1947 में अंग्रेज चले गए, लेकिन उनके जाने के साथ भारत की कहानी समाप्त नहीं हुई थी। असली चुनौती उसके बाद शुरू हुई थी। आज जिस भारत को हम एक देश के रूप में देखते हैं, उस समय उसके सामने एक बड़ा सवाल था—क्या यह पूरा भूभाग एक मजबूत राष्ट्र बनेगा या सैकड़ों रियासतों और छोटे-छोटे राजनीतिक क्षेत्रों में बंट जाएगा?

उस समय भारत में 565 रियासतों का प्रश्न सामने था। ब्रिटिश सत्ता समाप्त होते ही इन रियासतों के सामने अपनी राजनीतिक स्थिति तय करने की चुनौती थी। यह केवल राजाओं-महाराजाओं का सवाल नहीं था, बल्कि भारत की भौगोलिक और राजनीतिक एकता का प्रश्न था।
यहीं इतिहास में सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व असाधारण रूप से सामने आता है।
पटेल केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे। उन्होंने दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, बातचीत, समझाइश, कूटनीति और जरूरत पड़ने पर कठोर निर्णय—इन सभी रास्तों का इस्तेमाल किया। उनके साथ वी.पी. मेनन जैसे अधिकारियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 25 जून 1947 को States Department बना और पटेल उसके प्रमुख बने; वी.पी. मेनन उसके सचिव थे।

जूनागढ़ का मामला हो, हैदराबाद का प्रश्न हो या दूसरी रियासतों का भारत में विलय—हर जगह परिस्थितियाँ अलग थीं। लेकिन लक्ष्य एक था—भारत को राजनीतिक रूप से एक रखना।
अगर उस समय यह एकीकरण नहीं हुआ होता, तो आज भारत की यात्रा कितनी कठिन होती, इसकी कल्पना की जा सकती है। शायद सीमाएँ अलग होतीं, आने-जाने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ होतीं, व्यापार और प्रशासन में अलग-अलग बाधाएँ होतीं और केंद्र सरकार के लिए राष्ट्रीय नीतियों को पूरे देश में लागू करना कहीं अधिक कठिन होता।
यह कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा कि केवल एक व्यक्ति ने अकेले भारत को बनाया। लेकिन यह कहना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा कि सरदार पटेल के योगदान को सामान्य राजनीतिक घटनाओं में रखकर भूल जाएँ।

आज की पीढ़ी को यह याद रखना चाहिए कि जिस भारत में हम बिना किसी आंतरिक राजनीतिक सीमा के एक राज्य से दूसरे राज्य जाते हैं, जिस भारत में एक संविधान, एक सर्वोच्च राष्ट्रीय सत्ता और एक साझा राजनीतिक व्यवस्था है—उसकी नींव आजादी के तुरंत बाद के उन्हीं कठिन वर्षों में मजबूत की गई थी।
वीरेश तिवारी का मानना है कि सरदार पटेल की सबसे बड़ी देन केवल रियासतों का विलय नहीं, बल्कि भारत की एकता को व्यवहारिक रूप देना था। इतिहास में कई बड़े नेता हुए, कई नीतियाँ बनीं और कई निर्णय लिए गए; लेकिन पटेल की कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता थी—समस्या कितनी भी कठिन हो, राष्ट्र की एकता से समझौता नहीं।
इसलिए पटेल को केवल “लौह पुरुष” कहकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है। उनके काम को समझना जरूरी है।
आज जब हम भारत की एकता की बात करते हैं तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि यह एकता अपने आप नहीं बनी थी। इसे कठिन परिस्थितियों में बनाया गया था।

वीरेश तिवारी के शब्दों में कहें तो सवाल आज भी वही है—
“अगर उस समय भारत को जोड़ने वाला इतना दृढ़ नेतृत्व नहीं मिलता, तो क्या आज का भारत इतना एकजुट भारत होता?”
इस सवाल का अंतिम उत्तर इतिहास अपने तरीके से देता है। लेकिन एक बात निर्विवाद है—सरदार पटेल के योगदान को भारत की राष्ट्रीय एकता के इतिहास से कभी अलग नहीं किया जा सकता।
और शायद यही वह इतिहास है जिसे नई पीढ़ी को बार-बार पढ़ाना चाहिए—क्योंकि देश का नक्शा केवल जमीन से नहीं बनता, उसे दूरदृष्टि, दृढ़ता और राष्ट्रीय एकता की भावना से बनाया जाता है।
वीरेश तिवारी
सदस्य, शिकायत निवारण समिति
नोएडा अथॉरिटी