सेक्स का बाजार! समाज की नंगी सच्चाई और हमारी आंखें बंद करने की आदत!
उत्तर प्रदेश! सहारनपुर के सरसावा में एक साधारण-सा घर। बाहर से देखो तो शायद कोई परिवार का ठिकाना लगे, लेकिन अंदर की दीवारें चीखती हैं
सेक्स का बाजार! समाज की नंगी सच्चाई और हमारी आंखें बंद करने की आदत!
(इंद्र यादव)
उत्तर प्रदेश! सहारनपुर के सरसावा में एक साधारण-सा घर। बाहर से देखो तो शायद कोई परिवार का ठिकाना लगे, लेकिन अंदर की दीवारें चीखती हैं समाज की उस गंदी हकीकत की, जिसे हम 'अश्लील' कहकर नजरअंदाज कर देते हैं। पुलिस का छापा, चार युवतियां और पांच युवक 'आपत्तिजनक अवस्था' में पकड़े गए। नाम हैं वसीम, अक्षय, आशिक, अमजद, शुभम—ये ग्राहक, और शालिनी, संगीता, अनीता, सपना,ये 'सेवा' देने वाली।
कमरों से मिले 'टाइगर किंग' क्रीम के बॉक्स, डिपॉक्सिटिन की स्ट्रिप्स, 35 कंडोम पैकेट और पांच इस्तेमाल हुए कंडोम। महिलाओं के अंडरगारमेंट्स में छिपाई गई 15,000 रुपये की नकदी। और सपना का कबूलनामा!"मैं तो सिर्फ 500 रुपये लेती हूं। ये खबर नहीं, एक आईना है। लेकिन हम इस आईने में अपनी शक्ल देखने से कतराते हैं। क्यों! क्योंकि ये सिर्फ एक 'सेक्स रैकेट' नहीं, बल्कि हमारे समाज की गहरी दरारों का नमूना है,गरीबी, लिंग असमानता, यौन शिक्षा की कमी और उस हाइपोक्रिसी का, जहां हम दिन में नैतिकता की दुहाई देते हैं और रात में ऐसी 'सुविधाओं' की तलाश करते हैं। आइए, इस खबर को अलग नजरिए से देखें, न सिर्फ अपराध की सजा की बात, बल्कि उन जड़ों की, जो ऐसे अड्डों को पनपने देती हैं। ये लेख कोई लेक्चर नहीं, बल्कि एक जोरदार चेतावनी है,समाज को बदलने की, वरना ऐसे छापे रोजाना की खबर बन जाएंगे।
भारत में गरीबी का जाल: 500 रुपये की कीमत में बिकती जिंदगियां ,सपना कहती है, "मैं तो सिर्फ 500 रुपये लेती हूं।" ये वाक्य सुनकर हंसी आती है या गुस्सा, 500 रुपय,एक स्मार्टफोन रिचार्ज से कम, एक रेस्तरां की कॉफी से ज्यादा नहीं। लेकिन इसी में बिकती है एक महिला की गरिमा। भारत में, जहां करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे जीते हैं, वेश्यावृत्ति अक्सर मजबूरी बन जाती है। ग्रामीण इलाकों जैसे सहारनपुर में शिक्षा और रोजगार के अवसर कम हैं। लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं, घरेलू हिंसा झेलती हैं, और फिर ऐसे 'अड्डों' में फंस जाती हैं। क्या हमने कभी सोचा कि सपना या शालिनी जैसी महिलाएं क्यों यहां पहुंचीं! ट्रैफिकिंग! पारिवारिक दबाव! या बस पेट की आग!और ग्राहक! वसीम, आशिक, शुभ,ये नाम बताते हैं कि ये कोई 'अमीरों का खेल' नहीं। ये आम आदमी हैं, शायद मजदूर, दुकानदार या बेरोजगार युवा। समाज उन्हें 'मर्दानगी' का पाठ पढ़ाता है, लेकिन यौन शिक्षा नहीं देता।
परिणाम! 'टाइगर किंग' क्रीम और डिपॉक्सिटिन जैसी दवाओं का सहारा। ये दवाएं सिर्फ सेक्स को 'बढ़ाने' नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक कमजोरियों को उजागर करती है,एक तरफ पुरुषों पर 'परफॉर्म' करने का दबाव, दूसरी तरफ महिलाओं को ऑब्जेक्ट बनाने की संस्कृति। अगर हम गरीबी से लड़ने की बजाय सिर्फ छापे मारेंगे, तो ऐसे अड्डे बंद होने की बजाय नए रूप में उग आएंगे।
हमारे समाज की दोहरी नैतिकता यह है कि दिन में संत, रात में पापी! हमें हंसी आती है जब हम सुनते हैं कि पुलिस ने 'कपड़े पहनवाकर' कस्टडी ली। लेकिन ये हंसी हमारी हाइपोक्रिसी पर है। भारत में सेक्स वर्क को अवैध माना जाता है, लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं कि डिमांड कहां से आती है! बॉलीवुड फिल्में 'आइटम सॉन्ग्स' से करोड़ों कमाती हैं, सोशल मीडिया पर 'हॉट' कंटेंट वायरल होता है, लेकिन असली दुनिया में ऐसी महिलाओं को 'गिरी हुई' कहकर तिरस्कार।
पुरुष ग्राहकों को 'शर्मिंदगी' में छोड़ दिया जाता है, जबकि महिलाओं को जेल। क्यों! क्योंकि हमारा समाज पितृसत्तात्मक है,महिला को दोषी ठहराना आसान है। और पुलिस! वे छापे मारते हैं, अच्छा काम। लेकिन क्या ये छापे सिस्टेमेटिक हैं या सिर्फ शो! सहारनपुर जैसी जगहों में, जहां भ्रष्टाचार की खबरें आम हैं, क्या ये अड्डे पुलिस की 'नजर' से बचकर चलते हैं! या फिर 'मासिक हफ्ता' का खेल है! ये सवाल उठाने जरूरी हैं, क्योंकि अगर पुलिस सिर्फ 'पकड़ो और भूल जाओ' करेगी, तो समस्या जड़ से नहीं उखड़ेगी। हमें जरूरत है रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम्स की,इन महिलाओं के लिए स्किल ट्रेनिंग, काउंसलिंग और वैकल्पिक रोजगार। ग्राहकों के लिए यौन शिक्षा और जागरूकता कैंप। लेकिन हमारा समाज तो 'शर्म' की बात कहकर चुप हो जाता है।भारत में सेक्स एजुकेशन की कमी है। कंडोम मिले, लेकिन समझ नहीं,खबर में मिले 35 कंडोम पैकेट और पांच इस्तेमाल हुए,ये बताते हैं कि कम से कम 'सुरक्षा' का ख्याल तो था। लेकिन क्या ये काफी है! भारत में एसटीडी और एचआईवी के केस बढ़ रहे हैं, क्योंकि यौन शिक्षा स्कूलों में 'टैबू' है। युवा 'टाइगर किंग' जैसी अनरजिस्टर्ड दवाओं पर निर्भर हो जाते हैं, जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती हैं।
अगर हम बच्चों को सेक्स के बारे में सही जानकारी दें, तो ऐसे अड्डों की जरूरत ही कम हो जाए। लेकिन नहीं, हमारी 'संस्कृति' ऐसी 'गंदी' बातों से दूर रहना सिखाती है। नतीजा! गुप्त रोग, अवांछित गर्भ और टूटे परिवार।ये खबर सिर्फ सहारनपुर की नहीं, पूरे देश की है। दिल्ली से गांव तक, ऐसे अड्डे पनपते हैं क्योंकि हम समस्या की जड़ नहीं काटते। अलग ढंग से सोचें: वेश्यावृत्ति को लीगलाइज करें, रेगुलेट करें,जैसे नीदरलैंड्स में। वहां महिलाओं को सुरक्षा मिलती है, टैक्स आता है, और अपराध कम होता है। या फिर सख्ती से लागू करें कानून, लेकिन साथ में सामाजिक सुधार। एनजीओ, सरकार और हम सब मिलकर काम करें,महिलाओं को सशक्त बनाएं, पुरुषों को जिम्मेदार। वरना, अगली खबर में नाम बदलेंगे, लेकिन कहानी वही रहेगी।समाज बदलना आसान नहीं, लेकिन चुप रहना और आसान है।
इस खबर से सीखें,नंगी सच्चाई को ढकने की बजाय, उसे बदलने की कोशिश करें। क्योंकि अगर हम नहीं बदले, तो ऐसे 'अड्डे' हमारे घरों तक पहुंच जाएंग,शायद नहीं शारीरिक रूप से, लेकिन नैतिक रूप से जरूर।
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