद्ध होकर दोनों देशों ने अभी एक बार फिर अपनी मित्रता का इतिहास रचा है। जब दोनों देशों के शीर्ष पुरुष नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में 5 दिसंबर को आयोजित किए गए 23 वें वार्षिक भारत रूस शिखर सम्मेलन में मिले हैं। 27 घंटे की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की इस यात्रा ने अमेरिका सहित कई देशों की श्वासों को मानो अटका दिया था। जब अमेरिका का राष्ट्रपति ट्रंप भारत को आंखें दिखा रहा था और टैरिफ लगाकर भारत को धमकाने की कोशिश कर रहा था, तब रूस ने अपने मित्रता पूर्ण आचरण से अमेरिका को यह दिखा दिया था कि वह भारत के साथ खड़ा है।
भारत ने भी अमेरिका की धमकियों की चिंता न करते हुए उसे यह आभास करा दिया कि 2025 के भारत को अमेरिका किसी भी स्थिति में डरा नहीं सकता। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने प्राणों की भी चिंता न करते हुए अमेरिका को दिखा दिया कि भारत आज भी श्री कृष्ण जी के महाभारत में दिए गए उस उपदेश पर विश्वास करता है जिसमें कहा गया है कि आत्मा अजर और अमर है। इसे शस्त्र काट नहीं सकता, पानी गला नहीं सकता और आग जला नहीं सकती। इसलिए डरने की कोई बात नहीं। अमेरिका ने हर प्रकार से फन मारकर देख लिया, परंतु वह भारत को अपने संकल्प से डिगा नहीं सका। अब भारत ने रूस के राष्ट्रपति को बुलाकर और उनका स्वागत सत्कार कर अमेरिका को फिर दिखा दिया है कि उसकी कूटनीति कितनी जबरदस्त है और वह बदले हुए परिवेश में किस प्रकार एक विश्व शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है ?
भारत और रूस दोनों मिलकर आज ऊर्जा भू राजनीतिक, उभरती तकनीकों , व्यापारिक विविधीकरण और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा निर्धारित करने की स्थिति में आ गए हैं। आज अनेक देश ऐसे हैं जो भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहे हैं। वह समझ चुके हैं कि कल का विश्व भारत का विश्व होगा। भारत ने अपने मित्र रूस के साथ होने वाली इस शिखर वार्ता के लिए पूरा 'होमवर्क' किया था। रूस की टीम भी पूरा 'होमवर्क' करके बैठी थी। पहले से सारी तैयारी करके रखी गई थी। उसी का परिणाम रहा कि जो कुछ संदेश दोनों देशों को मिलकर विश्व राजनीति को देना था, उसमें वह दोनों सफल हुए। दोनों देशों ने स्पष्ट कर दिया कि उनके राष्ट्रीय हितों के बीच में मित्रता एक सेतु का कार्य करती है। उसमें कोई स्वार्थ नहीं है बल्कि दोनों एक दूसरे के प्रति ' गुंजाइश' रख कर चलते हैं। यह विश्व राजनीति का एक ऐसा खुला गवाक्ष है जो दूसरे देशों के लिए भी प्रेरणादायक हो सकता है । अमेरिकी चीन प्रतिद्वंद्विता हम सबके सामने हैं। इसी प्रकार से नाटो देशों की पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता ने भी हम सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है ।
इन सबसे स्पष्ट होता है कि ये मित्र होकर भी एक दूसरे के विरुद्ध कोई ना कोई ऐसा घातक कार्य करते रहते हैं जो मित्र के लिए अशोभनीय होता है। दोनों देशों ने यह स्पष्ट किया है कि वह 2030 तक भारत रूस आर्थिक सहयोग कार्यक्रम के अंतर्गत व्यापार ,ऊर्जा उर्वरक, तकनीकी नवाचार, समुद्री अवसंरचना , श्रम गतिशीलता, रणनीतिक उद्योगों में साझेदारी को निरंतर गतिशील बनाए रखने पर अपना कार्य करते रहेंगे। दोनों देशों के इस प्रकार के आर्थिक समझौते ने डॉलर वर्चस्व को चुनौती देने का निर्णय लिया है। जिससे अमेरिका की रातों की नींद हराम हो गई है। अमेरिका जिस प्रकार से सारी दुनिया को आर्थिक गुलामी के दौर में ले जाने के लिए क्रियाशील रहा है, अब वह अपनी नीतियों पर विचार करने के लिए विवश हो गया है । भारत रूस की इस मित्रता से परेशान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की छटपटाहट देखी जा सकती है।
हमारा मानना है कि भारत और रूस दोनों को मिलकर अपनी नीतियों में संसार भर के गरीब, पिछड़े, दलित, शोषित लोगों के विकास और कल्याण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जितना ही इन दोनों देशों की नीतियां इस प्रकार के वर्गों के उत्थान पर केंद्रित होगी, उतना ही उन्हें जनसमर्थन अधिक मिलेगा। अभी भी अनेक देश ऐसे हैं, जिनके पास विकास की किरण नहीं पहुंची है। तब कल्पना की जा सकती है कि यदि अनेक देश ऐसे हैं जिनके पास विकास की किरण नहीं पहुंची है तो संसार में ऐसे लोग कितने होंगे जो अभी विकास की किरण के लिए तरस रहे हैं ? विकास की किरण का अभिप्राय केवल भौतिक चकाचौंध नहीं है, उनके दिलों में झांक कर देखने की आवश्यकता है, जहां पर घुप्प अंधेरा है। उनके दिलों को ज्ञान के प्रकाश से भरने के लिए भारत को अपने मित्र रूस के साथ मिलकर पहल करनी चाहिए।
जिस प्रकार लोगों ने संप्रदाय के आधार पर अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाकर इन शोषित उपेक्षित लोगों का शोषण किया है, उस पर केवल भारत ही अपनी वैदिक संस्कृति के मानदंडों और सिद्धांतों के आधार पर पार पा सकता है।
डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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