डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है।
आज सुबह गांव की पगडंडी से बारात निकली। ढोल बजा, घोड़ा थिरका, दूल्हा शेरवानी में सजा। मोहल्ले की चाची ताई बोलीं, लड़का बहुत बढ़िया है, सरकारी नौकरी है, मकान पक्का है। तभी एक बुढ़िया धीरे से बोली, पर बहू कहां से आएगी। सब हंस दिए। उस हंसी के पीछे एक सन्नाटा था जिसे कोई नाम नहीं दे रहा था।
यही सन्नाटा आज देश के आंकड़ों में चीख रहा है। दो हजार बाईस से दो हजार चौबीस के बीच देश में जन्म के समय नौ सौ अठारह लड़कियां पैदा हुईं प्रति एक हजार लड़कों पर। प्रकृति का हिसाब नौ सौ बावन का है। यानी हर हजार लड़कों के साथ चौंतीस लड़कियां पहले जन्म में ही कम हो गईं। दो हजार पांच से दो हजार सात में अनुपात नौ सौ चौदह था। बीस बरस में सिर्फ चार अंक का सुधार। इसे सुधार कहना झूठ बोलना होगा।
सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण ने बहुत पहले बताया था। इक्कीस लाख लड़कियां ऐसी हैं जिन्हें परिवार नहीं चाहता था। यह संख्या एक दो देशों की आबादी से भी बड़ी है। एक संतान वाले घरों में अट्ठाईस लाख पचास हजार माताओं ने बेटा बताया और बाईस लाख ने बेटी। दो संतान वाले घरों में आधे में एक बेटा एक बेटी, एक तिहाई में दोनों बेटे, और सिर्फ छठे हिस्से में दोनों बेटियां। हिसाब साफ है। बेटा हुआ तो घर रुक गया। बेटी हुई तो संतान के लिए अगला प्रयास तय।
हरियाणा इस कथा का सबसे कड़वा पन्ना है। दो हजार चौबीस में वहां जन्म पर अनुपात नौ सौ दस रह गया। दो हजार पंद्रह में आठ सौ छिहत्तर था। दो हजार छब्बीस के पहले चार महीनों में फिर गिरकर आठ सौ पंचानवे। अंबाला नौ सौ छह से आठ सौ तैंतालीस, झज्जर नौ सौ सैंतालीस से आठ सौ छिहत्तर, यमुनानगर नौ सौ छप्पन से आठ सौ इक्यासी। गुड़गांव जैसा बड़ा शहर भी दो हजार चौबीस में आठ सौ निन्यानवे से दो हजार छब्बीस में आठ सौ तिरेसठ पर आ गया। एक साल में हरियाणा में पांच लाख सोलह हजार बच्चे पैदा हुए। लड़के दो लाख सत्तर हजार, लड़कियां दो लाख छियालीस हजार। फर्क चौबीस हजार का। मतलब एक साल में चौबीस हजार दुल्हनें पैदा ही नहीं हुईं।
दिल्ली भी अब बच नहीं पाई। दो हजार तेईस में नौ सौ बाईस था, दो हजार चौबीस में नौ सौ बीस। जन्म पंजीकरण भी एक साल में नौ हजार कम। महाराष्ट्र का औसत नौ सौ तेरह है पर सोलह जिले नौ सौ से नीचे। श्रीरामपुर के ग्यारह गांवों में दो सौ बारह लड़के और एक सौ सत्रह लड़कियां। अनुपात आठ सौ से भी नीचे। संयुक्त राष्ट्र की संस्था कहती है दो हजार एक से दो हजार बारह के बीच महाराष्ट्र में तैंतालीस हजार नौ सौ तिरेपन लड़कियां जन्म से पहले गायब। पुणे दो हजार बीस में नौ सौ छियालीस था, दो हजार चौबीस में नौ सौ ग्यारह। पढ़ाई, अस्पताल, सब है, पर सोच वही पुरानी।
ऐसा क्यों हो रहा है। कोई रहस्य नहीं। बेटा नाम चलाता है। बेटा अंतिम काम करता है। बेटा खेत संभालता है। बेटा बुढ़ापे में साथ रहता है। बेटी पराए घर जाती है और दहेज ले जाती है। इसी कारण घर की सबसे पढ़ी बहू भी सास के सामने सिर झुका कर कहती है, इस बार बेटा ही चाहिए। गरीब बाबा के पास जाता है, अमीर जांच केंद्र। मंजिल एक ही।छोटा परिवार ने आग में घी डाला। पहले दस बच्चे होते थे तो दो चार लड़कियां अपने आप आ जाती थीं। अब दो बच्चे का नियम है तो पहले में ही बेटा चाहिए। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण कहता है अधिकांश माता पिता पहले बच्चे के रूप में बेटा चाहते हैं। एक ही संतान हो तो भी बेटा। यह चाहत जाति, धर्म, भाषा सबके ऊपर है।
नतीजा अब गली में दिख रहा है। हरियाणा में स्थानीय दुल्हनें कम हुईं तो बाहर से लड़कियां लाने का धंधा चला। इसे शोध करने वाले लोग शृंखला विवाह पलायन कहते हैं। ओडिशा, बंगाल, असम से लड़कियां आती हैं। एक आती है तो उसके बाद और आती हैं। गांव की पंचायतें गांव में अंतरजाति विवाह पर रोक लगाती हैं, पर बाहर से आई दुल्हन को चुपचाप मान लेती हैं क्योंकि वंश आगे बढ़ाना है। पर उन बच्चों को वही समाज आज भी अलग नजर से देखता है।
लिंगानुपात सिर्फ शादी का सवाल नहीं। जहां लड़कियां कम होंगी वहां मारपीट बढ़ेगी। तस्करी बढ़ेगी। दलालों का जाल बढ़ेगा। दो हजार छब्बीस में हरियाणा सरकार ने इसी कारण दूसरे राज्यों से चलने वाले अवैध जांच रैकेट तोड़ने के आदेश दिए। जहां दुल्हनें बाहर से आएंगी वहां भाषा का झगड़ा होगा, खाने का झगड़ा होगा, बच्चों की पहचान का झगड़ा होगा। मन के घाव सबसे गहरे होते हैं।समाज के हिसाब से भी फर्क है। जनगणना बताती है ईसाई समाज में बाल अनुपात नौ सौ अट्ठावन, मुस्लिम में नौ सौ तैंतालीस। हिंदू, जैन, सिख में सबसे कम। केरल में सभी समाज मिलाकर नौ सौ पैंसठ के आसपास हैं। हरियाणा में सभी समाज राष्ट्रीय औसत से नीचे। यानी यह किसी एक वर्ग की समस्या नहीं, यह सोच की समस्या है।
राज्य दर राज्य का पैटर्न भी अजीब है। जहां बच्चे अधिक पैदा होते हैं वहां अनुपात थोड़ा बेहतर दिखता है क्योंकि छांटने के बाद भी कुछ लड़कियां बच जाती हैं। जहां बच्चे कम पैदा होते हैं वहां हर गर्भ की कीमत बढ़ जाती है और पहली बलि बेटी की होती है।
कानून उन्नीस सौ चौरानवे से है। गर्भ में लिंग जांच अपराध है। हरियाणा में बारह सौ छह जांच केंद्र पंजीकृत हैं, दो सौ एक बंद। दो हजार पच्चीस और दो हजार छब्बीस में बारह सौ चालीस जांच, अट्ठावन नोटिस। जनवरी से मार्च दो हजार छब्बीस में छह सौ से अधिक बारह से बीस हफ्ते की गर्भ गिराने की प्रक्रिया पकड़ी गईं। पर जांच फेल हो जाती है क्योंकि महिलाएं साथ नहीं देतीं। बारह हफ्ते से कम गर्भ गिराना सैंतालीस हजार से घटकर तैंतालीस हजार हुआ। बारह हफ्ते से ऊपर वाला भी घटा। पर जड़ नहीं हिली।
कुछ जगह उम्मीद भी है। महाराष्ट्र के आठ जिलों में एक हजार लड़कों पर एक हजार से अधिक लड़कियां हैं। हरियाणा में नूंह, सिरसा में नौ सौ अट्ठाईस से नौ सौ छत्तीस तक। पर अपवाद से नियम नहीं बनते।दो हजार ग्यारह की जनगणना में देश में एक सौ ग्यारह लड़के थे प्रति एक सौ लड़कियों पर। दो हजार उन्नीस से इक्कीस के सर्वे में यह एक सौ आठ हुआ। सुधार है पर रेंगने जैसा। दो हजार से दो हजार बीस तक भारत दुनिया के पांच सबसे खराब देशों में रहा।
स्कूल भी मार खा रहे हैं। कक्षा छह से आठ में लड़कियों का स्कूल छोड़ना दो दशमलव नौ से बढ़कर तीन दशमलव चार प्रतिशत। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा में यह देश के औसत से ऊपर। जब घर में बेटी की कदर नहीं तो स्कूल कौन भेजेगा।
अब सामाजिक कीमत गिनते हैं। एक पूरी पीढ़ी के पुरुष बिना विवाह रह जाएंगे। जिनके पास जमीन नहीं, जिनकी जाति छोटी, जिनकी कमाई कम, उनके लिए बहू मिलना सबसे कठिन। इससे अपराध बढ़ेगा, नशा बढ़ेगा, घर में मारपीट बढ़ेगी। पैसों की कीमत भी है। दहेज भले कम हो जाए पर बहू की कीमत बढ़ जाएगी। बेटी वाले घर पर मांग और दबाव बढ़ेगा।बीस साल में चार अंक का सुधार बताता है कि जागरूकता के पोस्टर और नारे नाकाम हैं। बेटी बचाओ के नारे लगे, तस्वीरें खिंचीं, पर जांच केंद्र बंद नहीं हुए। जब तक बेटी को खर्च और बेटे को कमाई माना जाएगा तब तक कुछ नहीं बदलेगा। जब तक कागज पर बराबरी का कानून रहेगा और घर में बेटा ही वारिस माना जाएगा तब तक नौ सौ अठारह का आंकड़ा नौ सौ बावन नहीं बनेगा।
प्रकृति का नियम भी हमने तोड़ा। प्रकृति हर एक सौ लड़कियों पर एक सौ पांच लड़के पैदा करती है क्योंकि लड़के बचपन में अधिक मरते हैं। यह प्रकृति का बीमा है। हमने उस बीमा को भी रद्द कर दिया।
आज तस्वीर बिल्कुल साफ है। दूल्हा तैयार है। कपड़े इस्त्री हैं। बैंक में पैसे हैं। घर में कमरा और है। पर दुल्हनिया इंतजार में नहीं है क्योंकि वह पैदा ही नहीं हुई। यह कमी अगले तीस साल तक विवाह के बाजार में दिखेगी। दो हजार तीस तक कई राज्यों में अनुपात नौ सौ से नीचे चला जाएगा। हरियाणा पहले ही आठ सौ पंचानवे पर है। यह गिरावट का रास्ता है।अंतिम सच यह है कि यह गरीबी की समस्या नहीं। यह सोच की समस्या है। अमीर भी बेटा चाहता है, गरीब भी। पढ़ा लिखा भी और अनपढ़ भी। जब तक बेटी के जन्म पर थाली नहीं बजेगी, जब तक बेटे के जन्म को सामान्य और बेटी के जन्म को उत्सव नहीं माना जाएगा, तब तक ढोल बजते रहेंगे और दुल्हन का इंतजार लंबा होता जाएगा।
इसलिए देर किस बात की। आंकड़े झूठ नहीं बोलते। झूठ हम बोलते हैं जब कहते हैं सब ठीक है। ठीक नहीं है। छह करोड़ तिरेसठ लाख की खाली जगह चीख रही है। और जब तक उस चीख को हम अपनी बेटी की किलकारी से नहीं भरेंगे, तब तक हर गली में दूल्हा तैयार मिलेगा और दुल्हनिया का इंतजार अधूरा। देश की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि लाखों युवक विवाह योग्य हैं। सबसे बड़ा संकट यह है कि जिन बेटियों को उनके जीवनसाथी बनना था, उनमें से असंख्य को जन्म लेने ही नहीं दिया गया।
दूल्हा तैयार है। सिर पर सेहरा है, हाथों में सपने हैं, घर में खुशियों की प्रतीक्षा है। लेकिन दुल्हनिया का इंतज़ार इसलिए लंबा होता जा रहा है क्योंकि वह जन्म ही नहीं ले सकी। यह केवल जनसंख्या का असंतुलन नहीं, बल्कि हमारी सोच, हमारी संवेदनहीनता और हमारे सामाजिक विवेक की सबसे बड़ी हार है।
याद रखिए, जिस समाज में बेटियों की किलकारियाँ कम हो जाती हैं, वहाँ केवल विवाह का संकट नहीं आता; वहाँ रिश्तों का संतुलन टूटता है, अपराध बढ़ते हैं, मानव तस्करी पनपती है, महिलाओं पर हिंसा बढ़ती है और आने वाली पीढ़ियों का सामाजिक ताना-बाना बिखरने लगता है। यह केवल आज का नहीं, आने वाले कई दशकों का संकट है।
अब भी समय है। बेटी को बोझ नहीं, भविष्य मानिए। उसे दया नहीं, समान अवसर दीजिए। उसके जन्म पर भी वही उल्लास मनाइए जो बेटे के जन्म पर मनाते हैं। कानून अपना काम करेगा, लेकिन समाज तभी बदलेगा जब घर बदलेगा, परिवार बदलेगा और हमारी सोच बदलेगी।
जिस दिन हर बेटी का जन्म उत्सव बनेगा, उसी दिन हर दूल्हे का इंतज़ार भी पूरा होगा।
अन्यथा आने वाले वर्षों में हर गली, हर गाँव और हर शहर से यही आवाज़ सुनाई देगी—
"दूल्हा तैयार... दुल्हनिया का इंतज़ार!"