संपादकीय विचार : वीरेश तिवारी
भारत की राजनीति के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अगला नेता कौन होगा, बल्कि यह है कि अगली पीढ़ी की राजनीति कैसी होगी?लंबे समय तक समाज की अनेक आवाजें सत्ता और व्यवस्था तक नहीं पहुँच पाती थीं। लेकिन आजपरिस्थितियाँ बदल रही हैं। जो लोग वर्षों तक अपनी बात मनवाने के लिए संघर्ष करते रहे, जब वे सड़क पर उतरकर जनता के बीच अपनी बात रखने लगे, तो व्यवस्था को भी उनकी बात सुननी पड़ी। लोकतंत्र की असली ताकत यही है—जनता जब जागती है तो उसकी आवाज को अनसुना करना आसान नहीं रहता।इसीलिए आज के युवाओं के सामने राजनीति में आने का एक नया अवसर है।
लेकिन राजनीति में आने का अर्थ किसी बड़े नेता के पीछे खड़े होकर अपनी पहचान बनाना नहीं होना चाहिए। युवा अपनी योग्यता, अपने ज्ञान और अपने काम के आधार पर पहचान बनाए।
एक IAS या PCS अधिकारी बनने के लिए वर्षों की कठिन पढ़ाई करनी पड़ती है। वैज्ञानिक बनने के लिए वर्षों तक अध्ययन और शोध करना पड़ता है। लेकिन एक सफल जनप्रतिनिधि बनने के लिए केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है। उसके लिए समाज को समझना, लोगों के बीच रहना, उनकी समस्याओं को सुनना, निर्णय लेना और सबसे महत्वपूर्ण—चरित्रवान होना जरूरी है।आज शिक्षा पर भी नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।
हमने वर्षों तक ऐसी शिक्षा पाई जिसमें डिग्री मिल गई, परीक्षा पास हो गई, लिखना-पढ़ना आ गया, लेकिन जीवन की वास्तविक समस्याओं से निपटने की तैयारी कितनी हुई? स्कूल और कॉलेज से निकलने के बाद कितने विषय हमारे रोजमर्रा के जीवन में वास्तव में काम आते हैं और कितने केवल परीक्षा की कॉपी तक सीमित रह जाते हैं?शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाने की योग्यता देना नहीं हो सकता। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को जीवन जीना, निर्णय लेना, स्वस्थ रहना, आर्थिक रूप से समझदार बनना, समाज को समझना और जिम्मेदार नागरिक बनना सिखाए।शिक्षा के साथ स्वास्थ्य को भी राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। स्वस्थ नागरिक ही स्वस्थ समाज और मजबूत राष्ट्र बना सकता है। और स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि मानसिक शांति, संतुलित जीवन और ऐसी सामाजिक व्यवस्था भी है जिसमें व्यक्ति लगातार तनाव में न जीता रहे।
आखिर विकास का अंतिम उद्देश्य क्या है?
क्या केवल यह कि आदमी के पास अधिक पैसा हो?
आज 80–90 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में अपने परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए लगातार दौड़ रहे हैं। नौकरी, व्यापार, राजनीति—हर जगह पैसा और भविष्य की चिंता बड़ी भूमिका निभाती है। यह स्वाभाविक भी है। परिवार चलाना और भविष्य सुरक्षित करना आवश्यक है।
लेकिन क्या मनुष्य का पूरा जीवन केवल कमाने और जमा करने के लिए है?
शायद नहीं।
लाल बहादुर शास्त्री जैसे व्यक्तित्व हमें याद दिलाते हैं कि सार्वजनिक जीवन में सादगी और ईमानदारी भी शक्ति हो सकती है। महात्मा गांधी ने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज और व्यक्ति के नैतिक उत्थान से जोड़ने का प्रयास किया। दुनिया में नेल्सन मंडेला जैसे उदाहरण भी हैं, जिन्होंने सत्ता से अधिक अपने सिद्धांतों और समाज के प्रति जिम्मेदारी को महत्व दिया।
ऐसे उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हमें बताते हैं कि पद बड़ा नहीं होता, पद पर बैठा व्यक्ति अपने आचरण से उसे बड़ा बनाता है।इसीलिए आज के युवाओं को राजनीति में आने से डरना नहीं चाहिए, लेकिन उन्हें जल्दबाजी भी नहीं करनी चाहिए। पहले अपनी शिक्षा पूरी करें, अपने पैरों पर खड़े हों, कुछ वर्षों का अनुभव प्राप्त करें, समाज की समस्याओं को समझें और फिर सार्वजनिक जीवन में आएँ।
वीरेश तिवारी के विचार में राजनीति में आने वाले युवा के लिए सबसे पहली पूँजी उसका चरित्र और जनविश्वास होना चाहिए। किसी बड़े नेता के साथ खड़े होने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि अपने काम से लोग उसके साथ खड़े हों।जिस युवा ने अपना जीवन और आर्थिक आधार मजबूत कर लिया है, वह कुछ समय समाज के लिए दे सकता है। जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत है, वे भी सार्वजनिक जीवन को अपना सकते हैं। पति या पत्नी में से कोई एक अच्छा कमा रहा हो और दूसरा समाज के लिए समय देना चाहता हो, तो यह भी संभव है।
लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए—राजनीति व्यक्तिगत सुरक्षा-कवच या व्यवसाय बचाने का साधन नहीं बननी चाहिए।
यदि कोई बड़ा कारोबारी राजनीति में केवल इसलिए आए कि पुलिस उसे न रोके, प्राधिकरण उससे सवाल न करे, प्रदूषण विभाग कार्रवाई न करे या अधिकारियों पर उसका व्यक्तिगत प्रभाव बना रहे, तो यह लोकतंत्र की सेवा नहीं है।देश को ऐसे उद्योगपतियों की भी आवश्यकता है जो अपने अनुभव, संसाधन और सोच को राष्ट्र निर्माण में लगाएँ। बड़े उद्योग जगत के लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, रोजगार और तकनीक में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन सार्वजनिक जीवन में आने पर उनका उद्देश्य केवल अपने व्यापार का विस्तार नहीं, बल्कि समाज का विस्तार होना चाहिए।
नई राजनीति में युवा भी आएँ और अनुभवी लोग भी। वैज्ञानिक आएँ, शिक्षक आएँ, प्रशासनिक अनुभव वाले लोग आएँ, सफल उद्यमी आएँ, सामाजिक कार्यकर्ता आएँ। लेकिन हर व्यक्ति के लिए कसौटी एक हो—
ज्ञान कितना है?
अनुभव कितना है?
चरित्र कैसा है?
और जनता के लिए किया क्या है?
युवाओं को नेताओं के पीछे भागने के बजाय अपने पीछे लोगों को जोड़ना सीखना होगा।
किसी बड़े नेता के साथ फोटो होना उपलब्धि नहीं है। उपलब्धि तब है जब किसी मोहल्ले, गाँव, शहर या पूरे समाज के लोग आपके काम के साथ खड़े हों।
आज देश को केवल नई उम्र के नेता नहीं चाहिए। उसे नई सोच वाले नेता चाहिए।
ऐसे नेता जो शिक्षा को केवल डिग्री नहीं, जीवन की तैयारी समझें।
स्वास्थ्य को केवल अस्पताल नहीं, खुशहाल जीवन समझें।
अर्थव्यवस्था को केवल पैसा नहीं, सम्मानजनक जीवन समझें।
और राजनीति को केवल सत्ता नहीं, जनसेवा की जिम्मेदारी समझें।
भारत की अगली राजनीतिक क्रांति शायद किसी बड़े नारे से नहीं आएगी।
वह उस दिन शुरू होगी जब देश का युवा यह कहेगा—
“मैं किसी नेता का पिछलग्गू बनने नहीं, अपने काम से जनता का विश्वास जीतने राजनीति में आऊँगा।”
और जब जनता भी यह कहेगी—
“हमें वह नेता चाहिए जिसके पास पद से पहले चरित्र, भाषण से पहले ज्ञान और सत्ता से पहले सेवा की भावना हो।”
यही राजनीति की नई दिशा हो सकती है।
यही शिक्षा का नया उद्देश्य हो सकता है।
और शायद यही एक अधिक स्वस्थ, खुशहाल और जिम्मेदार भारत की शुरुआत भी हो सकती है।
— वीरेश तिवारी
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी, सेक्टर 96
स्तंभकार एवं लेखक