मुफ्तखोरी की राजनीति और भारत की अर्थव्यवस्था

भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक नई प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है—मुफ़्त योजनाओं का आकर्षण। कभी इसे ‘रेवड़ी संस्कृति’ कहा गया, तो कभी ‘लुभावने वादों की राजनीति’।

Sep 29, 2025 - 18:23
Sep 29, 2025 - 19:48
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मुफ्तखोरी की राजनीति और भारत की अर्थव्यवस्था

मुफ्तखोरी की राजनीति और भारत की अर्थव्यवस्था

संजय राय

भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक नई प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है—मुफ़्त योजनाओं का आकर्षण। कभी इसे ‘रेवड़ी संस्कृति’ कहा गया, तो कभी ‘लुभावने वादों की राजनीति’। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं 2022 में चेतावनी दी थी कि यह परंपरा देश की आर्थिक सेहत को नुकसान पहुँचा सकती है। लेकिन विडंबना यह है कि वही राजनीतिक दल और नेता, जो इस प्रवृत्ति की आलोचना करते रहे, आज चुनावी गणित साधने के लिए उसी रास्ते पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

कर्ज़ और खर्च का बढ़ता बोझ

भारत की अर्थव्यवस्था 4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की मानी जाती है, लेकिन इसके बावजूद देश पर भारी कर्ज़ है। केवल ब्याज चुकाने में ही हर साल लाखों करोड़ रुपए खर्च हो जाते हैं। राज्य सरकारों की स्थिति तो और भी गंभीर है—कई राज्यों का कर्ज़ उनके वार्षिक बजट से अधिक हो चुका है। पंजाब, बिहार, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे प्रदेश मुफ्त योजनाओं का एलान कर तो रहे हैं, लेकिन असलियत यह है कि उनके खजाने पहले से ही खाली हैं।

बिहार, हरियाणा और महाराष्ट्र के उदाहरण

हाल ही में बिहार में महिलाओं को एकमुश्त 10,000 रुपए देने की योजना शुरू की गई। सरकार ने इसे महिला सशक्तिकरण का नाम दिया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रकम किसी महिला को स्थायी रूप से आत्मनिर्भर बना सकती है? यही हाल हरियाणा और महाराष्ट्र का है, जहां मासिक भत्तों की घोषणा तो हो रही है, लेकिन भारी घाटे के चलते लाखों पात्र लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए।

वादे और हकीकत में दूरी

पंजाब की आम आदमी पार्टी ने प्रत्येक महिला को 1,000 रुपए प्रतिमाह देने का वादा किया था। लेकिन जब सरकारी खजाने की हकीकत सामने आई, तो योजना अधूरी ही रह गई। यही स्थिति अन्य राज्यों की भी है—वादे बड़े-बड़े, लेकिन आर्थिक आधार खोखला।

क्या यही रास्ता सही है?

देश के करोड़ों करदाता हर साल सरकार को टैक्स देते हैं। उनकी मेहनत की कमाई जब अल्पकालिक वोट-लुभावू योजनाओं पर खर्च होती है, तो स्वाभाविक रूप से असंतोष पैदा होता है। यह पैसा अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और बुनियादी ढांचे पर लगे तो न सिर्फ़ नागरिक सशक्त होंगे बल्कि अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।

समाधान की दिशा

भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन ‘मुफ्तखोरी’ की यह प्रवृत्ति अगर जारी रही तो विकास की रफ़्तार धीमी हो सकती है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे अल्पकालिक लाभ से आगे सोचें और ऐसी नीतियां बनाएं जो युवाओं को रोजगार, महिलाओं को स्वरोजगार और किसानों को टिकाऊ मदद दें।

 निष्कर्ष यह है कि देश को केवल रेवड़ियों से नहीं, बल्कि रोज़गार और अवसरों से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। जब हर नागरिक को काम और गरिमा मिलेगी, तभी भारत सच्चे अर्थों में आर्थिक महाशक्ति बन पाएगा।

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