आज बाजार में ऐसे तमाम उत्पाद धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जो दावा करते हैं कि वे शुगर कम कर देंगे, ब्लड प्रेशर ठीक कर देंगे, वजन घटा देंगे और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को भी ठीक कर देंगे।
मेरा सीधा सवाल है—इन दावों का वैज्ञानिक आधार क्या है?
दवाओं के लिए clinical trials और उनकी safety तथा efficacy की जांच क्यों जरूरी है? क्योंकि गलत दवा या गलत दावा किसी व्यक्ति की जिंदगी से खिलवाड़ कर सकता है।
भारत में इसके लिए कानून और नियामक संस्थाएं मौजूद हैं। फिर भी अगर कोई उत्पाद बिना पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण के गंभीर बीमारी ठीक करने का दावा कर रहा है, तो उसकी निगरानी और कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
सबसे बड़ा खतरा यह है कि कोई मरीज डॉक्टर की प्रमाणित दवा छोड़कर ऐसे उत्पाद पर भरोसा कर ले। इससे इलाज में देरी हो सकती है और बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।
मैं किसी नए उत्पाद के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन बीमारी ठीक करने का दावा है तो वैज्ञानिक प्रमाण भी होना चाहिए।
सरकार और नियामक एजेंसियों को बाजार ही नहीं, बल्कि टीवी, सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर किए जा रहे ऐसे दावों की भी सख्त निगरानी करनी चाहिए।
उपभोक्ता को खरीदने की आजादी जरूर हो, लेकिन उसे भ्रमित करके खरीदने की आजादी किसी को नहीं होनी चाहिए।
स्वास्थ्य के मामले में—पहले प्रमाण, फिर प्रचार।
वीरेश तिवारी
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी