डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा का अधिकार देता है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल चुनाव नहीं, बल्कि ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था है जिसमें नागरिक अपने वैधानिक अधिकार बिना भय, बिना सिफ़ारिश और बिना रिश्वत प्राप्त कर सके। जब किसी नागरिक को अपने ही अधिकार के लिए अवैध भुगतान करना पड़े, तब यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर प्रहार है।
रिश्वत को समाज ने अनेक नाम दे दिए हैं—सुविधा शुल्क, चाय-पानी, सेवा शुल्क, नजराना। शब्द बदल जाने से उसका चरित्र नहीं बदलता। यह नागरिक के अधिकार का व्यापार है। जिस कार्य को कानून के अनुसार निःशुल्क या निर्धारित शुल्क पर होना चाहिए, उसके लिए अतिरिक्त धन माँगना लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्वीकार्य है।
विश्व की अग्रणी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025 में भारत को 39 अंक प्राप्त हुए और 182 देशों में 91वाँ स्थान मिला। यह सूचकांक सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की धारणा को मापता है और यह संकेत देता है कि भारत में सुधार की आवश्यकता अभी भी गंभीर रूप से बनी हुई है।

भ्रष्टाचार केवल बड़े घोटालों तक सीमित नहीं है। उसका सबसे व्यापक रूप वह है जो आम नागरिक को प्रतिदिन प्रभावित करता है। जन्म प्रमाण-पत्र, भूमि अभिलेख, पुलिस में शिकायत, स्थानीय निकायों की अनुमति, पेंशन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, स्वास्थ्य सेवाएँ और अनेक प्रशासनिक प्रक्रियाएँ—यदि इनमें पारदर्शिता और समयबद्धता का अभाव हो, तो नागरिक और व्यवस्था के बीच अविश्वास पैदा होता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि हर कार्यालय या हर कर्मचारी भ्रष्ट है, क्योंकि देश में बड़ी संख्या में ईमानदार अधिकारी और कर्मचारी भी अपनी सेवाएँ पूरी निष्ठा से दे रहे हैं। किंतु जहाँ भ्रष्टाचार होता है, वहाँ उसका प्रभाव पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ता है।
व्यवहार विज्ञान बताता है कि जब किसी समाज में अनुचित आचरण को लंबे समय तक दंड नहीं मिलता, तो वह धीरे-धीरे सामाजिक सामान्यता का रूप लेने लगता है। यही सबसे बड़ा खतरा है। यदि नागरिक यह मानने लगे कि बिना रिश्वत काम होना असंभव है, तो कानून का शासन कमजोर और अनौपचारिक शक्ति-तंत्र मजबूत होने लगता है।
पिछले वर्षों में डिजिटल शासन ने अनेक सकारात्मक परिवर्तन किए हैं। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ऑनलाइन कर प्रणाली, डिजिटल भुगतान, ई-टेंडरिंग, ऑनलाइन पासपोर्ट और अनेक नागरिक सेवाओं ने पारदर्शिता बढ़ाई है तथा मानवीय हस्तक्षेप कम होने से कई क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की संभावनाएँ भी घटी हैं। फिर भी जहाँ अंतिम निर्णय किसी अधिकारी के विवेक पर निर्भर रहता है, वहाँ जवाबदेही की आवश्यकता बनी रहती है।
भ्रष्टाचार का सबसे अधिक बोझ गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है। सम्पन्न व्यक्ति अतिरिक्त भुगतान को सुविधा मान सकता है, परन्तु गरीब परिवार के लिए वही राशि भोजन, दवा या बच्चों की शिक्षा का खर्च होती है। इसलिए भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के विरुद्ध भी अपराध है। यह अवसरों की समानता को कमजोर करता है और विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने में बाधा बनता है।
समाधान केवल कठोर कानून नहीं, बल्कि सुशासन है। प्रत्येक सरकारी सेवा की स्पष्ट समय-सीमा हो। प्रक्रियाएँ सरल और पारदर्शी हों। शिकायतकर्ता को कानूनी सुरक्षा मिले। तकनीक का अधिकतम उपयोग हो। दोषी पाए जाने पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित हो। साथ ही, ईमानदार अधिकारियों को संस्थागत संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है जितना भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध दंड।
नागरिकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सुविधा के नाम पर दी गई छोटी रिश्वत भी उसी संस्कृति को मजबूत करती है जो आगे चलकर बड़े भ्रष्टाचार को जन्म देती है। यदि समाज यह स्वीकार कर ले कि अधिकार खरीदे नहीं जाते, बल्कि कानून से प्राप्त होते हैं, तो परिवर्तन की शुरुआत यहीं से होगी।
भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अब आवश्यकता केवल आर्थिक शक्ति बनने की नहीं, बल्कि नैतिक और प्रशासनिक विश्वसनीयता में भी अग्रणी बनने की है। जब किसी गरीब को अस्पताल में उपचार के लिए सिफ़ारिश की आवश्यकता न हो, किसान को अपने भूमि अभिलेख के लिए दलाल न खोजने पड़ें, वृद्ध को पेंशन के लिए अपमानित न होना पड़े और किसी युवा को नौकरी के लिए योग्यता के अतिरिक्त कुछ भी न देना पड़े—तभी लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ साकार होगा।
रिश्वत कोई सुविधा शुल्क नहीं है। यह नागरिक के अधिकार, संविधान की गरिमा और राष्ट्र के भविष्य पर लगाया गया अदृश्य कर है। इसे समाप्त करने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि शासन, प्रशासन और समाज—तीनों की साझा जिम्मेदारी है। जब ईमानदारी व्यवस्था का अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य व्यवहार बन जाएगी, तभी भारत सुशासन की उस ऊँचाई पर पहुँचेगा जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी।