भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां चुनाव केवल सत्ता के गठन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक विश्वास का सबसे बड़ा माध्यम हैं। ऐसे में चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था—भारत निर्वाचन आयोग—की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। चुनाव आयोग से देश की जनता की अपेक्षा रहती है कि वह निष्पक्ष, स्वतंत्र, पारदर्शी और किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर अपने दायित्वों का निर्वहन करे।
लेकिन जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर राजनीतिक दलों की ओर से सवाल उठाए जाते हैं, तो मामला केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास पर पड़ता है। इसलिए ऐसे सवालों पर भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों, संवैधानिक प्रावधानों और पारदर्शी संवाद के आधार पर विचार किया जाना आवश्यक है।
हाल के दिनों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई है। विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है और इसके माध्यम से मतदाताओं के नाम जोड़ने या हटाने में अनियमितता की आशंका पैदा होती है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपनी प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों का हवाला दिया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कोई राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि कानून के तहत चलने वाली प्रशासनिक एवं चुनावी प्रक्रिया है। इसमें पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना तथा अपात्र या निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करने वाले नामों के संबंध में कार्रवाई करना निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाता है।
सवाल उठना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं
लोकतंत्र में सवाल उठना अपने आप में किसी संस्था की कमजोरी का प्रमाण नहीं है। वास्तव में लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि सरकार हो, विपक्ष हो या संवैधानिक संस्था—हर किसी के काम पर सवाल पूछे जा सकते हैं।
विपक्ष का यह संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायित्व है कि वह सरकार तथा महत्वपूर्ण संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर नजर रखे। यदि विपक्ष को मतदाता सूची में किसी प्रकार की गड़बड़ी दिखाई देती है तो उसे सवाल उठाने, दस्तावेज मांगने और संबंधित अधिकारियों से जवाब लेने का पूरा अधिकार है।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि गंभीर आरोपों के साथ ठोस तथ्य और प्रमाण सामने रखे जाएं। केवल राजनीतिक बयानबाजी या संदेह के आधार पर किसी संवैधानिक संस्था की पूरी कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करना जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है।
SIR प्रक्रिया को लेकर क्यों उठा विवाद?
मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी इकाई है। जिस व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में है, वही चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकता है। इसलिए मतदाता सूची में एक योग्य नागरिक का नाम न होना जितनी गंभीर समस्या है, उतनी ही गंभीर समस्या किसी अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में बने रहना भी है।
यही कारण है कि मतदाता सूची का समय-समय पर पुनरीक्षण आवश्यक है। लेकिन पुनरीक्षण की प्रक्रिया जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उसकी पारदर्शिता भी है।
SIR को लेकर उठे विवाद ने इसी बिंदु को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। विपक्षी दलों की चिंता है कि व्यापक पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाता है और संबंधित मतदाता को आवश्यक प्रक्रिया के माध्यम से अपनी आपत्ति अथवा दावा प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया को राजनीतिक अविश्वास से बाहर निकालकर अधिकतम पारदर्शिता के साथ जनता के सामने रखा जाए।
चुनाव आयोग में मतभेद—क्या यह असामान्य है?
चुनाव आयोग को लेकर एक अन्य बहस उसके भीतर कथित मतभेदों को लेकर सामने आई। मीडिया में सामने आए कुछ दस्तावेजों और आंतरिक टिप्पणियों के आधार पर यह सवाल उठाया गया कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद थे।
चुनाव आयोग ने इस तरह की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी बड़े संवैधानिक या प्रशासनिक निर्णय से पहले अधिकारियों और सदस्यों के बीच विचार-विमर्श होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। किसी प्रस्ताव पर अलग राय होना अपने आप में संस्था के भीतर संकट या असहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
दरअसल, किसी भी मजबूत संस्थान की पहचान यही होती है कि वहां निर्णय लेने से पहले विभिन्न पक्षों पर चर्चा हो। ड्राफ्ट पर टिप्पणी, संशोधन का सुझाव, अलग राय या लिखित आपत्ति—ये सभी स्वस्थ संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब किसी आंतरिक विचार-विमर्श के एक हिस्से को पूरे संस्थागत निर्णय का अंतिम स्वरूप मान लिया जाए। इसलिए जरूरी है कि किसी भी दस्तावेज या आंतरिक टिप्पणी की व्याख्या उसके पूरे संदर्भ में की जाए।
अनुच्छेद 324 और चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी
भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की महत्वपूर्ण संवैधानिक जिम्मेदारी प्रदान करता है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि चुनाव प्रक्रिया राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त और स्वतंत्र रूप से संचालित हो सके।
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं होती। मतदाता सूची तैयार करने से लेकर चुनाव कार्यक्रम, नामांकन, मतदान, मतगणना और परिणाम की घोषणा तक पूरी चुनावी प्रक्रिया में आयोग और उसके अधीन काम करने वाली मशीनरी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इसीलिए चुनाव आयोग से जुड़ा प्रत्येक निर्णय सार्वजनिक विश्वास की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
वर्तमान कानूनी ढांचे में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 भी आयोग की नियुक्ति और कार्यप्रणाली से जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधानों का हिस्सा है। ऐसे में किसी भी विवाद पर चर्चा करते समय राजनीतिक आरोपों के साथ-साथ संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था को भी समझना जरूरी है।
मतदाता सूची में गलती की गुंजाइश क्यों नहीं होनी चाहिए?
लोकतंत्र में मतदाता सबसे महत्वपूर्ण होता है। सरकारें आती-जाती हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं और चुनाव परिणाम बदलते रहते हैं, लेकिन नागरिक का मताधिकार लोकतंत्र की स्थायी नींव है।
इसलिए मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम छूटना गंभीर चिंता का विषय है। उसी तरह फर्जी, मृत या अपात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में बने रहना भी चुनाव की विश्वसनीयता के लिए चुनौती है।
आधुनिक तकनीक ने मतदाता सूची प्रबंधन को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने के अवसर दिए हैं। डिजिटल डेटाबेस, डेटा सत्यापन और विभिन्न स्तरों पर जांच की व्यवस्था ने प्रक्रिया को मजबूत किया है। फिर भी तकनीक अंतिम समाधान नहीं है। मानवीय स्तर पर जांच, स्थानीय अधिकारियों की जवाबदेही और नागरिकों को आपत्ति दर्ज कराने की सरल व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
पारदर्शिता ही सबसे बड़ा समाधान
आज चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर जनता के विश्वास को मजबूत बनाए रखना है।
यदि किसी राजनीतिक दल को मतदाता सूची या चुनाव प्रक्रिया पर संदेह है, तो उसे अपने सवाल रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। आयोग को भी ऐसे सवालों का जवाब तथ्यों और आंकड़ों के साथ सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।
एक लोकतांत्रिक संस्था की ताकत केवल उसके संवैधानिक अधिकारों में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में भी होती है। इसलिए पारदर्शिता जितनी अधिक होगी, आरोपों और आशंकाओं की गुंजाइश उतनी ही कम होगी।
चुनाव आयोग को चाहिए कि वह समय-समय पर मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया, नाम जोड़ने और हटाने के आंकड़े, आपत्तियों के निस्तारण और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को सरल भाषा में सार्वजनिक करे। इससे राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम मतदाता भी प्रक्रिया को समझ सकेगा।
विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण
यह भी स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल चुनाव लड़ना नहीं है। विपक्ष सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछकर व्यवस्था को जवाबदेह बनाता है। यदि विपक्ष को किसी प्रक्रिया में गड़बड़ी दिखाई देती है तो उसका सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है।
लेकिन विपक्ष के सवालों की ताकत तभी बढ़ती है जब उनके पीछे प्रमाण और तथ्य हों।
राजनीतिक बहस में आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोप को प्रमाणित करना लोकतांत्रिक विमर्श को गंभीरता प्रदान करता है। इसी तरह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी भी केवल आरोपों को खारिज करना नहीं, बल्कि आवश्यक तथ्यों और प्रक्रियाओं को जनता के सामने स्पष्ट करना है।
संस्थाओं की गरिमा और जवाबदेही दोनों जरूरी
संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना लोकतंत्र की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी संस्था से सवाल नहीं पूछे जा सकते। बल्कि इसका अर्थ है कि सवाल तथ्यों के आधार पर पूछे जाएं और जवाब भी तथ्यों के साथ दिए जाएं।
लोकतंत्र में जवाबदेही और संस्थागत सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
यदि चुनाव आयोग पर सवाल उठते हैं तो आयोग को जवाब देना चाहिए। यदि आयोग कोई प्रक्रिया लागू करता है तो उसके पीछे का कानूनी आधार जनता को समझाना चाहिए। यदि विपक्ष आरोप लगाता है तो उसे भी अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए।
यही स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद है।
जनता का विश्वास सबसे बड़ी कसौटी
आखिरकार किसी भी चुनाव की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि मतदान कितना हुआ या परिणाम क्या आया। चुनाव की असली सफलता तब है जब हारने वाला पक्ष भी परिणाम को स्वीकार करे और जीतने वाला पक्ष भी यह विश्वास बनाए रखे कि उसे जनता का जनादेश निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से मिला है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर जिम्मेदारी इसलिए और अधिक है क्योंकि देश के करोड़ों नागरिकों का लोकतांत्रिक विश्वास उससे जुड़ा है।
राजनीतिक दलों के बीच मतभेद रहेंगे, चुनावी प्रतिस्पर्धा रहेगी और आरोप-प्रत्यारोप भी लोकतंत्र का हिस्सा रहेंगे। लेकिन इन सबके बीच संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर नहीं होनी चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयोग, राजनीतिक दल, मीडिया और नागरिक समाज—सभी मिलकर ऐसी चुनावी व्यवस्था को मजबूत करें जिसमें किसी योग्य मतदाता को अपने अधिकार से वंचित होने का डर न हो और किसी अपात्र व्यक्ति के माध्यम से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका न रहे।
भारत का लोकतंत्र अनेक चुनौतियों के बावजूद दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में मजबूती से खड़ा है। इसकी मजबूती का आधार केवल संविधान और कानून नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है।
चुनाव आयोग इस विश्वास का एक महत्वपूर्ण प्रहरी है। इसलिए आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की रक्षा जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है कि उसकी कार्यप्रणाली सवालों के लिए खुली और जवाबदेह भी रहे।
विपक्ष को सवाल पूछने चाहिए, चुनाव आयोग को जवाब देने चाहिए और मीडिया को दोनों पक्षों को तथ्यों के साथ जनता तक पहुंचाना चाहिए। किसी भी आरोप को अंतिम सत्य मान लेना या बिना जांच के खारिज कर देना—दोनों लोकतांत्रिक विमर्श के लिए उचित नहीं हैं।
लोकतंत्र की असली शक्ति आरोप लगाने में नहीं, बल्कि आरोपों की निष्पक्ष जांच, तथ्यों की सार्वजनिकता और जनता के विश्वास को बनाए रखने में है।
आज देश को ऐसी राजनीति और ऐसी संस्थागत संस्कृति की आवश्यकता है जहां असहमति को लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति माना जाए। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बनी रहे, राजनीतिक दलों की जवाबदेही सुनिश्चित हो और मतदाता का विश्वास सर्वोच्च रहे—यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
क्योंकि लोकतंत्र केवल वोट से नहीं चलता, लोकतंत्र उस विश्वास से चलता है कि हर वोट की कीमत बराबर है और हर मतदाता का अधिकार सुरक्षित है।
लेखक : आलोक द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार एवं अध्यक्ष, नोएडा मीडिया क्लब