डॉ. दिनेश शर्मा के नेतृत्व में ‘श्रेेष्ठ अंडमान’ की दिशा में नई उम्मीदें; पर्यटन, मत्स्य पालन, होटल, समुद्री उद्योग और युवाओं के लिए खुल सकता है अवसरों का नया संसार
भारत की कल्पना केवल हिमालय से कन्याकुमारी तक की जमीन से नहीं होती। भारत की असली शक्ति उसके समुद्र, द्वीपों और समुद्री सीमाओं में भी छिपी है। बंगाल की खाड़ी में फैला अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह इसी समुद्री भारत की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है।
यह क्षेत्र पर्यटन के लिए स्वर्ग है, सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, समुद्री जैव-विविधता का खजाना है और आने वाले वर्षों में रोजगार तथा निवेश के लिए भी बड़ी संभावनाएँ रखता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सितंबर 2026 में अंडमान-निकोबार को नया उपराज्यपाल मिला है—प्रो. (डॉ.) दिनेश शर्मा।

भारत के राष्ट्रपति ने 5 सितंबर 2026 को डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल नियुक्त किया और उन्होंने 15 सितंबर 2026 को पदभार ग्रहण किया। अंडमान-निकोबार प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट उन्हें वर्तमान माननीय उपराज्यपाल के रूप में दर्ज करती है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डॉ. दिनेश शर्मा केवल प्रशासक नहीं, बल्कि अकादमिक, शिक्षाविद्, शोधकर्ता और लंबे सार्वजनिक जीवन का अनुभव रखने वाले व्यक्ति हैं।
इस पूरे विषय को समझने और लिखने में लेखक एवं स्तंभकार वीरेश तिवारी की दृष्टि भी महत्वपूर्ण है। वे लंबे समय से सार्वजनिक जीवन, प्रशासन और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों का अध्ययन करते रहे हैं। उनका मानना है कि अंडमान का विकास तभी सार्थक होगा, जब स्थानीय युवाओं को रोजगार, प्रशिक्षण और उद्यम के अवसर मिलें तथा बाहर से आने वाली पूंजी स्थानीय समाज के साथ मिलकर काम करे।
डॉ. दिनेश शर्मा: शिक्षा, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन का लंबा अनुभव
प्रो. (डॉ.) दिनेश शर्मा का जन्म 12 जनवरी 1964 को हुआ। वे लखनऊ विश्वविद्यालय के वाणिज्य विभाग में प्रोफेसर रहे हैं और उन्होंने भारत के कागज उद्योग पर शोध करते हुए पीएचडी की। अंडमान-निकोबार प्रशासन के आधिकारिक जीवन परिचय के अनुसार उन्होंने छह पुस्तकें लिखी हैं और तीन दर्जन से अधिक शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं। उन्होंने 13 से अधिक शोधार्थियों के पीएचडी शोध का निर्देशन भी किया।

उनका सार्वजनिक जीवन भी लंबा रहा है।
वे 2017 से 2022 तक उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रहे और माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विभागों से जुड़े रहे। इससे पहले वे लखनऊ के महापौर भी रहे। अंडमान प्रशासन की आधिकारिक प्रोफाइल में उनके राष्ट्रीय और राज्य स्तर के विभिन्न सार्वजनिक एवं संगठनात्मक दायित्वों का भी उल्लेख है।
यही अनुभव अंडमान के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
क्योंकि अंडमान को केवल सड़क, भवन और पर्यटन की जरूरत नहीं है। उसे शिक्षा, कौशल, रोजगार, निवेश, प्रशासनिक सुधार, डिजिटल सेवाओं, समुद्री अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ लेकर चलने वाली सोच की आवश्यकता है।
वीरेश तिवारी जैसे लेखक और स्तंभकार, जो लंबे समय से डॉ. दिनेश शर्मा के सार्वजनिक जीवन और कार्यशैली का अध्ययन करते रहे हैं, यह मानते हैं कि उनकी प्रशासनिक समझ का सबसे बड़ा परीक्षण यही होगा कि वे अंडमान के युवाओं को स्थानीय अवसरों से कैसे जोड़ते हैं और द्वीपों की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर दिशा में कैसे ले जाते हैं।

अंडमान कितना बड़ा है?
यहाँ एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है।
अंडमान-निकोबार का जमीन का क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश से बड़ा नहीं है। उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल लगभग 2,40,928 वर्ग किमी है, जबकि अंडमान-निकोबार का कुल भू-क्षेत्र लगभग 8,249 वर्ग किमी है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
अंडमान-निकोबार की असली ताकत उसकी समुद्री सीमा में है।
प्रशासन के मत्स्य विभाग के अनुसार द्वीपसमूह की तटरेखा लगभग 1,912 किलोमीटर है और इसके आसपास का Exclusive Economic Zone लगभग 6 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के कुल EEZ का लगभग 28 प्रतिशत बताया गया है।
यानी जमीन छोटी है, लेकिन समुद्र का आर्थिक विस्तार बहुत बड़ा है।
यही कारण है कि अंडमान को केवल पर्यटन स्थल मानना उसके साथ न्याय नहीं होगा।
836 द्वीपों का भारत
अंडमान-निकोबार प्रशासन के अनुसार इस केंद्रशासित प्रदेश में 836 द्वीप, द्वीपिकाएँ और चट्टानी भू-भाग हैं, जिनमें वर्तमान प्रशासनिक आँकड़ों के अनुसार 31 आबाद द्वीप हैं। क्षेत्र तीन जिलों में विभाजित है—दक्षिण अंडमान, उत्तर एवं मध्य अंडमान और निकोबार।
इनमें प्रमुख रूप से जिन स्थानों का पर्यटन और आर्थिक दृष्टि से महत्व है, उनमें शामिल हैं—
श्री विजयपुरम (पूर्व पोर्ट ब्लेयर), स्वराज द्वीप (हैवलॉक), शहीद द्वीप (नील), बाराटांग, रंगत, मायाबंदर, डिगलीपुर, लिटिल अंडमान, लॉन्ग आइलैंड, रॉस एंड स्मिथ क्षेत्र, नानकौरी समूह, कमोर्टा, कच्छल, टेरेसा और ग्रेट निकोबार।

हर क्षेत्र की अपनी विशेषता है।
कहीं समुद्र और पर्यटन है।
कहीं मैंग्रोव और प्रकृति है।
कहीं मत्स्य पालन की संभावना है।
कहीं समुद्री परिवहन महत्वपूर्ण है।
कहीं औद्योगिक गतिविधियों की गुंजाइश है।
और कहीं भारत की सामरिक तथा समुद्री शक्ति का भविष्य जुड़ा हुआ है।
श्री विजयपुरम से शुरू होता है अंडमान का प्रवेश द्वार
राजधानी श्री विजयपुरम अंडमान-निकोबार का प्रशासनिक और प्रमुख पर्यटन प्रवेश केंद्र है।
यहाँ से सेलुलर जेल, संग्रहालय, समुद्र तट और विभिन्न द्वीपों के लिए समुद्री परिवहन उपलब्ध होता है।
यहीं से पर्यटन के साथ होटल, रेस्तरां, ट्रैवल एजेंसी, डिजिटल बुकिंग, गाइड सेवा, टैक्सी, नाव सेवा, फोटोग्राफी और अनेक छोटे व्यवसायों की श्रृंखला बनती है।
किसी भी पर्यटन अर्थव्यवस्था में केवल होटल मालिक नहीं कमाता।
उससे जुड़े दर्जनों व्यवसाय कमाते हैं।
ड्राइवर कमाता है।
गाइड कमाता है।
नाविक कमाता है।
फोटोग्राफर कमाता है।
रेस्तरां वाला कमाता है।
स्थानीय दुकानदार कमाता है।
हस्तशिल्प बेचने वाला कमाता है।
यही पर्यटन का multiplier effect है।
वीरेश तिवारी का मानना है कि अंडमान में पर्यटन का यह लाभ स्थानीय युवाओं तक पहुँचाने के लिए प्रशिक्षण, स्थानीय उद्यमिता और प्रशासनिक मार्गदर्शन को एक साथ मजबूत करना होगा। केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा; स्थानीय लोगों की आय और भागीदारी भी बढ़नी चाहिए।
स्वराज द्वीप और शहीद द्वीप: पर्यटन की बड़ी प्रयोगशाला
स्वराज द्वीप, जिसे लंबे समय तक हैवलॉक के नाम से जाना जाता था, अंडमान के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन क्षेत्रों में है।
राधानगर बीच, स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग और समुद्री गतिविधियों ने इसे अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर पहचान दिलाई है।

शहीद द्वीप, पूर्व नील द्वीप, भी समुद्र, प्राकृतिक पुल, समुद्र तट और शांत पर्यटन के लिए जाना जाता है।
पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग, कयाकिंग, पैरासेलिंग, सी-वॉक, जेट स्की, सी-कार्ट, बर्ड वॉचिंग, कैंपिंग, क्रूज और अन्य गतिविधियाँ सूचीबद्ध हैं।
इसका अर्थ है कि यहाँ पर्यटन का भविष्य केवल होटल के कमरे बेचने में नहीं है।
भविष्य है—
अनुभव बेचने में।
समुद्र का अनुभव।
जंगल का अनुभव।
डाइविंग का अनुभव।
स्थानीय भोजन का अनुभव।
पक्षियों को देखने का अनुभव।
द्वीपों के बीच यात्रा का अनुभव।
और प्रकृति के बीच रहने का अनुभव।
होटल और होम-स्टे: युवाओं के लिए बड़ा अवसर
देश का कोई युवा या उद्यमी यदि अंडमान में व्यवसाय की संभावना देखता है तो होटल और होम-स्टे सबसे पहले उसके सामने आने वाले क्षेत्र हैं।
पर्यटन विभाग बाकायदा सरकारी और निजी आवासों की निर्देशिका रखता है। स्वराज द्वीप, उत्तर अंडमान और श्री विजयपुरम सहित अनेक स्थानों पर होटल और होम-स्टे सूचीबद्ध हैं।
इसका मतलब यह है कि इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र पहले से सक्रिय है।
भविष्य में अवसर हो सकते हैं—
छोटे पर्यावरण-अनुकूल होटल
होम-स्टे
बेड एंड ब्रेकफास्ट
बजट होटल
वरिष्ठ नागरिकों के लिए पर्यटन आवास
वेलनेस और योग केंद्र
नेचर रिसॉर्ट
परिवार आधारित पर्यटन
एडवेंचर टूरिज्म आवास
कॉर्पोरेट रिट्रीट
शैक्षणिक एवं रिसर्च टूरिज्म
लेकिन यहाँ एक सावधानी अत्यंत जरूरी है।
अंडमान में जमीन खरीदकर मनमर्जी से होटल बनाना कोई सामान्य कारोबारी प्रक्रिया नहीं है।
वन, पर्यावरण, तटीय विनियमन, संरक्षित क्षेत्र, भूमि की स्थिति, स्थानीय नियम और जनजातीय क्षेत्रों से संबंधित प्रावधानों को समझना होगा।
इसलिए जो व्यक्ति निवेश करना चाहता है, वह पहले संबंधित विभागों से लिखित जानकारी लेकर ही आगे बढ़े।
अंडमान की असली आर्थिक शक्ति—समुद्र
अंडमान की सबसे बड़ी संपदा समुद्र है।
लगभग 6 लाख वर्ग किलोमीटर का EEZ और लंबी तटरेखा इसे मत्स्य पालन, समुद्री अनुसंधान, समुद्री पर्यटन और अन्य समुद्री गतिविधियों के लिए विशेष बनाते हैं।
मत्स्य पालन को आधुनिक उद्योग के रूप में विकसित किया जाए तो इसके साथ कई दूसरे व्यवसाय भी विकसित होंगे।
मछली पकड़ने के बाद उसे सुरक्षित रखने के लिए चाहिए—
बर्फ।
फिर चाहिए—
कोल्ड स्टोरेज।
फिर—
कोल्ड चेन।
फिर—
पैकेजिंग।
फिर—
प्रसंस्करण।
और फिर—
बाजार।
यानी एक मछली के पीछे पूरी आर्थिक श्रृंखला बन सकती है।
डॉ. दिनेश शर्मा का पहला बड़ा संदेश: स्थानीय मछुआरों की अर्थव्यवस्था मजबूत हो
यहाँ डॉ. दिनेश शर्मा के कार्यकाल की एक बहुत ताजा घटना उल्लेखनीय है।
6 अक्टूबर 2026 को नानकौरी समूह के कमोर्टा में आइस प्लांट और कोल्ड स्टोरेज सुविधा स्थापित करने के प्रस्ताव को उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा ने मंजूरी दी। इससे नानकौरी समूह के निकोबारी मछुआरों—टेरिसा, चौरा, कच्छल और आसपास के द्वीपों—को मछली सुरक्षित रखने और बाजार तक पहुँचाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
यह छोटा फैसला नहीं है।
यह बताता है कि समुद्री अर्थव्यवस्था में केवल मछली पकड़ना ही महत्वपूर्ण नहीं है।
पोस्ट-हार्वेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अगर मछली पकड़कर तुरंत बर्फ न मिले, तो नुकसान होता है।
अगर कोल्ड स्टोरेज न हो, तो कीमत कम मिलती है।
अगर बाजार से सीधा संपर्क न हो, तो बिचौलियों पर निर्भरता बढ़ती है।
इसलिए आइस प्लांट और कोल्ड स्टोरेज स्थानीय मछुआरे की आय बढ़ाने की दिशा में वास्तविक आर्थिक आधार बन सकते हैं।
समुद्र में नई खेती: Seaweed, Cage Culture और Pearl Farming
अंडमान में समुद्र आधारित नए व्यवसायों की संभावना केवल पारंपरिक मछली पालन तक सीमित नहीं है।
सितंबर 2026 में मत्स्य विभाग ने Open Sea Cage Culture, Seaweed Culture और Pearl Farming के लिए अधिसूचित समुद्री क्षेत्रों को लीज पर देने हेतु आवेदन आमंत्रित किए थे। पात्र श्रेणियों में मछुआरे, मछली किसान, व्यक्तिगत उद्यमी, निजी कंपनियाँ, स्वयं सहायता समूह, सहकारी संस्थाएँ और Fish Farmer Producer Organisations जैसी संस्थाएँ शामिल थीं।
यह बहुत महत्वपूर्ण संकेत है।
देश के युवा समुद्री खेती की इन आधुनिक तकनीकों में प्रशिक्षण लेकर भविष्य में नए व्यवसाय विकसित कर सकते हैं।
लेकिन फिर वही बात—
नियमों के भीतर।
समुद्री क्षेत्र सरकार की अनुमति के बिना इस्तेमाल नहीं किए जा सकते।
Sport Fishing और Marine Tourism
अंडमान में Sport Fishing भी एक अलग पर्यटन व्यवसाय बन सकता है।
मत्स्य विभाग की व्यवस्था के अनुसार इसके लिए e-permit प्रणाली है और निर्धारित क्षेत्रों, सुरक्षा मानकों और नियमों के तहत गतिविधि की अनुमति दी जाती है।
इसके आसपास पूरा व्यवसाय विकसित हो सकता है—
प्रशिक्षित बोट क्रू
पर्यटन नावें
फिशिंग गाइड
समुद्री सुरक्षा कर्मचारी
उपकरण किराये पर देना
फोटोग्राफी
पर्यटन पैकेज
होटल पैकेज
ऑनलाइन बुकिंग
अर्थात समुद्र एक व्यवसाय है, लेकिन समुद्र के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
नॉर्थ और मिडिल अंडमान: भविष्य का नया पर्यटन सर्किट
डिगलीपुर, मायाबंदर, रंगत और आसपास के क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से बेहद रोचक हैं।

पर्यटन विभाग के सुझाए गए यात्रा कार्यक्रमों में बाराटांग के मैंग्रोव, लाइमस्टोन गुफाएँ, मड वोल्केनो, रंगत, मायाबंदर, कछुआ nesting क्षेत्र, डिगलीपुर, कालिपुर और रॉस एंड स्मिथ द्वीपों को जोड़कर बहुदिवसीय पर्यटन सर्किट बनाया गया है।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
पर्यटक अगर केवल श्री विजयपुरम और स्वराज द्वीप तक सीमित रहे तो आर्थिक लाभ भी कुछ इलाकों में सीमित रहेगा।
लेकिन यदि North & Middle Andaman Tourism Circuit विकसित होता है तो होटल, गाइड, परिवहन, रेस्तरां, होम-स्टे और स्थानीय उत्पादों का लाभ ज्यादा क्षेत्रों तक पहुँच सकता है।
Bird Tourism, Eco Tourism और Astro Tourism
आज दुनिया में पर्यटन का अर्थ केवल समुद्र किनारे बैठना नहीं रह गया है।
लोग पक्षी देखने आते हैं।
जंगल देखने आते हैं।
मैंग्रोव देखने आते हैं।
तारों का आकाश देखने आते हैं।
प्रकृति की तस्वीरें लेने आते हैं।
अंडमान में इन सभी क्षेत्रों की संभावनाएँ हैं।
भारत सरकार ने भी 2026 में संसद में बताया कि अंडमान-निकोबार में इको-टूरिज्म, क्रूज पर्यटन, सांस्कृतिक एवं विरासत पर्यटन, एडवेंचर टूरिज्म और टूरिस्ट सर्किट को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रशासन ने Bird Watching, Caravan Tourism, Luxury Tents, Astro Tourism और Houseboat Tourism जैसी नीतियाँ भी विकसित की हैं।
यहाँ पढ़े-लिखे युवाओं के लिए रोजगार की एक नई श्रेणी बन सकती है—
Nature Guide।
जो युवक अंग्रेजी, हिंदी और स्थानीय भूगोल के साथ पक्षियों, पेड़-पौधों और समुद्री जीवन को समझता है, वह आने वाले समय में बहुत उपयोगी पर्यटन पेशेवर बन सकता है।
उद्योग भी हो सकते हैं—लेकिन अंडमान के स्वभाव के अनुसार
अंडमान को उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र की तरह भारी उद्योगों का केंद्र बनाना उचित नहीं होगा।
यहाँ उद्योगों का स्वरूप अलग होना चाहिए।
अंडमान प्रशासन का उद्योग विभाग स्वयं पर्यटन, value-added fisheries, shipping services, port management, IT/ITeS तथा हस्तशिल्प, coir processing और cane-based rural industries जैसे क्षेत्रों को अवसर के रूप में चिन्हित करता है।
यानी संभावित उद्योग हैं—
समुद्री खाद्य प्रसंस्करण।
कोल्ड चेन।
नारियल आधारित उत्पाद।
कोयर।
बाँस/केन आधारित उत्पाद।
हस्तशिल्प।
पैकेजिंग।
पर्यटन उपकरण।
डिजिटल सेवाएँ।
शिपिंग और पोर्ट से जुड़ी सेवाएँ।
छोटे MSME।
अंडमान में औद्योगिक एस्टेट भी हैं। उद्योग विभाग के अनुसार वर्तमान में छह औद्योगिक एस्टेट सूचीबद्ध हैं, जिनमें गराचारामा, डॉलीगंज, मिथाखारी, बाकुलतला, लिटिल अंडमान और कैंपबेल बे शामिल हैं। इनमें MSME, सहकारी संस्थाओं, स्टार्टअप और उद्यमियों के लिए सुविधाएँ उपलब्ध कराने की व्यवस्था बताई गई है।
वीरेश तिवारी के अनुसार अंडमान में उद्योगों का विकास स्थानीय युवाओं को केंद्र में रखकर होना चाहिए। बाहर से आने वाले उद्यमी पूंजी, तकनीक और बाजार ला सकते हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण, रोजगार और साझेदारी से जोड़ना अनिवार्य होना चाहिए।
बाहर के देश की नहीं, बाहर के भारत की पूंजी आए
यह बात विशेष रूप से समझने की जरूरत है।
अंडमान भारत का हिस्सा है।
इसलिए दिल्ली, नोएडा, लखनऊ, कानपुर, जयपुर, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु या कोलकाता का उद्यमी यदि नियमों के अनुसार वहाँ निवेश करना चाहता है तो उसे अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन मॉडल होना चाहिए—
स्थानीय लोगों के साथ साझेदारी।
स्थानीय रोजगार।
स्थानीय प्रशिक्षण।
स्थानीय उत्पादों की खरीद।
स्थानीय संस्कृति का सम्मान।
और पर्यावरण संरक्षण।
यदि कोई दिल्ली का व्यापारी वहाँ होटल लगाता है तो स्थानीय युवाओं को नौकरी मिले
यदि कोई उत्तर प्रदेश का उद्यमी कोल्ड स्टोरेज लगाता है तो स्थानीय मछुआरे उसका लाभ लें।
यदि कोई महाराष्ट्र का व्यक्ति समुद्री खाद्य प्रसंस्करण इकाई लगाता है तो स्थानीय मछली उत्पादकों को बाजार मिले।
यदि कोई बेंगलुरु की कंपनी डिजिटल टूरिज्म प्लेटफॉर्म बनाए तो स्थानीय गाइड और होटल उससे जुड़ें।
यही सही राष्ट्रीय एकीकरण है।
रोजगार की तलाश करने वाले युवाओं के लिए भी अंडमान
हर व्यक्ति को व्यवसाय नहीं करना है।
बहुत से युवा नौकरी करना चाहते हैं।
उनके लिए भी पर्यटन, होटल, स्वास्थ्य, शिक्षा, समुद्री परिवहन, IT, इंजीनियरिंग, मत्स्य पालन, वन, प्रशासन, कौशल प्रशिक्षण और सेवा क्षेत्र में अवसर हो सकते हैं।
अंडमान प्रशासन की वेबसाइट पर विभिन्न विभागों की भर्ती और संविदात्मक पदों की सूचनाएँ लगातार प्रकाशित होती हैं।
लेकिन एक बात डॉ. दिनेश शर्मा ने अपने शुरुआती संबोधन में विशेष रूप से रेखांकित की है—स्थानीय निवासियों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना और रोजगार में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण है।
इसलिए बाहर से जाने वाले युवाओं को यह समझना चाहिए कि वे स्थानीय युवाओं के अवसरों का विकल्प बनने नहीं, बल्कि नई आर्थिक गतिविधियाँ पैदा करने जाएँ।
वीरेश तिवारी की समझ में अंडमान के युवाओं के लिए सबसे बड़ा अवसर यही है कि वे पर्यटन, समुद्री अर्थव्यवस्था, डिजिटल सेवाओं और स्थानीय उत्पादों से जुड़े नए कौशल सीखें। यदि प्रशासन, निजी क्षेत्र और स्थानीय समाज मिलकर काम करें, तो रोजगार के लिए युवाओं को बाहर जाने की मजबूरी कम हो सकती है।
डॉ. दिनेश शर्मा के सामने बड़ी प्राथमिकताएँ
डॉ. दिनेश शर्मा ने सितंबर 2026 में अंडमान के विकास के लिए पानी, बिजली, परिवहन, सस्ती हवाई सेवाओं, मछुआरों की सुविधाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से सहयोग लेकर अस्पतालों, परिवहन, मछुआरों के लिए आधुनिक नाव और cold storage तथा renewable energy जैसी सुविधाएँ मजबूत करने की बात भी कही।
यह उनके लिए एक बड़ी चुनौती भी है और बड़ा अवसर भी।
क्योंकि अंडमान की सबसे बड़ी समस्याएँ और सबसे बड़ी संभावनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
पर्यटन बढ़ाना है—तो उड़ानें बढ़ानी होंगी।
उड़ानें बढ़ानी हैं—तो कीमत नियंत्रित करनी होगी।
पर्यटक बढ़ेंगे—तो होटल चाहिए।
होटल बढ़ेंगे—तो पानी और बिजली चाहिए।
द्वीपों का पर्यटन बढ़ेगा—तो फेरी और समुद्री परिवहन चाहिए।
मछली उत्पादन बढ़ेगा—तो ice plant और cold storage चाहिए।
युवा रोजगार चाहते हैं—तो skill development चाहिए।
यानी विकास एक विभाग से नहीं होगा।
पूरे प्रशासन को एक साथ काम करना होगा।
‘अंडमान 365’ क्यों जरूरी है?
6 अक्टूबर 2026 को पर्यटन क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने उपराज्यपाल से मुलाकात कर अंडमान को साल भर चलने वाले पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित करने की बात रखी। इसमें बेहतर हवाई संपर्क, कम किराये, पर्यटन कौशल प्रशिक्षण और “Andaman 365” जैसी अवधारणा पर चर्चा हुई।
यह विचार महत्वपूर्ण है।
क्योंकि पर्यटन यदि केवल कुछ महीनों तक चलेगा तो होटल, नाव, गाइड और छोटे व्यवसाय पूरे साल पर्याप्त कमाई नहीं कर पाएँगे।
इसलिए पर्यटन का कैलेंडर बनना चाहिए—
समुद्री पर्यटन।
मानसून पर्यटन।
नेचर टूरिज्म।
बर्ड वॉचिंग।
वेलनेस।
एडवेंचर।
शैक्षणिक पर्यटन।
एस्ट्रो टूरिज्म।
क्रूज।
हेरिटेज टूरिज्म।
एक ऐसा मॉडल जिसमें अंडमान केवल “हनीमून डेस्टिनेशन” नहीं, बल्कि भारत का पूर्ण वर्ष पर्यटन गंतव्य बने।
Great Nicobar: भविष्य की बड़ी समुद्री कहानी
निकोबार समूह में ग्रेट निकोबार का महत्व अलग स्तर का है।
भारत सरकार के 2026 के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार Great Nicobar Project में International Container Transshipment Terminal, Greenfield International Airport, power infrastructure और planned township जैसी बड़ी परियोजनाएँ शामिल हैं। सरकार इसे रणनीतिक, आर्थिक और समुद्री दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखती है और पर्यावरणीय तथा जनजातीय सुरक्षा उपायों का भी उल्लेख करती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि ग्रेट निकोबार को अनियंत्रित रूप से खोल दिया जाए।
बल्कि इसका अर्थ है कि वहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण और जनजातीय अधिकारों के बीच संतुलन बनाकर विकास की दीर्घकालीन योजना तैयार करनी होगी।
अंडमान को दूसरा गोवा नहीं बनाना है
यह संपादकीय की सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी है।
अंडमान को विकास चाहिए।
लेकिन ऐसा विकास नहीं जिसमें जंगल कट जाएँ।
समुद्र प्रदूषित हो जाए।
प्रवाल नष्ट हो जाएँ।
स्थानीय संस्कृति कमजोर हो जाए।
या संरक्षित जनजातीय क्षेत्रों में बाहरी हस्तक्षेप बढ़ जाए।
अंडमान की सबसे बड़ी पूंजी ही उसकी प्रकृति है।
यदि वही खत्म हो गई तो पर्यटन का आकर्षण भी खत्म हो जाएगा।
इसलिए भविष्य का मॉडल होना चाहिए—
Green Tourism।
Blue Economy।
Local Employment।
Sustainable Infrastructure।
Responsible Investment।
और सबसे ऊपर—
प्रकृति और स्थानीय समाज का सम्मान।
देश के लोगों के लिए सीधा संदेश
जो युवा नौकरी खोज रहा है—अंडमान को देखिए।
जो उद्यमी नया व्यवसाय खोज रहा है—अंडमान को समझिए।
जो होटल व्यवसायी है—पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन की संभावनाएँ देखिए।
जो मछली व्यवसाय से जुड़ा है—value-added fisheries और cold chain देखिए।
जो तकनीक जानता है—digital tourism और IT/ITeS देखिए।
जो समुद्र को समझता है—marine tourism और aquaculture देखिए।
जो प्रकृति से प्रेम करता है—eco-tourism और nature guiding देखिए।
जो स्थानीय उत्पादों को बाजार देना चाहता है—हस्तशिल्प, नारियल, coir और स्थानीय खाद्य उत्पादों पर काम कर सकता है।
लेकिन हर व्यक्ति एक बात याद रखे—
पहले नियम जानिए, फिर निवेश कीजिए।
भूमि की स्थिति देखिए।
अनुमतियाँ देखिए।
पर्यावरणीय नियम देखिए।
जनजातीय क्षेत्र के नियम देखिए।
स्थानीय प्रशासन से पुष्टि कीजिए।
और उसके बाद ही पैसा लगाइए।
डॉ. दिनेश शर्मा के सामने इतिहास बनाने का अवसर
अंडमान-निकोबार के नए उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा के सामने एक असाधारण अवसर है।
उनके पास शिक्षा का अनुभव है।
प्रशासन का अनुभव है।
शहरी निकाय का अनुभव है।
राज्य सरकार का अनुभव है।
तकनीक और उच्च शिक्षा से जुड़ा अनुभव है।
और अब उनके सामने एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ समुद्र, पर्यटन, शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण और सामरिक महत्व—सब एक साथ मौजूद हैं।
यदि उनके कार्यकाल में अंडमान के स्थानीय युवाओं को बड़े पैमाने पर skill development मिले, पर्यटन पूरे साल चले, हवाई और समुद्री संपर्क बेहतर हों, मछुआरों को cold chain मिले, समुद्री खेती बढ़े, छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन मिले, स्वास्थ्य सुविधाएँ मजबूत हों और प्रकृति की रक्षा के साथ पर्यटन का विस्तार हो, तो यह आने वाले वर्षों में अंडमान की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।
उनका शुरुआती संदेश “श्रेष्ठ अंडमान” की दिशा में सामूहिक प्रयास का है।
अब जरूरत है कि यह सोच योजनाओं से निकलकर जमीन पर दिखाई दे।
वीरेश तिवारी, जो लेखक और स्तंभकार के रूप में लंबे समय से प्रशासनिक और सामाजिक विषयों पर लिखते रहे हैं, मानते हैं कि डॉ. दिनेश शर्मा की सफलता का वास्तविक पैमाना यही होगा कि अंडमान के दूरदराज द्वीपों तक विकास, रोजगार और अवसर कितनी प्रभावी ढंग से पहुँचते हैं। युवाओं को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, बाजार और काम से जोड़ना होगा।
अंडमान केवल छुट्टी नहीं—भारत के भविष्य का अवसर है
अंडमान की यात्रा करके कोई व्यक्ति केवल समुद्र नहीं देखता।
वह भारत का समुद्री चेहरा देखता है।
वह भारत की जैव-विविधता देखता है।
वह भारत की सामरिक स्थिति समझता है।
वह भारत की जनजातीय विरासत को महसूस करता है।
और वह यह भी समझता है कि आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा समुद्र से जुड़ने वाला है।
इसलिए अंडमान-निकोबार को केवल पर्यटन पुस्तिका का एक पन्ना बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।
इसे भारत की Blue Economy का महत्वपूर्ण केंद्र बनाना होगा।
यहाँ देश के युवाओं को अवसर मिलें।
स्थानीय लोगों की आय बढ़े।
मछुआरों को आधुनिक सुविधाएँ मिलें।
होटल और होम-स्टे बढ़ें।
पर्यटन पूरे साल चले।
समुद्री खेती और value-added fisheries विकसित हों।
छोटे उद्योग खड़े हों।
डिजिटल व्यवसाय आएँ।
शिक्षा और कौशल के नए संस्थान विकसित हों।
और सबसे महत्वपूर्ण—
अंडमान की प्रकृति सुरक्षित रहे।
क्योंकि विकास का वह मॉडल ही सफल होगा जिसमें आर्थिक समृद्धि और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथी बनें।
अंडमान भारत का छोटा भूभाग जरूर है, लेकिन उसकी समुद्री संभावनाएँ बहुत बड़ी हैं।
836 द्वीपों का यह संसार भारत की आर्थिक, सामरिक और पर्यटन शक्ति का एक अनमोल अध्याय है।
और आज जब प्रो. (डॉ.) दिनेश शर्मा ने उपराज्यपाल के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है, तब देश को अंडमान की ओर केवल पर्यटक की नजर से नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यम, समुद्री अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय विकास की नजर से भी देखना चाहिए।
अंडमान जाएँ—घूमें भी, समझें भी और यदि अवसर मिले तो स्थानीय समाज के साथ मिलकर भारत के इस समुद्री क्षेत्र के विकास में योगदान भी दें।
प्रकृति बचे, स्थानीय लोग आगे बढ़ें, युवा रोजगार पाएँ और भारत की समुद्री शक्ति मजबूत हो—यही होना चाहिए ‘श्रेष्ठ अंडमान’ का सपना।
वीरेश तिवारी
लेखक एवं स्तंभकार
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी