विशेष संपादकीय
वीरेश तिवारी, सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी
भारतीय लोकतंत्र में 25 वर्ष किसी भी राजनीतिक यात्रा के लिए बहुत लंबा समय होता है। इस दौरान पीढ़ियां बदल जाती हैं, राजनीतिक परिस्थितियां बदल जाती हैं और जनता की अपेक्षाएं भी बदलती रहती हैं। लेकिन 7 अक्टूबर 2001 से 7 अक्टूबर 2026 तक नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक जीवन की यात्रा लगातार आगे बढ़ती रही है। 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुआ यह अध्याय आज प्रधानमंत्री के रूप में भारत के नेतृत्व तक पहुंच चुका है।

यह यात्रा केवल एक व्यक्ति के पदों की यात्रा नहीं है। यह संगठन के एक कार्यकर्ता से राज्य के मुख्यमंत्री और फिर देश के प्रधानमंत्री बनने की यात्रा है। 2001 में जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात की जिम्मेदारी संभाली, तब राज्य भूकंप, सूखे, चक्रवात और राजनीतिक अस्थिरता जैसी कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। स्वयं प्रधानमंत्री ने बाद में उस दौर को याद करते हुए कहा कि परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण थीं और उन्हें गुजरात के पुनर्निर्माण के संकल्प के साथ काम करना पड़ा।
गुजरात ने दिया पहला बड़ा अवसर
नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन में गुजरात का स्थान हमेशा विशेष रहेगा। अक्टूबर 2001 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने प्रशासन और विकास को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया। बिजली, पानी, सिंचाई, उद्योग, सड़क और प्रशासनिक सुधार जैसे विषय गुजरात की राजनीति के केंद्र में आए।
गुजरात का अनुभव आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में भी दिखाई दिया। यही कारण है कि 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए राष्ट्रीय राजनीति में आए, तो उनके साथ गुजरात के प्रशासनिक अनुभव की एक पूरी पृष्ठभूमि थी।
2014 का चुनाव भारतीय राजनीति का बड़ा मोड़ था। नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद 2019 और 2024 में भी जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में लगातार तीसरी बार अवसर दिया। 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेना इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय बना।

गुजरात से दिल्ली—सोच का विस्तार
मुख्यमंत्री के रूप में किसी राज्य को संभालना और प्रधानमंत्री के रूप में पूरे देश का नेतृत्व करना दो बिल्कुल अलग जिम्मेदारियां हैं। गुजरात में जिन प्रयोगों और प्रशासनिक विचारों को लागू किया गया, उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने की चुनौती नरेंद्र मोदी के सामने आई।
जनधन खाते, आधार और मोबाइल के माध्यम से सरकारी योजनाओं को सीधे लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था, डिजिटल भुगतान का विस्तार, UPI, स्वच्छता अभियान, आवास, जल जीवन मिशन, किसान सहायता और बुनियादी ढांचे पर जोर—इन सबने शासन की शैली में बड़ा परिवर्तन किया।
इन योजनाओं की सफलता और सीमाओं का मूल्यांकन इतिहास करेगा, लेकिन इतना निश्चित है कि पिछले वर्षों में सरकार और आम नागरिक के बीच डिजिटल संपर्क बहुत तेजी से बढ़ा है।
निर्णय लेने वाला नेतृत्व

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सबसे अधिक चर्चा जिस बात को लेकर हुई, वह है—बड़े फैसले लेने की राजनीतिक इच्छाशक्ति।
GST, अनुच्छेद 370 में परिवर्तन, तीन तलाक से संबंधित कानून, महिला आरक्षण कानून, नए आपराधिक कानून, आर्थिक सुधार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों ने देश की राजनीति में व्यापक बहस पैदा की।
समर्थकों ने इन्हें निर्णायक नेतृत्व का प्रमाण माना, जबकि विपक्ष और आलोचकों ने इनके तरीके और प्रभाव पर सवाल उठाए। लेकिन लोकतंत्र में यही स्वस्थ बहस है। किसी भी सरकार को केवल प्रशंसा से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों के परिणामों से भी परखा जाना चाहि
और यही कारण है कि नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों का मूल्यांकन भी केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में हुए वास्तविक बदलावों से होना चाहिए।
कोरोना से लेकर आत्मनिर्भर भारत तक
कोविड-19 महामारी पूरी दुनिया के लिए असाधारण संकट थी। भारत जैसे विशाल देश के सामने करोड़ों लोगों की सुरक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, रोजगार और अर्थव्यवस्था को बचाने की चुनौती थी।
महामारी के दौरान भारत में बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन हुआ और देश ने वैक्सीन निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद आत्मनिर्भर भारत और स्थानीय उत्पादन पर जोर बढ़ा।
आज मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन, डिजिटल सेवाओं और अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती क्षमता को इसी व्यापक सोच से जोड़कर देखा जाता है।
विज्ञान से विश्व मंच तक
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के वर्षों में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को भी वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली। चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता को दुनिया के सामने मजबूती से रखा।
डिजिटल इंडिया और UPI ने तो भारत की एक अलग पहचान ही बना दी। कभी जिन देशों में भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में देखा जाता था, आज उन्हीं देशों के नीति-निर्माता भारत के डिजिटल सार्वजनिक ढांचे और भुगतान प्रणाली में रुचि लेते हैं।
G20 की अध्यक्षता और वैश्विक दक्षिण की आवाज को प्रमुखता देने की कोशिशों ने भी भारत की कूटनीतिक सक्रियता को बढ़ाया।

और फिर आया काशी का अध्याय
नरेंद्र मोदी की यात्रा में काशी केवल एक लोकसभा क्षेत्र नहीं है।
2014 में वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद काशी उनके राजनीतिक जीवन की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास, गंगा से जुड़ी परियोजनाएं और शहर के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन ने काशी को आधुनिक सुविधाओं और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के मेल के एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।
आज 25 वर्ष की यात्रा के अवसर पर गुजरात के जन्मस्थान से काशी की कर्मभूमि तक का संबंध विशेष रूप से प्रतीकात्मक हो गया है। इस वर्ष मोदी की 25 वर्ष की सार्वजनिक सेवा को चिह्नित करने वाली यात्राओं में वडनगर और काशी को जोड़ना भी इसी भाव को दर्शाता है।
एक तरफ वडनगर—जहां उनका जन्म हुआ, दूसरी तरफ काशी—जहां से वे लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह यात्रा अपने आप में एक राजनीतिक कहानी है।
अयोध्या और एक ऐतिहासिक क्षण

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में अयोध्या का राम मंदिर भी भारतीय सार्वजनिक जीवन के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में रहा।
5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के भूमि पूजन में भाग लिया। �
22 जनवरी 2024 को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर प्रधानमंत्री की उपस्थिति ने इस यात्रा को एक और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक आयाम दिया। अयोध्या की तस्वीरें देश-दुनिया में व्यापक रूप से सामने आईं।
इससे नरेंद्र मोदी की राजनीति में विकास और सांस्कृतिक विरासत—दोनों विषयों की चर्चा एक साथ होने लगी।
25 साल बाद असली सवाल
लेकिन 25 वर्ष पूरे होने पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल केवल यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने कितने रिकॉर्ड बनाए।
सवाल यह है कि आने वाले 20 वर्ष का भारत कैसा होगा?
2047 में जब देश स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा, तब भारत की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी होगी? हमारे युवाओं के लिए कितने रोजगार होंगे? गांवों और शहरों के बीच सुविधाओं का अंतर कितना कम होगा? शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता कैसी होगी? किसान कितना मजबूत होगा? हमारी बेटियां कितनी सुरक्षित और आत्मनिर्भर होंगी? भारत विज्ञान और तकनीक में दुनिया के कितने करीब होगा?
इन सवालों का जवाब ही नरेंद्र मोदी के वर्तमान नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा होगा।
25 वर्ष पूरे होना उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर जरूर है, लेकिन उससे भी ज्यादा यह जिम्मेदारी को याद करने का अवसर है।
इतिहास फैसला बाद में करेगा
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा पर देश में मतभेद रहे हैं और आगे भी रहेंगे। किसी भी लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है।
समर्थक उन्हें निर्णायक और विकासोन्मुख नेता मानते हैं। आलोचक उनके निर्णयों, राजनीतिक शैली और कुछ नीतियों पर प्रश्न उठाते हैं। दोनों पक्ष लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं।
लेकिन इन मतभेदों से अलग एक तथ्य को स्वीकार करना होगा—2001 से 2026 तक लगातार सरकार के प्रमुख के रूप में बने रहना भारतीय लोकतंत्र में असाधारण राजनीतिक उपलब्धि है। 6 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भी उनके 25 वर्ष के निरंतर नेतृत्व को रेखांकित करते हुए प्रस्ताव पारित किया।
इतिहास किसी भी नेता का मूल्यांकन तत्काल नहीं करता। वह समय बीतने के बाद देखता है कि किस नेता ने देश को कहां से उठाकर कहां पहुंचाया, संस्थाओं को कितना मजबूत किया, समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास कितना पहुंचा और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ा।
नरेंद्र मोदी की 25 वर्ष की यात्रा भी इसी ऐतिहासिक कसौटी पर परखी जाएगी।
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 7 अक्टूबर 2001 को शुरू हुई यात्रा आज प्रधानमंत्री के रूप में 25 वर्ष के पड़ाव पर पहुंची है। गुजरात से दिल्ली, दिल्ली से काशी और काशी से अयोध्या तक—यह यात्रा केवल एक राजनीतिक जीवन की कहानी नहीं है, बल्कि बदलते भारत की भी एक महत्वपूर्ण कहानी है।
आज इस यात्रा को देखते हुए एक बात जरूर कही जा सकती है—
25 वर्ष पूरे हो गए हैं, लेकिन असली इतिहास अभी लिखा जाना बाकी है।
और आने वाला इतिहास इस बात का फैसला करेगा कि यह बेमिसाल 25 वर्ष भारत के अगले 25 वर्षों की कितनी मजबूत नींव बन सके।