बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के तहत आने वाले बिलौटी नामक गांव के एक युवा भरतभूषण तिवारी के एनकाउंटर को लेकर देश भर मेंकुहराम मचा हुआ है। गंगा के बाढ़ से हर साल होतेकटाव के कारण होने वाली लोगों की समस्याओं और ऐसे ही जनसरोकार के अन्य मुद्दों को लेकर
प्रशासन और सरकार तक जनता की बात पहुंचाने के लिये अपने इलाके में मशहूर यह नवयुवक जिनपरिस्थितियों में पुलिस द्वारा कथित एनकाउंटर में मारा गया, उसे लेकर सवाल उठने लाजिमी हैं। पिछलेदो दिनों से पूरा देश, विशेषकर दो बड़े हिन्दी भाषी राज्य (बिहार-उत्तर प्रदेश) सुलग उठे हैं। बिहार में तो
जगह-जगह सरकार व पुलिस के खिलाफ लोग विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे राज्य सरकार को उसकीउच्चस्तरीय जांच के आदेश देने पड़े हैं।यह एनकाउंटर बेहद संदिग्ध हालत में हुआ है- बावजूद इसके कि उसे लाखों ने सोशल मीडिया पर लाइवदेखा।
पहले तो पुलिस ने उसे मानसिक रूप से असंतुलित बताया। फिर बड़ी संख्या में उसके गांव व घरको घेर लिया। हालांकि भरत ने अपना पिस्टल सरेंडर के रूप में पुलिस को सौंप दिया था। इसके बाद भीउसे चार गोलियां मारी गयीं। इतना ही नहीं, पुलिस ने उसके परिजनों तथा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़रिपोर्ट लिखकर उन्हें गिरफ्तार कर दिया।सवाल यह है कि क्या देश में यह पहला एनकाउंटर था जिसे लेकर लोग सुलग उठे हैं। ऐसा बिलकुलनहीं है। 2014 में केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी भारतीय जनता पार्टी की लगातार तीन बारबनी सरकारों की इसे देन कहा जा सकता है। घोषणापत्र में किये गये वादे पूरे हों या नहीं, कुछ होने परउसकी जवाबदेही किसकी हो- यह तय करने की जहमत उठाने की ज़रूरत नहीं तथा उपलब्धि के नाम परआधारहीन आंकड़े और विपक्ष को गालियां देकर यदि सत्ता में बने रहा जा सकता है तो मोदी एवं उनकीभाजपा के लिये कोई ज़रूरत ही नहीं रह जाती कि वे उम्दा प्रदर्शन करें तथा सकारात्मक नतीजे दें जो लोगों के जीवन में सुधार लाएं।
जिन राज्यों में भाजपा की कथित डबल इंजिन की सरकारें हैं वहां विकास के नाम पर तो कुछ खासउपलब्धियां नहीं दिखलाई पड़तीं, उल्टे नुकसान यह हुआ है कि सरकार के विरूद्ध आवाज उठाने कीगुंजाइशें बन्द हो गयी हैं। ऐसे राज्यों की बदहाली, अराजकता और हिंसा के खिलाफ कहीं भी शिकायतनहीं होती। एक राज्य खोने के डर से केन्द्र ऐसे राज्यों के कुशासन को और प्रश्रय और बढ़ावा देता है।इन 12 वर्षों में अब सरकार को जनअसंतोष की चिंता करने की ज़रूरत नहीं रह गयी है क्योंकि अबभाजपा के पास चुनाव जीतने की मुकम्मल व्यवस्था है- फिर कोई उसे वोट दे या नहीं। हर राज्य मेंएसआईआर के जरिये भाजपा ने अपनी जनता चुन ली है। विरोधी वोट काट दिये गये हैं और समर्थकमतदाताओं को बनाये रखा गया है। यह हेरा-फेरी इतने बड़े पैमाने पर की गयी है कि उसके असर सेविरोधी दलों के लिये सत्ता को हराना बहुत आसान हो गया है। भाजपा की चुनावों में एंट्री बढ़त के साथहोती है, जिसकी भरपायी में ही गैर-भाजपायी दलों को अपने काफी कम संसाधनों को झोंक देना पड़ताहै। बिहार एवं पश्चिम बंगाल में जो कुछ हुआ वह तो झांकी है। यह पैटर्न उन सभी राज्यों में अपनायाजायेगा जहां चुनाव होने वाले हैं या होंगे।इस सबके चलते हिन्दुस्तान का बड़ा हिस्सा इस हिंसा और अपराध के जातिकरण के शिखर पर जा
पहुंचा है। बड़ी तादाद में हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा इसी जातीय अहंकार और हिंसा के इर्द-गिर्द विकसितहुई है।
हिन्दू राष्ट्र में ऐसा नहीं कि केवल अल्पसंख्यक, दलित ओबीसी, आदिवासी ही मारे जायेंगे याप्रताड़ित होंगे- स्वयं सवर्ण हिन्दू इस हिंसक विचारधारा की जद में आ चुके हैं। उसे सुरक्षित रहने केलिये अब इतना ही पर्याप्त नहीं रह गया है कि वह भाजपा का वोटर हो। यदि वह सत्ता से सवाल करेगातो उसे भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता होने से कोई छूट नहीं मिल जायेगी।अब तक अन्य जातियों एवं सम्प्रदायों के एनकाउंटर, उनकी मॉब लिंचिंग तथा उनके घरों पर बुलडोजरचलता देखकर खुश होने वाले सवर्ण आज चाहे आंसू बहा रहे हों परन्तु इस सड़क पर न्याय के खिलाफआवाज़ें उठाने वाले काफी पहले से लोगों तथा सरकारों को चेता रहे थे कि यह रास्ता बर्बादी की ओरजाता है। तब ऐसे लोगों को देशद्रोही, हिन्दूविरोधी, पाक-परस्त आदि न जाने क्या-क्या कहा जाता था।अंतत: वह दिन आ ही गया कि जो कार्यपालिका को न्यायिक अधिकार सौंपने के हो सकते हैं।
देश ने कई जघन्य एनकाउंटर देखे हैं परन्तु वे अतिविशिष्ट परिस्थितियों में हुए हैं। उन पर सरकारों नेऔर कार्ट ने संज्ञान लिया है और यथासम्भव पीड़ितों को न्याय दिलाने की कोशिश की। बहुत सम्भव हैकि उनमें से कुछ प्रयत्न नाकाम भी हुए होंगे लेकिन पिछली सरकारों की कोशिशों पर उंगली नहीं उठाईजा सकती।2014 की भाजपा सरकार हिन्दू-मुस्लिम विभाजन और जातीय संघर्ष का एजेंडा लेकर आई थी तथा उसेसफलता भी मिली थी। उसी का इस्तेमाल 2019 तथा 2024 के लोकसभा चुनावों में किया गया। बची-खुची कमी एसआईआर, ईवीएम, चुनाव आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैये तथा केन्द्रीय जांच एजेंसियों ने पूरीकर दी। वैसे भी जब शासक की जीत सुनिश्चित हो तो सरकारों को सुशासन और खुशहाली से कुछ लेना-देना नहीं रह जाता। कहें तो ज़रूरत ही नहीं रह जाती।इस एक दशक में हथियारों के प्रति वीभत्स अनुराग पैदा कर दिया गया है। शक्तिशाली लोग इसकाइस्तेमाल कमजोरों और निहत्थों को दबाने में कर रहे हैं। पुलिस को संविधान के ऊपर उठकर काम करनेकी छूट दी गयी।
भाजपा समर्थित लोग शक्ति का खुलकर उपयोग कमजोरों के साथ-साथ सरकार सेप्रश्न करने वालों के विरूद्ध कर रहे हैं। अनेक एनकाउंटर निहत्थे लोगों पर किये गये। फिर चाहे वहव्यक्तिगत हो या समूह के तौर पर। भरत भूषण को न्याय शायद ही मिले।