कैंसर का नाम सुनते ही शरीर ही नहीं, मन और आत्मा तक सिहर उठते हैं। यह केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के जीवन की सबसे कठिन परीक्षा है। अस्पतालों में बढ़ती भीड़, लंबी प्रतीक्षा सूची, महंगे उपचार, टूटती आर्थिक स्थिति और असहाय परिवार—ये सब मिलकर हमारे स्वास्थ्य तंत्र की गंभीर चुनौतियों को उजागर करते हैं। यह केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संवेदना का प्रश्न भी है।
आज कैंसर के आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि वे लाखों लोगों के दर्द, संघर्ष और असमय बिछड़ते जीवन की कहानी कहते हैं। विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग दो करोड़ नए कैंसर रोगी सामने आते हैं और लगभग एक करोड़ लोगों की मृत्यु होती है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार वर्ष 2050 तक नए मामलों की संख्या लगभग 3.05 से 3.50 करोड़ तक पहुँच सकती है। इसी प्रकार कैंसर से होने वाली वार्षिक मृत्यु लगभग 1.86 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। 1990 के बाद से वैश्विक स्तर पर कैंसर से होने वाली मृत्यु में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
भारत की स्थिति भी चिंताजनक है। वर्ष 2022 में लगभग 14.13 लाख नए कैंसर रोगी दर्ज किए गए। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार पिछले तीन दशकों में भारत में कैंसर के मामलों में निरंतर वृद्धि हुई है। अनुमान है कि प्रत्येक नौ भारतीयों में से एक व्यक्ति को जीवनकाल में कभी न कभी कैंसर होने का जोखिम है।सबसे अधिक चिंता मृत्यु दर को लेकर है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार भारत में बड़ी संख्या में मरीज उपचार के दौरान या उपचार तक पहुँचने से पहले ही जीवन खो देते हैं। इसका एक प्रमुख कारण रोग का देर से पता चलना, उपचार की सीमित उपलब्धता तथा आर्थिक कठिनाइयाँ हैं।
चिकित्सा व्यवस्था का सबसे बड़ा कड़वा सच असमानता है। महानगरों और बड़े निजी अस्पतालों में अत्याधुनिक जांच, रेडियोथेरेपी और नई दवाएँ उपलब्ध हैं, जबकि ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में अनेक मरीज समय पर विशेषज्ञ चिकित्सक तक भी नहीं पहुँच पाते। जब तक रोग का पता चलता है, तब तक वह अक्सर तीसरी या चौथी अवस्था में पहुँच चुका होता है, जिससे उपचार अधिक जटिल और महंगा हो जाता है।
भारत में लगभग 37 प्रतिशत कैंसर ऐसे कारणों से जुड़े हैं जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है। इनमें तंबाकू का सेवन, संक्रमण, असंतुलित भोजन, शारीरिक निष्क्रियता, मोटापा तथा बढ़ी हुई रक्त शर्करा प्रमुख हैं। तंबाकू आज भी कैंसर का सबसे बड़ा रोके जा सकने वाला कारण है।एक अन्य चुनौती प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में कैंसर की पर्याप्त प्राथमिकता का अभाव है। अनेक क्षेत्रों में नियमित स्क्रीनिंग, जागरूकता अभियान और विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता अभी भी सीमित है। परिणामस्वरूप मरीज समय पर जांच नहीं करा पाते।
भारत में स्तन कैंसर, मुख कैंसर, गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर तथा भोजन नली का कैंसर सबसे अधिक पाए जाते हैं। इनमें से कई प्रकार के कैंसर की समय पर जांच से प्रारंभिक अवस्था में पहचान संभव है, जिससे उपचार की सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
सकारात्मक पक्ष यह है कि विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत कैंसर की रोकथाम संभव है। महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर जैसे अनेक मामलों को नियमित जांच और टीकाकरण के माध्यम से रोका जा सकता है। सरकार द्वारा विभिन्न जिलों में डे-केयर कैंसर केंद्र स्थापित करने की पहल भी उपचार को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।कैंसर केवल शरीर को नहीं तोड़ता, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक, मानसिक और सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करता है। कई परिवार वर्षों की बचत खर्च कर देते हैं, रोजगार प्रभावित होता है और मानसिक तनाव पूरे परिवार को घेर लेता है।
इसलिए बचाव ही सबसे प्रभावी उपचार है। तंबाकू और शराब से दूरी, संतुलित एवं पौष्टिक भोजन, प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि, वजन नियंत्रण, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच तथा चिकित्सकीय सलाह के अनुसार हेपेटाइटिस-बी और एचपीवी (HPV) टीकाकरण जैसे कदम लाखों जीवन बचा सकते हैं।अंततः प्रश्न केवल चिकित्सा व्यवस्था का नहीं, बल्कि हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी का भी है। यदि सरकार, स्वास्थ्य संस्थान, समाज और प्रत्येक नागरिक मिलकर रोकथाम, प्रारंभिक पहचान और गुणवत्तापूर्ण उपचार को प्राथमिकता दें, तो आने वाले वर्षों में लाखों लोगों का जीवन बचाया जा सकता है।
यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी प्रकार के लक्षण, जांच या उपचार संबंधी निर्णय के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। समय पर लिया गया एक सही निर्णय जीवन बचा सकता है।