अमेरिकी दवा टैरिफ और भारत की फार्मा चुनौती
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक बार फिर व्यापारिक जगत को चौंकाते हुए घोषणा की कि 1 अक्टूबर 2025 से अमेरिका ब्रांडेड या पेटेंटेड दवाओं पर 100% आयात शुल्क लगाएगा।
अमेरिकी दवा टैरिफ और भारत की फार्मा चुनौती
गिरीश नारायण
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक बार फिर व्यापारिक जगत को चौंकाते हुए घोषणा की कि 1 अक्टूबर 2025 से अमेरिका ब्रांडेड या पेटेंटेड दवाओं पर 100% आयात शुल्क लगाएगा। इससे पहले अगस्त में 50% टैरिफ लगाया जा चुका था। यह कदम उनकी “अमेरिका फर्स्ट” और “मेक इन अमेरिका” नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
भारत पर असर क्यों सीमित है
पहली नजर में यह घोषणा भारत जैसे बड़े निर्यातक देश के लिए चिंता का कारण लग सकती है, लेकिन वास्तविकता कुछ और है।
भारत का लगभग 95% दवा निर्यात जेनेरिक दवाओं का है।
पेटेंटेड दवाओं की हिस्सेदारी केवल 5% के आसपास है।
भारत में कई कंपनियां पहले से ही अमेरिका में विनिर्माण संयंत्र स्थापित कर चुकी हैं, जिन पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।
इस तरह फिलहाल भारतीय कंपनियों पर सीधा असर न्यूनतम है।
ट्रंप की मंशा
इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी धरती पर दवा उत्पादन को बढ़ावा देना है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि—
1. विदेशी निर्भरता कम करना आवश्यक है।
2. कोविड-19 महामारी ने दिखा दिया कि आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने पर दवाओं की भारी किल्लत हो सकती है।
3. स्थानीय उत्पादन बढ़ाकर दवाओं को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा जा सकता है।
ब्रांडेड बनाम जेनेरिक दवाएं
ब्रांडेड दवाएं: जिन पर खोज करने वाली कंपनी को 20 साल का पेटेंट अधिकार मिलता है।
जेनेरिक दवाएं: पेटेंट खत्म होने के बाद वही दवा, बिना नए शोध खर्च के, कम कीमत पर उपलब्ध कराई जाती है।
भारत आज “जेनेरिक दवाओं का वैश्विक केंद्र” है। अमेरिका में हर 10 में से 4 पर्चों पर लिखी दवाएं भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित होती हैं। यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन ने इस श्रेणी को फिलहाल टैरिफ से बाहर रखा है, क्योंकि इससे अमेरिकी नागरिकों पर सीधा आर्थिक बोझ पड़ता।
संभावित खतरे
हालांकि निकट भविष्य में खतरे की घंटी बज सकती है। अगर रणनीतिक कारणों से अमेरिका जेनेरिक दवाओं पर भी शुल्क लगाने की दिशा में बढ़ता है, तो भारतीय फार्मा उद्योग को बड़ा झटका लगेगा। इसी आशंका के चलते भारतीय शेयर बाजार में फार्मा कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखने को मिली।
भारत के लिए अवसर और तैयारी
भारत को इस चुनौती को अवसर में बदलने के लिए कुछ प्रमुख कदम उठाने होंगे—
1. अनुसंधान और नवाचार : पेटेंटेड दवाओं के क्षेत्र में निवेश और रिसर्च बढ़ाना।
2. इन्फ्रास्ट्रक्चर सुदृढ़ीकरण : फार्मा पार्क और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना।
3. गुणवत्ता पर फोकस : अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विनिर्माण और निगरानी।
4. वैश्विक साझेदारी : एफटीए और निवेशकों के साथ दीर्घकालिक सहयोग।
5. डिजिटल और आईटी एकीकरण : दवा उत्पादन व वितरण में टेक्नोलॉजी का उपयोग।
ट्रंप का नया टैरिफ फिलहाल भारत को ज्यादा प्रभावित नहीं करता, लेकिन यह स्पष्ट संकेत है कि भविष्य और कठिन हो सकता है। भारत को “दुनिया की फार्मेसी” के अपने दर्जे को कायम रखने के लिए अनुसंधान, नवाचार और नीतिगत तैयारियों पर तुरंत ध्यान देना होगा। यदि यह रणनीति समय पर लागू होती है तो भारतीय दवा उद्योग 55 अरब डॉलर के वर्तमान स्तर से 2030 तक 130 अरब डॉलर और 2047 तक 400-450 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
भारत के लिए यह केवल व्यापार का सवाल नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा, रोजगार और वैश्विक नेतृत्व की भी चुनौती है।
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