पहले घर का आंगन जीवित था। धूल में छोटे पांव के चिन्ह बनते थे। बरसात के बाद मिट्टी से उठती सौंधी गंध पूरे घर को भर देती थी। शाम ढलते ही मां की आवाज गूंजती थी, घर आ जाओ अंधेरा उतर रहा है। बच्चे पेड़ों पर चढ़ते थे, गिरते थे, घुटने छिलते थे और फिर धूल झाड़कर फिर दौड़ पड़ते थे। उस गिरने में धैर्य था। उस दर्द में हिम्मत थी। उस इंतजार में संस्कार था।
आज वह आंगन संवेदना शून्य हो गया है। उसकी जगह ले ली है एक कांच की तख्ती ने। वह तख्ती दिन रात जलती रहती है। तीन बरस का शिशु भी अंगुली चलाकर रंग बदल देता है। पांच पल में एक दृश्य आता है, दस पल में दूसरा। दिमाग को भागने की लत लग गई है। ठहरना उसे काटता है। पहले बीस मिनट तक दादी की कहानी सुनते सुनते नींद आ जाती थी। बीच में प्रश्न उठते थे, उत्तर मिलते थे। आज पंद्रह पल में ही मन भर जाता है। गहराई से सोचना, देर तक टिकना, कल्पना करना, यह सब धीरे धीरे मर रहा है। सब कुछ तुरंत चाहिए। तुरंत हंसी, तुरंत खेल, तुरंत उत्तर। मेहनत करके पाने का स्वाद ही भूल गया। दिमाग ने मान लिया कि याद रखने की मेहनत क्यों करें जब जेब में एक डिब्बा सब बता देगा। इस प्रकार दिमाग अपना नहीं रहा। वह उधार का हो गया। किराए का हो गया।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखो तो यह सबसे बड़ा धोखा है। मनुष्य का मस्तिष्क इनाम के लिए बना है। जब छोटी छोटी जीत पर बड़ा इनाम मिलता है तो मस्तिष्क उसे आदत बना लेता है। वही हो रहा है। हर पांच सेकंड में नई तस्वीर, नई आवाज, नई हंसी। मस्तिष्क डोपामिन का आदी हो गया। फिर जब उसे पढ़ाई करनी होती है, या एक जगह चालीस मिनट बैठना होता है, तो वह बेचैन हो जाता है। उसे लगता है यह बहुत लंबा है। ध्यान की डोरी छोटी हो गई। स्मृति की जड़ें कमजोर हो गईं। बच्चा अब भूलने लगा है क्योंकि उसे लगता है याद रखने की आवश्यकता ही क्या है। जब सब कुछ बाहर सुरक्षित है तो भीतर रखने की क्या जरूरत। इस तरह भीतर का घर खाली हो रहा है। और खाली घर में भय, बेचैनी और उदासी अपना डेरा जमा लेती है। बारह बरस की आयु में ही मन पर बोझ चढ़ जाता है। मैं कम हूं। मैं ठीक नहीं हूं। मैं सबसे पीछे हूं।
सामाजिक दृष्टि से चोट और गहरी है। बच्चा रोया तो गोद की जगह तख्ती थमा दी गई। बच्चा प्रश्न लेकर आया तो कहा गया जाकर उस डिब्बे से पूछ लो। बच्चा अकेला हुआ तो कहा गया चलो उस कृत्रिम साथी से बात कर लो। धीरे धीरे हमने अपनी सबसे पवित्र जिम्मेदारी उतार कर रख दी। रात को लोरी की जगह वीडियो चलने लगा। रूठने मनाने की जगह कार्टून चलने लगा। भूख लगने पर थाली की जगह विज्ञापन चलने लगा। बच्चे ने भी सीख लिया। उसने मान लिया कि प्रेम का अर्थ है साथ बैठकर एक ही स्क्रीन को घूरना। संवाद का अर्थ है संदेश की घंटी बजना। आंख से आंख मिलाकर बात करना, कंधे पर हाथ रखकर समझाना, यह सब पुरानी बातें हो गईं। घर में चार लोग रहते हैं पर चारों अलग अलग कोनों में बंद हैं। हर कोई अपनी दुनिया में खोया है। दरवाजे खुले हैं पर दिलों के बीच दीवारें खड़ी हो गई हैं। मोहल्ले की दोस्ती खत्म हुई। खेल के मैदान सूने हुए। त्योहारों पर मिलना जुलना कम हुआ। अब रिश्ते भी संदेशों में सिमट गए। और जब रिश्ते सिकुड़ते हैं तो समाज भी सिकुड़ता है।
पहचान का संकट सबसे भयावह है। आज का बालक आईने में अपना चेहरा नहीं देखता। वह देखता है कि दुनिया क्या कह रही है। वह पूछता है कि मैं कैसे कपड़े पहनूं। वह पूछता है कि मैं कैसे बोलूं। वह पूछता है कि मैं क्या लिखूं। उत्तर वही डिब्बा देता है। जन्मदिन की बधाई भी वही बनाता है। मन टूटे तो सांत्वना के शब्द भी वही देता है। धीरे धीरे बच्चे के मन में यह बात बैठ जाती है कि मेरे अपने विचार नाम की कोई चीज है ही नहीं। वह दर्पण नहीं रहा। वह केवल परछाई बन गया। पहले तुलना होती थी मोहल्ले के चार साथियों से। आज तुलना होती है करोड़ों चेहरों से जो सदा हंसते हुए दिखाए जाते हैं, सदा सफल दिखाए जाते हैं। असफल होने का भय इतना बड़ा हो जाता है कि बच्चा प्रयास ही करना छोड़ देता है। सोचता है गलती होगी तो क्या होगा। बन ही जाएगा। वही डिब्बा संभाल लेगा। इस तरह वह सीखने की इच्छा ही खो देता है।
अब भविष्य की ओर देखो। यह सबसे अधिक डराने वाला दृश्य है। आने वाले दस वर्षों में जब यह पीढ़ी बड़ी होगी तो क्या होगा। एक ओर ऐसे लोग होंगे जो केवल उपभोग करना जानते होंगे। जो प्रश्न पूछना भूल चुके होंगे। जो उत्तर के लिए सदा किसी अन्य पर निर्भर रहेंगे। दूसरी ओर वे यंत्र होंगे जो सोचेंगे, लिखेंगे, चित्र बनाएंगे, गीत गाएंगे। तब मनुष्य की जगह क्या बचेगी। यदि आज के बच्चे ने कठिन परिश्रम करना नहीं सीखा, यदि उसने असफल होकर उठना नहीं सीखा, यदि उसने अपने मन की बात कहना नहीं सीखा, तो कल वह नौकरी के लिए नहीं, जीवन के लिए भी अयोग्य हो जाएगा।
और एआई के वास्तविक संभावित नुकसान को भी समझो। पहला नुकसान है सोचने की शक्ति का क्षय। जब हर उत्तर तुरंत मिल जाए तो मस्तिष्क प्रश्न करना बंद कर देता है। दूसरा नुकसान है सृजनशीलता का अंत। जब कहानी, कविता, चित्र सब यंत्र बना दे तो मनुष्य का हाथ सुन्न हो जाता है। तीसरा नुकसान है झूठ और भ्रम का जाल। यंत्र कभी गलत उत्तर भी देता है पर आत्मविश्वास से देता है। बच्चा उसे सच मान लेता है। चौथा नुकसान है एकांत का डर। जब हर खाली पल में कोई बोलने वाला मिल जाए तो मनुष्य अपने भीतर झांकना बंद कर देता है। और भीतर न झांको तो आत्मा मर जाती है। पांचवां नुकसान है नैतिकता का धुंधला होना। यंत्र को सही गलत का बोध नहीं। वह केवल संभावना बताता है। यदि बच्चा उसी को गुरु मान लेगा तो उसका अपना विवेक कभी नहीं जागेगा।
व्यवस्था भी इसी ओर धकेल रही है। पाठशालाएं कहती हैं जल्दी सीखो, तुरंत सीखो, एक बटन दबाओ और ज्ञान पा लो। व्यापारी भी यही चाहते हैं। जितना कम सोचेगा बालक उतना अधिक वह देखेगा। जितना अधिक देखेगा उतना अधिक वह मांगेगा। हमने एक ऐसी पीढ़ी बना दी है जो सब कुछ निगल सकती है पर कुछ बना नहीं सकती। जो सब कुछ जानने का दावा कर सकती है पर अनुभव के नाम पर उसके पास कुछ नहीं है।
सबसे कड़वा सत्य यह है। पहले कहा जाता था कि जिसके पास साधन नहीं है वह पीछे रह जाएगा। आज स्थिति उल्टी हो गई है। जिसके पास साधन बहुत अधिक हैं वही भीतर से खोखला हो रहा है। जिसके घर में सब कुछ भरा है उसके पास समय नहीं है। जिसके पास समय है उसके पास धीरज नहीं है। जिसके पास धीरज है उसके पास दिशा नहीं है। हम सब दौड़ रहे हैं। पर किस ओर दौड़ रहे हैं यह किसी को पता नहीं।
पर मित्र, सुनो। अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, दीपक की लौ को कोई नहीं बुझा सकता। अभी भी समय है। अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है। वह यंत्र बुरा नहीं है। वह तो लोहे और कांच का एक टुकड़ा है। बुरा है उसे पकड़ने वाला हाथ। बुरा है उसे देने वाला मन। यदि हम चाहें तो दिशा अभी भी मोड़ी जा सकती है।
बच्चे को फिर से धरती छूने दो। उसे मिट्टी में खेलने दो। उसे गिरने दो। उसे चोट लगने दो। उसे रोने दो। और फिर उसे खुद उठकर हंसने दो। उसे बोर होने का समय दो। उसी खाली समय में से कविता जन्म लेगी। उसी खाली समय में से चित्र बनेगा। उसी खाली समय में से नया सवाल उठेगा। घर में एक समय ऐसा निश्चित करो जब कोई भी स्क्रीन न खुले। एक घंटा, दो घंटा। उस समय केवल बात हो। केवल हंसी हो। केवल आंखों में आंखें डालकर बात हो। गलती करने दो। उत्तर तुरंत मत दो। उसे सोचने दो। उसे भटकने दो। फिर उसे खुद रास्ता खोजने दो।
उस यंत्र को गुरु की जगह मत दो। उसे सेवक की जगह दो। उससे काम करवाओ पर उसकी गुलामी मत करो। उससे कठिन प्रश्न पूछो। उससे चित्र बनवाओ पर फिर उस चित्र में खुद रंग भरो। उससे कहानी सुनो पर उसका अंत खुद लिखो। उससे जानकारी लो पर निर्णय खुद लो। उसे बताओ कि यंत्र उत्तर दे सकता है पर अर्थ नहीं दे सकता। यंत्र शब्द दे सकता है पर भाव नहीं दे सकता।
हम वह पीढ़ी हैं मित्र जो दोनों संसार देख रही है। एक वह संसार जहां कच्ची मिट्टी थी और सच्चे रिश्ते थे। और दूसरा वह संसार जहां चमकती स्क्रीन है और तेज रफ्तार है। हमारे हाथ में चाबी है। यदि आज हमने बच्चों के हाथ से लगाम नहीं संभाली तो कल यह लगाम हमारे हाथ कभी नहीं आएगी। कल जब हम बूढ़े होंगे तो हमसे बात करने वाला भी कोई नहीं होगा। क्योंकि हमने उन्हें बात करना ही नहीं सिखाया।
हां तबाही आई है। यह सच है। पर हर तबाही के नीचे कुछ बीज दबे होते हैं। वे बीज अभी मरे नहीं हैं। बस उन्हें पानी चाहिए। और वह पानी है हमारा समय। वह पानी है हमारा धैर्य। वह पानी है हमारा साथ। वह पानी है हमारी आंखों में उनके लिए बचा हुआ प्यार।
आज नहीं तो कल, हमें लौटना होगा। लौटना होगा उन शामों की ओर जहां कहानियां थीं। लौटना होगा उन आंगनों की ओर जहां हंसी थी। लौटना होगा उस बचपन की ओर जहां गिरना भी उत्सव था और उठना भी उत्सव था।
बताओ , क्या तुम मेरे साथ हो इस लौटने में? क्या हम मिलकर उन बीजों को फिर से सींच सकते हैं?
डॉक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक, आदर्श संस्कार शाला, भारत