संसद में नई राजनीतिक स्क्रिप्ट: इतिहास और राष्ट्रवाद के सहारे ध्रुवीकरण का बड़ा खेल

संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने जिस तरह वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने का मुद्दा उठाकर चर्चा कराई, उसने भारतीय राजनीति में एक नए चरण की शुरुआत का संकेत दे दिया है।

Dec 9, 2025 - 17:24
Dec 9, 2025 - 18:34
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संसद में नई राजनीतिक स्क्रिप्ट: इतिहास और राष्ट्रवाद के सहारे ध्रुवीकरण का बड़ा खेल

संसद में नई राजनीतिक स्क्रिप्ट: इतिहास और राष्ट्रवाद के सहारे ध्रुवीकरण का बड़ा खेल

कुनाल जायसवाल

संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने जिस तरह वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने का मुद्दा उठाकर चर्चा कराई, उसने भारतीय राजनीति में एक नए चरण की शुरुआत का संकेत दे दिया है। लंबे समय से भाजपा पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन अब यह रणनीति सीधे धार्मिक पहचान के बजाय राष्ट्रवाद की चमकदार परत पहनकर सामने आ रही है।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब पुरानी बहसें—मंदिर-मस्जिद, पहचान और समुदाय—एक बड़े “राष्ट्रवादी” फ्रेम में पेश की जा रही हैं, जहाँ विरोध करने वाला व्यक्ति स्वतः ही “राष्ट्रविरोधी” ठहराया जाने लगता है। यह तरीका अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह भावनाओं को उकसाता है और तार्किक बहस को किनारे धकेल देता है।

सत्र छोटा, समस्याएँ बड़ी—और बहस इतिहास पर!

शीतकालीन सत्र इस बार बेहद छोटा है। पहले ही कई घंटे हंगामे में जा चुके हैं। ऐसे में देश जिन वास्तविक संकटों से जूझ रहा है—

प्रदूषण

इंडिगो एयरलाइन के कारण लाखों यात्रियों की असुविधा

दिल्ली में आतंकी हमला

महंगाई, बेरोजगारी

युवाओं में बढ़ती आत्महत्याएँ

किसानों की समस्याएँ उन पर चर्चा की उम्मीद की जा रही थी।

लेकिन इसके बजाय सरकार ने संसद का समय वंदे मातरम् पर ऐतिहासिक बहस के लिए तय कर दिया। पहली बार किसी गीत पर इतने विस्तृत राजनीतिक भाषण सुने गए।

इतिहास का चयनात्मक पुनर्लेखन

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण ने स्पष्ट कर दिया कि यह बहस मात्र स्मरणोत्सव नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। उन्होंने कांग्रेस, नेहरू और विभाजन की राजनीति को केंद्र में रखते हुए बार-बार ऐसे संदर्भ दिए जो लंबे समय से भाजपा के नैरेटिव का हिस्सा रहे हैं।

लेकिन इस बहस से कई महत्वपूर्ण तथ्य गायब रहे—

आज़ादी के संघर्ष में आरएसएस की भूमिका नगण्य थी।

वी.डी. सावरकर द्वारा अंग्रेजों से माफी माँगने की ऐतिहासिक घटनाएँ दर्ज हैं।

हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने कई प्रांतों में साथ मिलकर सरकारें चलाई थीं।

1947 को संविधान सभा में वंदे मातरम् का गायन कांग्रेस सरकार में ही हुआ था।

इन तथ्यों को नजरअंदाज़ कर कांग्रेस को विभाजन का दोषी ठहराने की कोशिश की गई।

अब निशाना बंगाल चुनाव

स्पष्ट संकेत है कि केंद्र में खड़ी यह बहस पूरी तरह बंगाल की राजनीति से जुड़ी हुई है।पिछले दो चुनावों के दौरान—

कभी भाजपा ने सुभाष बोस की विरासत को उभारा,

कभी टैगोर का सहारा लिया,

कभी “घुसपैठ” और NRC को बड़ा मुद्दा बनाया।

हुमायूं कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद की नई नींव का विवाद,

और वंदे मातरम् को लेकर संसद में उठा तूफान—दोनों सीधे बंगाल के 2026 चुनावी समीकरण से जुड़े हैं।

क्योंकि वहाँ ध्रुवीकरण से भाजपा को सबसे ज़्यादा राजनीतिक लाभ की उम्मीद रहती है।

संविधान असली लक्ष्य?

जब सरकार लगातार

किसान आंदोलन के कारण पीछे हटती है,

किसी ऐप की अनिवार्यता खत्म करनी पड़ती है,

या किसी संशोधन को समिति के पास भेजना पड़ता है,
तो यह संविधान द्वारा दी गई लोकतांत्रिक शक्ति ही है जो जनता को आवाज़ देती है।

भाजपा के आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रवाद के नाम पर की जा रही यह बहस उसी ताकत को कमजोर करने की कोशिश है—ताकि सवाल उठाने वाले को राष्ट्रविरोधी ठहराना आसान हो जाए।

अब विपक्ष की अग्निपरीक्षा

स्थिति जितनी संवेदनशील है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी।अगर विपक्ष ने इस नए राजनीतिक खेल को समझकर संगठित रूप से मुकाबला नहीं किया, तो ध्रुवीकरण की यह लहर आने वाले वर्षों में और गहरी हो सकती है।

सवाल केवल चुनावी रणनीति का नहीं—सवाल है कि क्या भारत अपनी लोकतांत्रिक आत्मा और संविधान की मूल भावना को बचा पाएगा?

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