धारा के साथ बहना आसान होता है। उसमें पहचान, संसाधन और अवसर मिल सकते हैं। कठिनाई तब आती है, जब कोई व्यक्ति या संस्था प्रचलित दिशा से अलग रास्ता चुनती है। ऐसे प्रयासों को आलोचना, असहमति और कभी-कभी अपनों की नाराज़गी का सामना भी करना पड़ता है। फिर भी जो लोग अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं, वे समय के साथ समाज का विश्वास अर्जित करते हैं।सेक्टर-11, नोएडा में सोशल प्रोग्रेस एसोसिएशन की शुरुआत इसी सोच के साथ हुई है—विकास के बीच सामाजिक सरोकारों को प्राथमिकता देने, बुज़ुर्गों के अकेलेपन को समझने और कंक्रीट के बढ़ते विस्तार के बीच हरियाली बचाने की एक सामूहिक पहल।
श्रीमती प्रभा जयरथ के अनुसार अपनी हरियाली, खुले वातावरण और शांत जीवनशैली के लिए पहचाने जाने वाले सेक्टर-11 में बढ़ते व्यावसायिक निर्माण और पार्किंग की समस्या को लेकर स्थानीय निवासियों की चिंताएँ बढ़ रही हैं। जिन पार्कों और पेड़ों ने इस क्षेत्र की पहचान बनाई, उन पर पार्किंग और निर्माण का दबाव चिंता का विषय है। आवासीय सड़कों पर व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ी गाड़ियों की बढ़ती संख्या ने भी स्थिति को जटिल बनाया है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह क्षेत्र धीरे-धीरे अपनी मूल पहचान खो रहा है।
सोशल प्रोग्रेस एसोसिएशन का मानना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन उसका अर्थ केवल निर्माण, व्यावसायिक गतिविधियों और वाहनों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए। संतुलित विकास में हरियाली का संरक्षण, जल-संरक्षण, बेहतर सड़कें, स्वच्छ हवा और सुरक्षित सार्वजनिक वातावरण भी शामिल हैं। महँगी गाड़ियाँ और ऊँची इमारतें किसी क्षेत्र को आधुनिक रूप दे सकती हैं, लेकिन उसकी सामाजिक पहचान हरियाली, मानवीय संवेदनाओं और नागरिक एकजुटता से बनती है।
सुषमा नेब के अनुसार बुज़ुर्गों के अकेलेपन को समझने की पहल
संस्था की प्रमुख चिंताओं में वरिष्ठ नागरिकों का अकेलापन शामिल है। अनेक बुज़ुर्गों ने जीवनभर अपने परिवार और बच्चों के लिए योगदान दिया, लेकिन उम्र के उस पड़ाव पर वे अकेले रह जाते हैं, जब उन्हें साथ, संवाद और भावनात्मक सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।संगीता सचदेवा के अनुसार शिक्षा और रोज़गार के कारण बच्चे दूसरे शहरों या देशों में बस जाते हैं। ऐसे में माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद भावनात्मक रूप से अकेले पड़ सकते हैं। सुमन गर्ग कहती हैं कि बीमारी,सीमित गतिशीलता और दैनिक आवश्यकताओं से जुड़ी कठिनाइयाँ इस स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। इसलिए केवल आर्थिक सुविधा पर्याप्त नहीं; सम्मान, बातचीत और सामाजिक सहभागिता भी उतनी ही आवश्यक हैं।
सोशल प्रोग्रेस एसोसिएशन का उद्देश्य है कि कोई भी बुज़ुर्ग केवल इसलिए अकेला महसूस न करे कि उसके बच्चे दूर रहते हैं या वह स्वयं आसानी से बाहर नहीं जा सकता।संस्था ऐसे वरिष्ठ नागरिकों से जुड़ने का प्रयास कर रही है, जो अकेले रहते हैं, सविता अरोड़ा के अनुसार जिन्हें नियमित रूप से मिलने वाला कोई नहीं है या जिन्हें शारीरिक कठिनाइयों के कारण सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होना मुश्किल लगता है। हमारा उद्देश्य केवल उन्हें कार्यक्रमों में आमंत्रित करना नहीं, बल्कि उनके जीवन में अपनत्व और सहभागिता का अनुभव बढ़ाना भी है।संस्था के युवा कार्यकर्ताओं सुनील शर्मा, कार्तिकेय, विभूति शर्मा मानने हैं कि यदि सीनियर स्वयं संस्था तक नहीं पहुँच सकते, उनसे उनकी सुविधा के अनुसार मिलने, बातचीत करने और उनकी आवश्यकताओं को समझने का पूरा प्रयास उनके द्वारा किया जाएगा।
महिलाओं की पहल, पुरुषों का सहयोग और संवाद की संस्कृति
सोशल प्रोग्रेस एसोसिएशन की एक विशेषता यह है कि यहाँ महिलाएँ सामाजिक पहलों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं और पुरुष कार्यकर्ता विनोद घई, मनोज कुमार जी सहयोगी के रूप में उनके साथ खड़े होते हैं। महिलाओं की भागीदारी को औपचारिक समर्थन तक सीमित रखने के बजाय उनके विचारों पर चर्चा की जाती है और सामूहिक सहमति से निर्णय लेने का प्रयास किया जाता है। कविता राठौर मेंटल हेल्थ, लक्ष्मी, गगन वालिया संस्कृतिक प्रकोष्ठ संभालती हैं लक्ष्मी जी जोकि योगा गुरु हैं योगा परामर्श संस्था का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति का प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि ऐसी टीम विकसित करना है जिसमें प्रत्येक सदस्य की भागीदारी और विचारों का सम्मान हो। संस्था का विश्वास है कि महिलाओं का नेतृत्व और पुरुषों का समानतापूर्ण सहयोग सामाजिक संवाद और संवेदनशीलता को मजबूत कर सकता है।
दिवाली मिलन: रिश्तों में अपनापन बढ़ाने का अवसर
इसी भावना के साथ 25 अक्टूबर 2026 को सोशल प्रोग्रेस एसोसिएशन ने दिवाली मिलन कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें संस्था के अनेक सदस्य शामिल हुए। अध्यक्ष अंजना भागी और कार्यकारिणी के सदस्यों ने सामाजिक गतिविधियों, सदस्यों के योगदान और आगामी योजनाओं पर चर्चा की। इस अवसर पर सदस्यों के प्रयासों की सराहना भी की गई।यह आयोजन केवल त्योहार मनाने तक सीमित नहीं था। यह एक-दूसरे से संवाद करने, सामूहिक प्रयासों को पहचानने और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराने का अवसर भी बना।संस्था का मानना है कि त्योहारों की खुशी तभी सार्थक होती है, जब आसपास रहने वाला कोई बुज़ुर्ग उपेक्षित न रहे, अकेलेपन से जूझ रहा व्यक्ति स्वयं को समाज से अलग न समझे और शारीरिक रूप से असमर्थ व्यक्ति भी सम्मानपूर्वक सामुदायिक जीवन में शामिल हो सके।
उद्देश्य: संगठन से आगे, संवेदनाओं का परिवार
सोशल प्रोग्रेस एसोसिएशन अभी अपने प्रारंभिक चरण में है, लेकिन इसके उद्देश्य स्पष्ट हैं—वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल, अकेलेपन से जूझ रहे लोगों को सामाजिक सहारा, महिलाओं की भागीदारी, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक समस्याओं को सामूहिक रूप से उठाना।संस्था मानती है कि धारा के विपरीत चलना आसान नहीं होता। असहमति और चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं, लेकिन यदि उद्देश्य सार्वजनिक हित से जुड़ा हो और प्रयास निरंतर व ईमानदार हों, तो धीरे-धीरे लोगों का सहयोग प्राप्त किया जा सकता है।
संस्था का लक्ष्य केवल एक बेहतर सेक्टर बनाना नहीं, बल्कि ऐसा समुदाय विकसित करना है जहाँ हरियाली सुरक्षित रहे, नागरिकों का जीवन बेहतर हो और जीवन की संध्या में खड़े बुज़ुर्ग स्वयं को अकेला न समझें।
किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति केवल उसकी इमारतों की ऊँचाई या आर्थिक गतिविधियों से नहीं मापी जाती। उसका आकलन इस बात से भी होता है कि वहाँ रहने वाले लोग एक-दूसरे के प्रति कितनी संवेदना, सम्मान और जिम्मेदारी रखते हैं।