आज़ का मुद्दा आशीष कुमार
स्याना (बुलंदशहर)। आधुनिकता के दौर में मोबाइल और डिजिटल संचार के बढ़ते चलन के बीच हाथ से लिखी चिट्ठियों की परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। कभी चिट्ठियों के जरिए लोग अपने सुख-दुख और भावनाओं को अपनों तक पहुंचाते थे। अंतर्देशीय पत्र और पोस्टकार्ड मिलने की खुशी के साथ डाकिये का इंतजार भी लोगों के लिए खास पल हुआ करता था। इसी परंपरा और डाककर्मियों के योगदान को याद करते हुए हिंद जन सेवा समिति ने डाक दिवस के अवसर पर नगर के डाकघर पहुंचकर कर्मचारियों को सम्मानित किया।
समिति के अध्यक्ष ललित त्रिवेदी ने कहा कि हृदय की भावनाओं से लिखी जाती थी चिट्ठी, वह सब खुशियां मोबाइल ने छीन लीं। उन्होंने कहा कि पहले लोग अपने मन की बात कागज पर लिखकर बंद लिफाफे में परिचितों और परिजनों तक भेजते थे। चिट्ठियों के माध्यम से भावनाओं का आदान-प्रदान होता था। डाकिये के आने का इंतजार और अपनों का पत्र मिलने की खुशी जीवन के यादगार पलों में शामिल थी।उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक ने संचार को भले ही तेज और आसान बना दिया है, लेकिन हाथ से लिखी चिट्ठियों से जुड़ी आत्मीयता और भावनात्मक जुड़ाव अब पहले जैसा नहीं रहा। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी पुरानी परंपराएं भी धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। ऐसे में डाक दिवस पुरानी यादों को ताजा करने और डाककर्मियों के योगदान को सम्मान देने का अवसर है।
इस दौरान समिति की ओर से डाकघर के कर्मचारियों को सम्मानित कर उनके कार्यों की सराहना की गई। कार्यक्रम में अभय त्रिवेदी, मनोज कुमार, अवधेश, संकेत, सत्येंद्र, केंद्रपाल, साहिल और रोहतास सहित अन्य लोग मौजूद रहे।