बिहार में ऊंट किस करवट बैठेगा ?
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम 14 नवंबर को घोषित होंगे। इस समय सारे देश की नजरें इस बात पर हैं कि यहां पर कौन सा दल या गठबंधन सरकार बनाने जा रहा है
बिहार में ऊंट किस करवट बैठेगा ?
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम 14 नवंबर को घोषित होंगे। इस समय सारे देश की नजरें इस बात पर हैं कि यहां पर कौन सा दल या गठबंधन सरकार बनाने जा रहा है ? प्रत्येक राजनीतिक दल और उसका गठबंधन इस बात के दावे कर रहा है कि इस बार उनकी ही सरकार बनने जा रही है, परंतु मतदाता क्या सोच रहा है और किसे वह अगले 5 वर्ष के लिए बिहार की सत्ता सौंपने जा रहा है ? - इसे केवल वही जानता है।
इस सच्चाई को जानने के उपरांत भी हम सबकी उत्सुकता बनी हुई है कि सरकार किस गठबंधन की बनने जा रही है ? इस बार भाजपा और उसके साथी दलों का एनडीए और राष्ट्रीय जनता दल तथा उसके साथी दलों के महागठबंधन के अतिरिक्त प्रशांत किशोर का जन सुराज दल भी चुनावी मैदान में है। यदि कांग्रेस की बात करें तो यह पार्टी कोई विशेष प्रदर्शन करती हुई दिखाई नहीं दे रही है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ साथ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे भी वोटों की चोरी का जिस प्रकार आरोप लगा भाजपा पर लगा रहे हैं , उससे स्पष्ट होता है कि वह चुनाव में आसन्न खड़ी अपनी हार को अभी से पहचान चुके हैं । मुंह छुपाने के लिए वे वोट चोरी के आरोप भाजपा प्रणीत एनडीए पर लगा रहे हैं। जिस पार्टी को भाजपा और उसके एनडीए को मजबूती के साथ घेरना चाहिए था, वही चुनावी मैदान से भागती हुई दिखाई दे रही है।
भाजपा की जहां तक बात है तो उसने चुनाव से पहले चुनाव के बाद का प्रबंध करने पर ध्यान केंद्रित किया है। यदि इस बार भाजपा अपने आप में अच्छा प्रदर्शन करती है और उसे चिराग पासवान व मांझी की पार्टी के साथ स्पष्ट बहुमत मिलता है तो वह सरकार बनाने के लिए अपना दावा कर सकती है। यद्यपि इसके लिए पार्टी को नीतीश कुमार को भी साधना पड़ेगा। क्योंकि केंद्र में उनके बिना एनडीए की सरकार चल नहीं सकती। ऐसी स्थिति में उन्हें केंद्र में मंत्री बनने के लिए तैयार किया जाएगा। यदि नीतीश कुमार की पार्टी में विभाजन हो जाता है और भाजपा को प्रदेश के साथ-साथ देश की सरकार को चलाने में भी कोई कठिनाई नहीं आती है तो ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार से भी पल्ला झाड़ा जा सकता है।
यदि भाजपा, चिराग पासवान और मांझी तीनों मिलकर सरकार बनाने की आंकड़े से बहुत पीछे रह जाते हैं तो ऐसी स्थिति में ही नीतीश कुमार को ' एक बार और झेलने ' का अवसर ' कलेजा पर पत्थर ' रखकर देने के लिए भाजपा विवश होगी। हमारा मानना है कि यदि भाजपा नीतीश कुमार से पल्ला झाड़ना चाहती है तो यह कार्य न केवल प्रदेश के हित में होगा अपितु राष्ट्र के हित में भी होगा। क्योंकि नीतीश कुमार के चेहरे से लोग परेशान हो चुके हैं, वह चुनावी सभाओं में भी बात करते-करते बातों को भूलते हुए देखे जा रहे हैं। इस चेहरे को और अधिक देर तक ढोना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। कई बार वह बिहार के मतदाताओं की अपेक्षाओं पर ठुकराए जा चुके हैं। परंतु लोकतंत्र में सिरों की गिनती का खेल खेलकर वे आंकड़ा अपने पक्ष में करके सत्ता सुख भोगते रहे हैं।
प्रशांत किशोर इस समय अपने जन सुराज दल के लिए केवल भूमि तैयार कर रहे हैं। इससे आगे नहीं लगता कि वह कोई ' चमत्कार' करने जा रहे हैं। बिहार के लोग उनकी अकड़ ढीली कर सकते हैं। लालू प्रसाद यादव की पार्टी के लिए उनका घरेलू कलह और उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप कष्टप्रद हो सकते हैं। भाजपा और उसके साथी दलों की यदि मानें तो प्रदेश की जनता को यह समझ आ चुका है कि लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव चाहे जितनी बार जनसाधारण के हितों को साधने की बात करें, परंतु सच यह है कि वह जनसाधारण के लिए विकास के नाम पर असफल सिद्ध हो चुके हैं। लालू प्रसाद यादव के लिए 'युवराज' खतरनाक हो सकता है।
ऐसी स्थिति में कुछ लोग एग्जिट पोल अथवा सर्वे के आधार पर अथवा अपने-अपने अन्य आंकलनों से स्पष्ट कर रहे हैं कि इस बार भी एनडीए बिहार में सरकार बनाने जा रहा है।
नीतीश कुमार भली प्रकार जानते हैं कि यदि वह इस बार अधिक पिछड़ गए तो यह आवश्यक नहीं है कि उनको ही अगला मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हो ? यदि केंद्र में उनकी पार्टी के सांसदों ने उनका साथ नहीं दिया तो पलटी मारने की उनकी कलाकारी इस बार सदा सदा के लिए भी मिट सकती है। ऐसी स्थिति में इस बार उनकी स्थिति " धोबी का कुत्ता न घर का रहा न घाट का " वाली भी हो सकती है। बहुत संभव है कि प्रदेश का मतदाता नीतीश कुमार से पल्ला झाड़ कर बीजेपी को अधिक वोट देकर उसे स्पष्ट बहुमत के निकट पहुंचा दे। इसका एक कारण यह भी है कि बिहार के मतदाता ने अभी तक अन्य सभी राजनीतिक दलों को सत्ता में रहते हुए देखा है, परंतु बीजेपी का मुख्यमंत्री क्या कर सकता है ?- उसके लिए यह देखना अभी शेष है। इसी उत्सुकता के कारण बिहार का मतदाता प्रशांत किशोर को अधिक घास नहीं डालेगा ।
उसके पास एक अच्छा विकल्प है कि वह भाजपा को सत्ता के निकट पहुंचाये। जिससे एक ऐसा मुख्यमंत्री प्रदेश को मिल सके जो विकास के प्रति संकल्पित हो। बिहार का मतदाता यह भी जानता है कि यदि केंद्र में भाजपा की सरकार है तो प्रदेश में भी उसकी सरकार होना ही बिहार के हित में है। हमारा मानना है कि बिहार का मतदाता अत्यंत जागरुक है। वह भ्रष्टाचारियों से पल्ला झाड़ना चाहता है यथास्थितिवाद के विरुद्ध भी वह अपना मन बना चुका लगता है। बौद्धिक संपदा से संपन्न रहे बिहार के मतदाता पर आज भी आप किसी प्रकार की संकीर्णता का आरोप नहीं लगा सकते। इस बार वह ऐतिहासिक निर्णय लेने जा रहा है।
वह जानता है कि स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों को गौण कर देते हैं। उसके मस्तिष्क में देश की सुरक्षा,देश में बढ़ रहा इस्लामिक आतंकवाद, जनसंख्या विस्फोट, विकास आदि सभी सब कुछ विचारणीय है। उसका निर्णय इन सब बिंदुओं पर सोच कर लिया जाएगा। कुल मिलाकर कहने का अभिप्राय यह है
कि बिहार में उसी की सरकार बनेगी जो बिहार के प्रबुद्ध मतदाताओं की इन अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा। भ्रष्टाचारी और आतंकवाद का समर्थन करने वाले दोगले नेताओं को बिहार की जनता उनकी औकात बता देगी।
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