सिसौली की धरती से उठी उनकी आवाज ने देश की राजधानी तक किसानों के सवाल पहुंचाए।
टिकैत जी ने किसानों के लिए सिर्फ भाषण नहीं दिए, बल्कि उनकी समस्याओं को लेकर सरकारों के सामने मजबूती से अपनी बात रखी।
गन्ने के उचित मूल्य, बिजली-पानी की दरें, किसानों के बकाये और खेती से जुड़े दूसरे सवाल उनके आंदोलनों के प्रमुख मुद्दे रहे।
1988 में दिल्ली के बोट क्लब पर उनका विशाल किसान आंदोलन आज भी किसान आंदोलनों के इतिहास में महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। उस समय बड़ी संख्या में किसान दिल्ली पहुंचे और सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं।
उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि वे गांव और किसान की भाषा में बात करते थे।
उनका मानना था कि किसान की मेहनत का सम्मान तभी होगा, जब उसे उसकी उपज का उचित मूल्य और उसकी समस्याओं का समाधान मिले।
आज उनकी जयंती पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि यह सोचने का अवसर भी है कि जिस किसान के श्रम से देश का पेट भरता है, उसकी आवाज लोकतंत्र में कितनी मजबूती से सुनी जा रही है।
चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत को विनम्र श्रद्धांजलि।

— वीरेश तिवारी
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी