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Updated: 01 October 2026 | Hindi News Portal
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आज के भौतिकवादी युग में परिवार ,समाज और सरकार की संवेदनहीनता से पीडित हे वरिष्ठ नागरिक

अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस हर साल वरिष्ठ नागरिकों के प्रति सम्मान प्रकट करने और उनकी समस्याओं पर विचार करने के लिए मनाया जाता है।

आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क | Updated: 01 Oct 2026, 01:39 PM | Views: 0 | 5 मिनट पढ़ें
आज के भौतिकवादी युग में  परिवार ,समाज और सरकार की संवेदनहीनता से पीडित हे वरिष्ठ नागरिक

द्विजेन्द्र मोहन शर्मा  वरिष्ठ पत्रकार

अंतर्राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस हर साल वरिष्ठ नागरिकों के प्रति सम्मान प्रकट करने और उनकी समस्याओं पर विचार करने के लिए मनाया जाता है। एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। भारतीय संस्कृति में तो 'माता-पिता और बुजुर्गों को देवता तुल्य' (मातृदेवो भव, पितृदेवो भव) माना गया है। परंतु, आज की आधुनिक, भागदौड़ भरी और भौतिकवादी दुनिया में इस आदर्श की हकीकत बदल चुकी है।

आज देश का बुजुर्ग समाज कई तरह की गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन समस्याओं के प्रति सरकार और समाज, दोनों का रवैया अक्सर संवेदनहीनता और उदासीनता से भरा दिखाई देता है।  
1. वरिष्ठ नागरिकों की प्रमुख समस्याएं
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर होने लगता है। आज हमारे देश के वरिष्ठ नागरिकों को मुख्य रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है:
* आर्थिक असुरक्षा और आय का अभाव: भारत में संगठित क्षेत्र (जैसे सरकारी नौकरी) से सेवानिवृत्त होने वाले बुजुर्गों की संख्या बहुत कम है। देश की एक बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र (मजदूर, किसान, छोटे दुकानदार) में काम करती है, जिनके पास बुढ़ापे के लिए कोई पेंशन या नियमित आय का साधन नहीं होता। बढ़ती महंगाई के इस दौर में पाई-पाई के लिए दूसरों पर निर्भर रहना उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
* स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां और महंगा इलाज: बुढ़ापे में बीमारियां स्वाभाविक हैं। मधुमेह, रक्तचाप, गठिया, अल्जाइमर और दृष्टिहीनता जैसी समस्याएं बुजुर्गों को घेर लेती हैं। भारत में स्वास्थ्य सेवाएं इतनी महंगी हैं कि बिना किसी स्वास्थ्य बीमा या मजबूत आर्थिक सहारे के इलाज कराना आम बुजुर्ग के बस की बात नहीं रह गई है। सरकारी अस्पतालों की लंबी लाइनें और बदइंतजामी उनके घावों पर नमक छिड़कने का काम करती हैं।
* अकेलापन और मानसिक अवसाद: आधुनिक दौर में संयुक्त परिवारों  का टूटना और एकल परिवारों का चलन बढ़ना बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ा अभिशाप साबित हुआ है। बच्चे रोजगार या पढ़ाई के सिलसिले में बड़े शहरों या विदेशों में बस जाते हैं और माता-पिता पीछे अकेले रह जाते हैं। बात करने के लिए किसी का न होना, अकेलापन और खुद को 'बेकार' समझने की भावना बुजुर्गों को मानसिक रूप से तोड़ देती है, जिससे वे गहरे अवसाद का शिकार हो जाते हैं।
* अपनों द्वारा उपेक्षा और दुर्व्यवहार: आज समाज में ऐसी घटनाएं आम हो चुकी हैं जहां बच्चे अपने ही माता-पिता को बोझ समझने लगते हैं। उन्हें घर के एक कोने में पटक दिया जाता है, उनके साथ गाली-गलौज की जाती है, और कई बार तो उन्हें भूखा तक रखा जाता है। संपत्ति अपने नाम कराने के बाद बुजुर्गों को घर से निकाल देना या उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आना आज की एक कड़वी सच्चाई बन चुका है।
2. सरकार की संवेदनहीनता और नीतियां
कहने को तो सरकार ने बुजुर्गों के कल्याण के लिए कई योजनाएं बनाई हैं, लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति सरकार की संवेदनहीनता को बयां करती है:
* अपर्याप्त वृद्धावस्था पेंशन: सरकार द्वारा दी जाने वाली वृद्धावस्था पेंशन की राशि (जो कई राज्यों में मात्र 400 से 1500 रुपये प्रति माह है) आज के समय में मजाक जैसी प्रतीत होती है। क्या इस महंगाई में कोई व्यक्ति इतने कम रुपयों में महीने भर का राशन, दवाइयां और अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकता है?
* रेलवे और अन्य रियायतों को बंद करना: पिछले कुछ वर्षों में वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली रियायतों पर भी कैंची चलाई गई है। उदाहरण के लिए, कोरोना काल के दौरान भारतीय रेलवे द्वारा बुजुर्गों को किराए में मिलने वाली 40% से 50% की छूट को बंद कर दिया गया, जिसे बाद में मांग के बावजूद पूरी तरह बहाल नहीं किया गया। यह दर्शाता है कि नीतियां बनाते समय बुजुर्गों के हितों को हाशिए पर रख दिया जाता है।
* कानूनों का लचर क्रियान्वयन: सरकार ने 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007' (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act) तो बनाया है, जिसके तहत बच्चों द्वारा माता-पिता को प्रताड़ित करने पर सजा का प्रावधान है। लेकिन प्रशासनिक जटिलताओं, कोर्ट-कचहरी के चक्करों और जागरूकता की कमी के कारण बहुत कम बुजुर्ग इस कानून का सहारा ले पाते हैं। साथ ही, कोई भी माता-पिता अपने ही बच्चों के खिलाफ पुलिस या कोर्ट जाने से कतराते हैं।

3. समाज का बदलता नजरिया और संवेदनहीनता
सरकार से भी ज्यादा चिंताजनक बदलाव हमारे समाज की सोच में आया है। जिस समाज में बुजुर्गों की सलाह के बिना कोई शुभ काम नहीं होता था, आज उसी समाज में उन्हें 'आउटडेटेड' (पुराने जमाने का) मानकर दरकिनार कर दिया जाता है।
* उपयोगितावादी दृष्टिकोण आज के समाज का नजरिया पूरी तरह से इस बात पर टिक गया है कि "आप मेरे किस काम के हैं?" जब तक माता-पिता कमाते हैं या घर-बच्चों की देखरेख में मदद कर सकते हैं, तब तक उन्हें सम्मान मिलता है। जैसे ही वे शारीरिक रूप से अक्षम होते हैं, समाज और परिवार उन्हें एक 'अनुत्पादक बोझ' मानने लगता है।
* संस्कारों और नैतिक मूल्यों का ह्रास: आधुनिक शिक्षा और पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण ने हमारी नई पीढ़ी को आत्मकेन्द्रित  बना दिया है। युवाओं में अपने निजी स्पेस  और स्वतंत्रता की चाह इतनी बढ़ गई है कि वे माता-पिता की उपस्थिति को भी एक बंधन मानने लगे हैं।
* सार्वजनिक स्थानों पर उपेक्षा: बसों, ट्रेनों या बैंकों की लाइनों में बुजुर्गों को जगह देने या उनकी मदद करने की भावना अब कम होती जा रही है। डिजिटल होती दुनिया ने भी बुजुर्गों को पीछे छोड़ दिया है। आज बैंकिंग से लेकर सरकारी सुविधाओं तक सब कुछ ऑनलाइन हो गया है, जिसे समझने में बुजुर्गों को कठिनाई होती है, लेकिन समाज या प्रशासन उन्हें यह सिखाने या मदद करने में धैर्य नहीं दिखाता।
4. समाधान की राह: क्या करने की आवश्यकता है?
यदि हमें एक संवेदनशील और न्यायप्रिय समाज का निर्माण करना है, तो हमें तुरंत बड़े कदम उठाने होंगे:
* सरकार के स्तर पर:
    1. सरकार को वृद्धावस्था पेंशन की राशि को बढ़ाकर कम से कम इतना करना चाहिए जिससे एक व्यक्ति का सम्मानजनक जीवनयापन हो सके।
    2. वरिष्ठ नागरिकों के लिए मुफ्त और सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा की व्यवस्था होनी चाहिए।
    3. हर जिले में सरकारी देखरेख में आधुनिक और सर्वसुविधायुक्त वृद्धाश्रम होने चाहिए, जहां गरीब और बेसहारा बुजुर्गों को आश्रय मिल सके।
* समाज और परिवार के स्तर पर:
    1. हमें यह समझना होगा कि बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन का एक अनिवार्य पड़ाव है। आज हम जो व्यवहार अपने बुजुर्गों के साथ कर रहे हैं, कल हमारी संतानें वही व्यवहार हमारे साथ करेंगी।
    2. बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम में 'नैतिक शिक्षा' और 'बुजुर्गों के प्रति सम्मान' जैसे विषयों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
    3. परिवारों को अपने बुजुर्गों के साथ समय बिताना चाहिए, उनके अनुभवों का सम्मान करना चाहिए और उन्हें घर के महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल करना चाहिए ताकि वे खुद को उपयोगी महसूस करें।

बुजुर्ग हमारे समाज की जड़ें हैं; यदि जड़ें ही कमजोर हो गईं, तो समाज रूपी पेड़ कभी फलीभूत नहीं हो सकता। सरकार को अपनी नीतियों में संवेदनशीलता लानी होगी और समाज को अपने संस्कारों को पुनर्जीवित करना होगा। बुढ़ापे की लाठी को मजबूत करना केवल हमारा कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारी मानवता की परीक्षा भी है।

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Author: आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क

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