समय के प्रवाह में जब राष्ट्रों का भाग्य निर्धारित होता है, तब कूटनीति केवल संधियों और शिखर बैठकों का संग्रह नहीं रह जाती। वह उस सभ्यता की आत्मा का दर्पण बन जाती है जिसके आदर्श वसुधैव कुटुंबकम में निहित हैं। दो हजार चौबीस से दो हजार पच्चीस तक भारत की विदेश नीति ने इसी प्राचीन आदर्श को आज की विश्व व्यवस्था के यथार्थ के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया। यह समय अवसर और चुनौती दोनों से भरा रहा। महामारी के बाद विश्व का पुनर्निर्माण, ऊर्जा का संकट, व्यापार में रुकावटें और क्षेत्रीय टकराव, सब एक साथ उपस्थित थे। ऐसे में भारत ने न तो अलग रहने का मार्ग चुना और न ही किसी एक शक्ति के साथ बंधने की भूल की। उसने अनेक दिशाओं वाली कूटनीति अपनाई जिसमें हिंद प्रशांत की लहरें, यूरोप के बाजार, पश्चिम एशिया की ऊर्जा और अफ्रीका की आकांक्षाएं सब सम्मिलित थीं।
इस काल की सबसे ठोस उपलब्धि आर्थिक कूटनीति के क्षेत्र में दिखाई दी। जब विश्व में संरक्षण की प्रवृत्ति बढ़ रही थी, भारत ने व्यापार के द्वार खोले। ब्रिटेन के साथ जुलाई दो हजार पच्चीस में हुआ मुक्त व्यापार समझौता केवल शुल्क घटाने का कागज नहीं था। वह सेवा क्षेत्र, अंकीय व्यापार और पेशेवरों की आवाजाही को जोड़ने वाला एक बड़ा ढांचा था जिसने भारत को यूरोपीय बाजार में नई प्रविष्टि दी। इसी क्रम में यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ समझौते ने स्विट्जरलैंड, नार्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन जैसी उच्च तकनीक और निवेश प्रधान अर्थव्यवस्थाओं के द्वार खोले। ओमान और न्यूजीलैंड के साथ हुए समझौते आकार में छोटे लग सकते हैं, पर उनका महत्व इस बात में है कि उन्होंने भारत को पश्चिम एशिया की ऊर्जा धुरी और दक्षिण प्रशांत की कृषि तथा तकनीक धुरी दोनों से जोड़ा। इन उपलब्धियों के साथ जुलाई से सितंबर तिमाही में आठ दशमलव दो प्रतिशत की वृद्धि दर ने यह सिद्ध किया कि बाहरी दबाव के बीच भी घरेलू मांग और संरचनात्मक सुधार विकास को गति दे सकते हैं।
परंतु इसी आर्थिक आत्मविश्वास की परीक्षा संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ आए तनाव में हुई। रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर पचास प्रतिशत तक शुल्क लगाना एकपक्षीय दबाव की राजनीति थी। इसका सीधा प्रभाव वस्त्र, रत्न आभूषण और समुद्री उत्पाद जैसे श्रम प्रधान क्षेत्रों पर पड़ा जो रोजगार के लिए महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में भारत के लिए प्रयुक्त शब्दों का संकीर्ण होना और पाकिस्तान के साथ बढ़ती निकटता ने यह स्पष्ट किया कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में आदर्श की सीमा होती है। फिर भी भारत ने प्रतिकार के स्थान पर बातचीत का मार्ग चुना। उसने समझा कि आर्थिक प्रतिशोध से आपूर्ति शृंखला और टूटेगी, जबकि संवाद से समाधान की संभावना बनी रहेगी। यही वसुधैव कुटुंबकम का आधुनिक अर्थ है। परिवार में मतभेद हो सकते हैं परंतु संवाद बंद नहीं होता।
पड़ोस की नीति इन दो वर्षों में भारत की कूटनीतिक परिपक्वता का सबसे कठिन परीक्षण थी। श्रीलंका के साथ संबंधों में आई स्थिरता सोच समझ कर बनाई गई नीति का परिणाम थी। आर्थिक संकट के समय भारत ने न तो शर्तें रखीं और न ही राजनीतिक हस्तक्षेप किया। उसने ईंधन, औषधि और ऋण के पुनर्गठन के द्वारा सहायता दी और स्वयं को एक भरोसेमंद पहले सहायक के रूप में स्थापित किया। इसके विपरीत बांग्लादेश में अगस्त दो हजार चौबीस का सत्ता परिवर्तन और उसके बाद शरण लेना, दोनों देशों के विश्वास के लिए बड़ा आघात था। व्यापार, जल बंटवारा और सीमा प्रबंधन जैसे विषय अब और संवेदनशील हो गए हैं। नेपाल में युवा पीढ़ी का असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता ने यह स्मरण कराया कि सांस्कृतिक निकटता अपने आप राजनीतिक स्थिरता की गारंटी नहीं है। पाकिस्तान के साथ मई दो हजार पच्चीस में हुए चार दिन के संघर्ष ने भारत की सुरक्षा नीति में आए परिवर्तन को दिखाया। पहलगाम की घटना के बाद अपनाया गया रुख अब केवल कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहा। उसमें निवारक क्षमता और त्वरित उत्तर भी जुड़ गया। परंतु यह उत्तर भी संघर्ष को सीमित रखने के ढांचे के भीतर रहा, क्योंकि भारत जानता है कि दक्षिण एशिया में अस्थिरता का सबसे अधिक भार भारत को ही उठाना पड़ता है।
उत्तर में चीन के साथ संबंधों में आई शांति इस समय की सबसे बड़ी सामरिक घटना थी। चार वर्षों के गतिरोध के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की वापसी, पांच वर्षों के बाद कज़ान में हुई शिखर वार्ता और कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसी सांस्कृतिक कड़ियों की पुनर्स्थापना, इन सबने संकेत दिया कि प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग भी संभव है। भारत ने स्वीकार किया कि सीमा विवाद का शीघ्र समाधान संभव नहीं है, परंतु सीमा पर शांति के बिना आर्थिक और बहुपक्षीय सहयोग संभव नहीं है। इसी यथार्थवाद ने शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर त्रिपक्षीय उपस्थिति को भी संभव बनाया। रूस के साथ संबंध इस यथार्थवाद का दूसरा स्तंभ थे। पश्चिमी प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव के बावजूद भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा। वर्ष के अंत में रूस के राष्ट्रपति की दिल्ली यात्रा और पांच वर्षीय व्यापार योजना पर सहमति ने दिखाया कि भारत बहुध्रुवीयता को केवल शब्दों में नहीं, कार्यों में मानता है।
हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत की सक्रियता ने इन दो वर्षों में नया रूप लिया। यह केवल नौसैनिक अभ्यासों तक सीमित नहीं रही। इंडोनेशिया के साथ समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और नीली अर्थव्यवस्था पर सहयोग, ऑस्ट्रेलिया के साथ महत्वपूर्ण खनिजों और स्वच्छ ऊर्जा पर साझेदारी तथा आसियान के साथ अंकीय संपर्क, इन सबने भारत की उपस्थिति को गहरा किया। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत का लगभग संपूर्ण समुद्री व्यापार इन्हीं समुद्री मार्गों से गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र की स्थिरता भारत के आर्थिक हितों की पहली शर्त है। पश्चिम एशिया में भारत ने कई ध्रुवों के साथ संतुलन साधा। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से निवेश और ऊर्जा सहयोग बढ़ा, इजरायल से रक्षा और तकनीक का आदान प्रदान जारी रहा और ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह के माध्यम से मध्य एशिया तक संपर्क मार्ग को जीवित रखा गया। अफ्रीका में इथियोपिया और अन्य देशों के साथ साझेदारी ने यह संकेत दिया कि भारत अब केवल सहायता देने वाला नहीं, क्षमता निर्माण और अंकीय सार्वजनिक संरचना का भागीदार बनना चाहता है।
परंतु अभी भी इस बड़े चित्र में कुछ रिक्त स्थान भी दिखाई देते हैं। विश्व पासपोर्ट सूचकांक में एक सौ पच्चीसवां स्थान और केवल छब्बीस देशों में वीज़ा मुक्त प्रवेश, यह दर्शाता है कि लोगों के आवागमन की सुविधा अभी भी कूटनीति का कमजोर पक्ष है। दो हजार उन्नीस की तुलना में दो हजार चौबीस में विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी और वीज़ा प्रक्रिया की जटिलता ने भारत की आतिथ्य परंपरा और पर्यटन क्षमता के बीच अंतर को उजागर किया। अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ बड़े व्यापार समझौतों का लंबित रहना भी एक चुनौती है, क्योंकि इन बाजारों तक पहुंच के बिना भारत के निर्यात आधारित क्षेत्रों को पूरा लाभ नहीं मिल सकता। इन कमियों को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है।
यदि इन दो वर्षों का निष्कर्ष निकालें तो तीन प्रवृत्तियां स्पष्ट होती हैं। पहली, भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता को सिद्धांत से व्यवहार में बदला है। उसने किसी एक शक्ति के साथ बंधने के स्थान पर मुद्दे आधारित मित्रता बनाई है। दूसरी, आर्थिक सुरक्षा अब विदेश नीति का मुख्य स्तंभ बन गई है। व्यापार समझौते, ऊर्जा साझेदारी और आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण सभी निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं। तीसरी, पड़ोस और हिंद प्रशांत भारत की कूटनीति के दो केंद्र बन गए हैं। एक ओर स्थायित्व और विश्वास का निर्माण, दूसरी ओर प्रतिस्पर्धा और उपस्थिति का विस्तार।
वसुधैव कुटुंबकम का सिद्धांत अब केवल एक सांस्कृतिक वाक्य नहीं रहा। वह कार्य करने की पद्धति बन गया है। परिवार में सभी सदस्य समान नहीं होते, उनकी क्षमता और आवश्यकता अलग होती है। उसी प्रकार विश्व व्यवस्था में भी भारत ने प्रत्येक साथी को उसके महत्व के अनुसार स्थान दिया। रूस से ऊर्जा, अमेरिका से तकनीक, खाड़ी से निवेश, आसियान से संपर्क, अफ्रीका से साझेदारी और दक्षिण के देशों से नैतिक नेतृत्व। यही अनेकता भारत की शक्ति है।
आगे दो हजार छब्बीस और उसके बाद का मार्ग और कठिन होगा। विश्व व्यापार में अनिश्चितता, तकनीक का भू राजनीतिक होना, जलवायु परिवर्तन और भीतर के चुनावी चक्र, ये सभी भारत की कूटनीति को प्रभावित करेंगे। परंतु जिस आधार पर दो हजार चौबीस से दो हजार पच्चीस खड़े हैं, वह लचीलापन और यथार्थवाद का है। भारत ने यह सिद्ध किया है कि वह विश्व को उपदेश देने के स्थान पर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता है। वह गुरु नहीं, मित्र बनना चाहता है। और मित्रता का अर्थ है कठिन समय में साथ देना, मतभेद में भी बातचीत बनाए रखना और अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर साझा समृद्धि की कल्पना करना।
अंत में यही कहा जा सकता है कि पिछले दो वर्षों ने भारत की विदेश नीति को एक नई प्रौढ़ अवस्था में पहुंचाया है। यह अब केवल प्रतिक्रिया करने वाली नहीं, पहले से सोचने वाली है। यह अब केवल सुरक्षा केंद्रित नहीं, विकास केंद्रित है। और यह अब केवल अपने हितों की रक्षा नहीं, विश्व के साझा हितों में योगदान भी चाहती है। यही वसुधैव कुटुंबकम का आधुनिक अर्थ है और यही भारत की कूटनीति का भविष्य भी है।