वीरेश तिवारी — जनतंत्र एवं स्तंभकार
सदस्य, ट्रिब्यूनल नोएडा अथॉरिटी
हर वर्ष मानसून का आगमन भारत के लिए केवल मौसम का परिवर्तन नहीं होता, बल्कि यह हमारी विकास नीतियों, शहरी नियोजन, प्रशासनिक क्षमता और नागरिक जिम्मेदारी की वास्तविक परीक्षा भी बन जाता है। मानसून भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल संसाधनों और पर्यावरण का आधार है। किसान इसकी प्रतीक्षा करता है, नदियाँ इससे जीवन पाती हैं और भूजल का पुनर्भरण इसी से होता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस वर्षा को प्रकृति का सबसे बड़ा वरदान माना जाना चाहिए, वही अनेक शहरों में संकट और अव्यवस्था का पर्याय बन जाती है।पहली तेज बारिश के साथ ही देश के अनेक महानगरों और छोटे शहरों की तस्वीर बदल जाती है। कहीं सड़कें नदियों का रूप ले लेती हैं, कहीं अंडरपास जलाशय बन जाते हैं, कहीं घंटों लंबा जाम लग जाता है, तो कहीं अस्पताल, स्कूल और बाजार तक पानी से घिर जाते हैं। रेल और हवाई सेवाएँ प्रभावित होती हैं, बिजली व्यवस्था बाधित होती है और लाखों लोगों का दैनिक जीवन ठहर जाता है। यह दृश्य हर वर्ष दोहराया जाता है, इसलिए अब इसे केवल प्राकृतिक आपदा कहकर नहीं टाला जा सकता।
प्रश्न यह नहीं है कि बारिश अधिक हुई या कम। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे शहरों की संरचना बदलते मौसम और बढ़ती आबादी के अनुरूप विकसित हुई है? यदि हर वर्ष वही समस्याएँ सामने आती हैं, तो इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं हमारी योजना, क्रियान्वयन और निगरानी में गंभीर कमी है।
आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लाखों लोग रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन अधिकांश शहरों का विस्तार बिना समुचित योजना के हुआ है। प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बंद हो गए, तालाबों और झीलों पर अतिक्रमण हो गया, वर्षा जल को सोखने वाले खुले क्षेत्र कंक्रीट के जंगल में बदल गए। जब पानी के प्राकृतिक मार्ग समाप्त कर दिए जाते हैं, तब वर्षा का जल सड़कों और बस्तियों में अपना रास्ता स्वयं बना लेता है।एक और गंभीर समस्या यह है कि अनेक स्थानों पर नालों की सफाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। कागज़ों में करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं, लेकिन पहली बारिश ही वास्तविक स्थिति सामने ला देती है। कहीं प्लास्टिक कचरा जल निकासी रोक देता है, कहीं अधूरे निर्माण कार्य पानी के बहाव में बाधा बन जाते हैं, तो कहीं अतिक्रमण पूरे तंत्र को निष्प्रभावी कर देता है।
हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अब लंबे समय तक हल्की बारिश की बजाय कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ बढ़ रही हैं। पुराने ड्रेनेज सिस्टम ऐसी परिस्थितियों के लिए बने ही नहीं थे। इसलिए शहरों को नई जलवायु वास्तविकताओं के अनुरूप विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। स्मार्ट सिटी केवल चौड़ी सड़कें, ऊँची इमारतें और आकर्षक प्रकाश व्यवस्था नहीं होती। एक सच्चा स्मार्ट शहर वह है जो प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो। जहाँ बारिश के कुछ घंटों बाद सामान्य जीवन फिर से पटरी पर लौट आए। जहाँ जल निकासी वैज्ञानिक ढंग से हो, वर्षा जल का संरक्षण किया जाए और हर विकास परियोजना पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर बनाई जाए।
यह भी सच है कि केवल प्रशासन को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। नागरिकों की छोटी-छोटी लापरवाहियाँ भी बड़ी समस्याओं का कारण बनती हैं। नालों में प्लास्टिक फेंकना, सार्वजनिक स्थानों पर कचरा डालना, अवैध निर्माण को बढ़ावा देना और जल संरक्षण की उपेक्षा—ये सब मिलकर संकट को और गंभीर बनाते हैं। शहर केवल सरकार के नहीं होते, वे नागरिकों के भी होते हैं। इसलिए समाधान भी साझी जिम्मेदारी से ही निकलेगा।अब समय आ गया है कि मानसून की तैयारी को मौसमी गतिविधि नहीं, बल्कि पूरे वर्ष चलने वाली प्रक्रिया बनाया जाए। प्रत्येक नगर निकाय को वर्षा से पहले ड्रेनेज ऑडिट कराना चाहिए। जलभराव वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक मानचित्र तैयार होना चाहिए। वर्षा जल संचयन प्रत्येक सरकारी और निजी भवन में प्रभावी ढंग से लागू होना चाहिए। आधुनिक सेंसर, मौसम पूर्वानुमान और डिजिटल निगरानी प्रणाली का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए ताकि संकट आने से पहले ही आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
देश के कुछ शहरों ने इस दिशा में सकारात्मक प्रयास भी किए हैं। कई स्थानों पर झीलों का पुनर्जीवन हुआ है, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा मिला है और जल निकासी व्यवस्था में सुधार हुआ है। इन सफल मॉडलों का अध्ययन कर उन्हें अन्य शहरों में भी लागू किया जाना चाहिए। भारत जैसे विशाल देश में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान विकसित करना ही सबसे व्यावहारिक रास्ता होगा।हमें यह भी समझना होगा कि वर्षा का पानी समस्या नहीं है, बल्कि उसका अव्यवस्थित प्रबंधन समस्या है। जिस पानी को हम सड़कों पर बह जाने देते हैं, वही भविष्य में जल संकट के समय अमूल्य सिद्ध होता है। यदि हर शहर वर्षा जल को संरक्षित करने की व्यापक योजना बनाए, तो बाढ़ और जल संकट—दोनों समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
नीति निर्माण में भी अब अल्पकालिक सोच से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। केवल चुनावी घोषणाओं या तात्कालिक मरम्मत से स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। नगर नियोजन, पर्यावरण संरक्षण, जल संसाधन, सड़क निर्माण और आपदा प्रबंधन—इन सभी विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा। विकास और प्रकृति के बीच संतुलन ही भविष्य का सबसे बड़ा मंत्र है।भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। विकसित राष्ट्र की पहचान केवल तेज आर्थिक विकास से नहीं होती, बल्कि ऐसे सक्षम शहरों से होती है जो प्राकृतिक चुनौतियों का भी मजबूती से सामना कर सकें। यदि हर मानसून हमारे शहर ठहर जाएँ, तो यह विकास की गति पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
आज आवश्यकता किसी एक विभाग, किसी एक सरकार या किसी एक संस्था को दोष देने की नहीं है। आवश्यकता है सामूहिक संकल्प की। प्रशासन अपनी जवाबदेही निभाए, जनप्रतिनिधि दीर्घकालिक सोच अपनाएँ, विशेषज्ञों की सलाह को महत्व दिया जाए और नागरिक अपने शहर को अपना घर समझकर व्यवहार करें। यही स्थायी समाधान का मार्ग है।मानसून हर वर्ष आएगा। वर्षा भी होगी, नदियाँ भी बहेंगी और बादल भी बरसेंगे। बदलना यदि कुछ है, तो हमारी सोच, हमारी तैयारी और हमारी प्राथमिकताएँ। जिस दिन हम वर्षा को संकट नहीं बल्कि संसाधन मानकर योजनाएँ बनाएँगे, उसी दिन हमारे शहर वास्तव में आधुनिक, सुरक्षित और भविष्य के लिए तैयार कहलाएँगे।
अंततः प्रश्न केवल इतना नहीं कि "क्या हमारे शहर मानसून के लिए तैयार हैं?" बल्कि यह भी है कि क्या हम, एक समाज के रूप में, प्रकृति के साथ संतुलित विकास के लिए तैयार हैं? इस प्रश्न का उत्तर ही आने वाले भारत के शहरों का भविष्य तय करेगा।