विरीश तिवारी
आज की भागती-दौड़ती जिंदगी में मनुष्य के पास शब्द बहुत हैं, लेकिन ठहरने का समय कम है। मोबाइल की स्क्रीन पर लगातार संदेश आते हैं, सूचनाएं बदलती रहती हैं और हम एक बात से दूसरी बात की ओर बढ़ते रहते हैं। ऐसे समय में जापान की छोटी-सी काव्य-विधा हाइकू (Haiku) हमें एक बहुत बड़ी बात सिखाती है—कम शब्दों में भी जीवन को पूरी गहराई से महसूस किया जा सकता है।हाइकू जापान की पारंपरिक लघु कविता है। इसका पारंपरिक रूप 5-7-5 के ध्वनि-विन्यास से जुड़ा है। प्रकृति, मौसम, किसी छोटे दृश्य या जीवन के किसी क्षण को आधार बनाकर इसमें ऐसी अनुभूति पैदा की जाती है, जो कविता खत्म होने के बाद भी मन में बनी रहती है।हाइकू की खूबसूरती यही है कि यह सब कुछ कह नहीं देता। वह पाठक को थोड़ा-सा दिखाता है और बाकी महसूस करने के लिए छोड़ देता है।
एक पत्ता भी कविता हो सकता है
सुबह पेड़ से एक पत्ता गिरता है। आम आदमी उसे देखकर आगे बढ़ जाता है। लेकिन कवि वहीं रुक जाता है। वह सोचता है—कल तक यह पत्ता पेड़ का हिस्सा था, आज जमीन पर है। प्रकृति का यह छोटा-सा दृश्य जीवन, समय और परिवर्तन की पूरी कहानी कह जाता है।
पत्ता गिरा चुपचाप,
पेड़ खड़ा कुछ सोचता—
ऋतु बदल गई।
यही हाइकू की दृष्टि है—जो सामने है, उसमें छिपे हुए अर्थ को देख लेना।
बाशो और पुराने तालाब की कहानी
जापानी हाइकू की चर्चा हो और मात्सुओ बाशो का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। बाशो जापान के महान हाइकू कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने यात्राएं कीं और प्रकृति तथा साधारण जीवन के दृश्यों में कविता खोजी।उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में एक पुराने तालाब और उसमें कूदते मेंढक का दृश्य है। घटना बहुत छोटी है—एक शांत तालाब, एक मेंढक और पानी में उठी आवाज। लेकिन उस छोटे-से दृश्य में अचानक जीवन की गति और फिर लौटती शांति महसूस होती है।इसी भाव को हिंदी में हम यूं महसूस कर सकते हैं—
पुराना तालाब,
मेंढक कूदा पानी में—
फिर वही शांति।
कविता छोटी है, लेकिन दृश्य पूरा है। यही हाइकू का कमाल है।
हाइकू और हमारी जिंदगी
हाइकू केवल कविता लिखना नहीं सिखाता, वह देखना और महसूस करना सिखाता है।
बारिश की पहली बूंद,
खिड़की पर बैठी चिड़िया,
दादी के चेहरे की मुस्कान,
स्कूल से लौटता बच्चा,
शाम को घर लौटता किसान—
इनमें से हर दृश्य अपने भीतर एक कहानी रखता है।
बारिश की बूंद,
मिट्टी ने आंखें खोल दीं—
खुशबू आ गई।

कितने कम शब्द हैं, लेकिन बारिश का पूरा मौसम सामने आ जाता है।
एक छोटी-सी सीखएक बच्चा रोज स्कूल जाते समय रास्ते के एक पेड़ के नीचे से गुजरता था। वह पेड़ को कभी ध्यान से नहीं देखता था। एक दिन बारिश के बाद उसकी नजर एक पत्ते पर ठहरी पानी की बूंद पर पड़ी। सूरज की किरण उस बूंद पर पड़ी तो वह मोती की तरह चमक उठी।बच्चा कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा और फिर स्कूल चला गया।उसने उस दिन कोई कविता नहीं लिखी, लेकिन उसने हाइकू की सबसे पहली शिक्षा सीख ली—रुककर देखना।हम सब चीजें देखते हैं, लेकिन उन्हें महसूस कितने लोग करते हैं?
हाइकू की सबसे बड़ी सीख
हाइकू हमें बताता है कि जिंदगी की बड़ी खुशियां हमेशा बड़ी घटनाओं में नहीं होतीं।
कभी चाय की पहली चुस्की में खुशी है।
कभी बारिश की आवाज में।
कभी मां की आवाज में।
कभी खेत की मिट्टी में।
कभी किसी पुराने दोस्त की अचानक आई याद में।
शाम ढली धीरे,
चिड़िया घर लौट गई—
मन भी लौट आया।
शायद यही कारण है कि हाइकू आज भी प्रासंगिक है। जब दुनिया हमें लगातार तेज चलने के लिए कह रही है, हाइकू हमें कुछ क्षण ठहरना सिखाता है।
विरीश तिवारी की नजर से...
हाइकू को समझते हुए मुझे लगता है कि इसकी सबसे बड़ी खूबी 5-7-5 के नियम में नहीं, बल्कि उस संवेदना में है जो इन छोटे शब्दों के पीछे छिपी होती हैहमारे आसपास हर दिन हजारों दृश्य घटते हैं। कोई किसान खेत में बीज डालता है, कोई मां बच्चे को स्कूल भेजती है, कोई बुजुर्ग शाम को छत पर बैठकर डूबता सूरज देखता है। जीवन की यही छोटी-छोटी तस्वीरें वास्तव में हमारी बड़ी कहानी बनाती हैं।

सूरज डूब गया,
आंगन में बैठी चुप शाम—
घर भर गया मन।
यही हाइकू है—एक छोटा दृश्य, एक गहरी अनुभूति और पाठक के मन में खुलता हुआ एक पूरा संसार।
अंत में
आज जब शब्दों की भीड़ बढ़ती जा रही है, हाइकू हमें शब्दों की सादगी का महत्व समझाता है।
यह कहता है—
थोड़ा रुकिए।
आसपास देखिए।
जो महसूस हो, उसे संजो लीजिए।
क्योंकि जिंदगी शायद बड़ी घटनाओं का नाम नहीं है। जिंदगी तो उन छोटे-छोटे क्षणों का संग्रह है, जिन्हें हम अक्सर बिना देखे गुजर जाने देते हैं।और हाइकू उन्हीं क्षणों को पकड़कर कहता हैकम शब्दों में भी एक पूरी जिंदगी लिखी जा सकती है।
विरेश तिवारी
जनतंत्र एवं स्तंभकार
चेयरमैन, चंद्रावती ग्रुप
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी