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राष्ट्रपति भवन से आखिरी व्याख्यान तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का वह जीवन, जो मृत्यु के बाद भी भारत को पढ़ा रहा है

कुछ लोग जीवन में ऊँचे पदों तक पहुँचते हैं, कुछ लोग इतिहास में अपना नाम दर्ज कराते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो अपने जीवन को ही एक ऐसी पुस्तक बना देते हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ बार-बार पढ़ती हैं।

आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क | Updated: 14 Oct 2026, 05:19 PM | Views: 0 | 14 मिनट पढ़ें
राष्ट्रपति भवन से आखिरी व्याख्यान तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का वह जीवन, जो मृत्यु के बाद भी भारत को पढ़ा रहा है

 वीरेश तिवारी, लेखक एवं स्तंभकार
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी

कुछ लोग जीवन में ऊँचे पदों तक पहुँचते हैं, कुछ लोग इतिहास में अपना नाम दर्ज कराते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो अपने जीवन को ही एक ऐसी पुस्तक बना देते हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ बार-बार पढ़ती हैं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इसी तीसरी श्रेणी के व्यक्ति थे। उन्होंने वैज्ञानिक के रूप में भारत की सामरिक क्षमता को मजबूत किया, राष्ट्रपति के रूप में सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को जनसामान्य से जोड़ा और शिक्षक के रूप में देश के बच्चों तथा युवाओं के भीतर बड़े सपने देखने का साहस पैदा किया।लेकिन उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता केवल यह नहीं थी कि वे भारत के राष्ट्रपति बने। 

असली विशेषता यह थी कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे अपने भीतर के शिक्षक को कभी राष्ट्रपति भवन की दीवारों के पीछे कैद नहीं होने देना चाहते थे। उनके जीवन को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि एक साधारण परिवार में जन्मा बालक किस प्रकार विज्ञान की दुनिया में पहुँचा, देश की सुरक्षा के लिए काम किया, राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर बैठा और फिर उसी समाज के बीच लौट गया, जहाँ से उसने अपने सपनों की शुरुआत की थी।

15 अक्टूबर 1931: रामेश्वरम से शुरू हुई असाधारण यात्रा
डॉ. अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। उनका परिवार साधारण आर्थिक परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करता था। उनके पिता जैनुलाब्दीन नाव से जुड़े काम करते थे और उनकी माता आशियम्मा परिवार की देखभाल करती थीं। बचपन में कलाम ने आर्थिक सीमाओं को निकट से देखा। अखबार वितरण जैसे कामों से जुड़कर उन्होंने परिवार की सहायता भी की।

उनकी कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि सीमित संसाधन उनके सपनों की सीमा नहीं बने। उनके पास शुरुआत में न तो बड़े संस्थानों की सुविधाएँ थीं और न ही किसी प्रभावशाली परिवार का सहारा। उनके पास सीखने की इच्छा, मेहनत करने की क्षमता और अपने भविष्य को बेहतर बनाने की ललक थी।रामेश्वरम की सामाजिक और धार्मिक विविधता ने भी उनके व्यक्तित्व को आकार दिया। उनके परिवार के संपर्क विभिन्न धार्मिक परंपराओं के लोगों से थे। उनके जीवन के बारे में लिखने वाले कई लेखकों ने उल्लेख किया है कि उन्होंने बचपन से ही धार्मिक सह-अस्तित्व और आपसी सम्मान का वातावरण देखा।यहाँ आज के भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण संदेश छिपा है। 

किसी बच्चे की क्षमता का मूल्यांकन केवल उसके परिवार की आर्थिक स्थिति, धर्म, जाति, भाषा या सामाजिक पहचान से नहीं होना चाहिए। समाज यदि प्रतिभा को अवसर देता है, तो वही प्रतिभा एक दिन पूरे देश की ताकत बन सकती है।

पढ़ाई ने रास्ता बनाया, विज्ञान ने पहचान दी
कलाम ने सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से भौतिक विज्ञान की पढ़ाई की और आगे मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में वैमानिकी अभियांत्रिकी का अध्ययन किया। उनका आकर्षण विमान, उड़ान और अंतरिक्ष की तकनीक की ओर था। उन्होंने उस क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, जिसमें असफलता की कीमत अधिक होती है और सफलता के लिए वर्षों का धैर्य चाहिए।

1960 के दशक में उन्होंने भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में काम शुरू किया। बाद में वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से जुड़े। वहाँ उन्होंने भारत के स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान SLV-3 के विकास में परियोजना निदेशक के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जुलाई 1980 में इसी प्रक्षेपण यान के माध्यम से रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस सफलता को केवल एक वैज्ञानिक की उपलब्धि कहना अधूरा होगा। इसके पीछे अनेक वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और संस्थानों का संयुक्त प्रयास था। कलाम की नेतृत्व क्षमता का एक पहलू यह था कि वे अलग-अलग विशेषज्ञताओं को एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य से जोड़ने में सक्षम थे।

यह आज के युवाओं के लिए भी सीख है। बड़ी उपलब्धियाँ केवल व्यक्तिगत प्रतिभा से नहीं आतीं। किसी व्यक्ति की प्रतिभा तभी व्यापक परिणाम देती है, जब वह टीम के साथ काम करना, दूसरों की विशेषज्ञता का सम्मान करना और असफलताओं से सीखना जानता हो।

असफलता में नेतृत्व की परीक्षा होती है
कलाम के जीवन से जुड़ी एक घटना नेतृत्व की परिभाषा समझने में विशेष रूप से उपयोगी है। 1979 में SLV-3 का पहला प्रक्षेपण अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया। उस समय परियोजना का नेतृत्व कलाम कर रहे थे। इसरो के तत्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर सतीश धवन ने सार्वजनिक रूप से असफलता की जिम्मेदारी स्वयं संभाली। अगले वर्ष, जब प्रक्षेपण सफल हुआ, तो उन्होंने सफलता का श्रेय अपनी टीम और कलाम को आगे रखकर दिया।

यह घटना हमें बताती है कि नेतृत्व का अर्थ केवल मंच पर खड़े होकर उपलब्धियों का श्रेय लेना नहीं है। नेतृत्व का अर्थ कठिन समय में जिम्मेदारी स्वीकार करना और सफलता मिलने पर सहयोगियों को सम्मान देना भी है।आज राजनीति, प्रशासन, कारोबार और सामाजिक संस्थाओं में इस सिद्धांत की आवश्यकता है। यदि कोई अधिकारी अपनी गलती का उत्तरदायित्व अधीनस्थों पर डाल देता है, कोई कारोबारी अपनी टीम की मेहनत का श्रेय अकेले ले लेता है या कोई जनप्रतिनिधि केवल उपलब्धियों के समय सामने आता है, तो वह नेतृत्व की पूरी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा।डॉ. कलाम की यात्रा का यह प्रसंग याद दिलाता है कि किसी व्यक्ति कीवास्तविक ऊँचाई उसके पद से नहीं, बल्कि उस समय उसके आचरण से मापी जानी चाहिए, जब परिस्थितियाँ उसके पक्ष में न हों।

‘मिसाइल मैन’ बनने के पीछे क्या था?
कलाम ने अंतरिक्ष कार्यक्रम में योगदान देने के बाद स्वदेशी निर्देशित मिसाइलों के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के प्रमुख चेहरों में शामिल थे। अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइल प्रणालियों के विकास तथा भारत की रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रयासों के कारण उन्हें ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाने लगा।
1998 के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों में भी उन्होंने वैज्ञानिक और समन्वयकारी भूमिका निभाई। उस दौर में उनका कार्य भारत की रणनीतिक क्षमता और रक्षा अनुसंधान से जुड़ा था।यहाँ उनके जीवन का एक दूसरा पक्ष सामने आता है। कलाम का वैज्ञानिक कार्य केवल प्रयोगशाला में किसी उपकरण को विकसित करने तक सीमित नहीं था। वे देश की दीर्घकालीन तकनीकी क्षमता के बारे में सोचते थे। उनका मानना था कि भारत को महत्त्वपूर्ण तकनीकों के लिए लगातार दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

फिर भी उनके व्यक्तित्व को केवल मिसाइलों तक सीमित करना उनके व्यापक योगदान को छोटा कर देना होगा। वे विज्ञान को राष्ट्रीय विकास, शिक्षा और मानवीय आवश्यकताओं से जोड़ने के पक्षधर थे। उनकी दृष्टि में विज्ञान का उद्देश्य केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज की क्षमता बढ़ाना भी था।

25 जुलाई 2002: वैज्ञानिक राष्ट्रपति भवन पहुँचा
25 जुलाई 2002 को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 तक रहा। वे ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा अनुसंधान, तकनीकी विकास और राष्ट्रीय मिशनों में बिताया था।राष्ट्रपति पद तक उनकी यात्रा इस बात का प्रतीक बनी कि सार्वजनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान का भी विशेष महत्त्व है। उनके राष्ट्रपति बनने से आम नागरिकों, खासकर विद्यार्थियों, में एक अलग प्रकार का उत्साह दिखाई दिया। उन्हें ‘जनता के राष्ट्रपति’ केरूप में पहचान मिली। इसका कारण केवल उनका सरल व्यक्तित्व नहीं था, बल्कि लोगों तक पहुँचने का उनका तरीका भी था।राष्ट्रपति भवन भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद का निवास और कार्यालय है। वहाँ बैठने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी संविधान के अनुरूप कार्य करना और राष्ट्र की संस्थागत गरिमा को बनाए रखना है। कलाम ने इस पद पर रहते हुए युवाओं, शिक्षकों और वैज्ञानिकों से संवाद को विशेष महत्त्व दिया। वे विद्यार्थियों से मिलते, उनके प्रश्न सुनते और उन्हें देश के भविष्य के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करते थे।

उनकी लोकप्रियता का महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि वे बच्चों से केवल यह नहीं कहते थे कि बड़े सपने देखो; वे उन्हें विज्ञान, ज्ञान, मेहनत और राष्ट्रनिर्माण से जोड़कर उन सपनों को पूरा करने की दिशा भी दिखाते थे।राष्ट्रपति का पद किसी व्यक्ति को सम्मान देता है, लेकिन उस सम्मान को जनता के बीच सार्थक बनाना व्यक्ति के व्यवहार पर निर्भर करता है। कलाम की सार्वजनिक छवि हमें इसी बात की याद दिलाती है।

राष्ट्रपति भवन के बाद उन्होंने क्या किया?
25 जुलाई 2007 को राष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूरा होने के बाद कलाम सार्वजनिक जीवन से दूर नहीं हुए। वे फिर शिक्षा, शोध, लेखन और विद्यार्थियों से संवाद की दुनिया में सक्रिय हो गए। उन्होंने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से जुड़कर अध्यापन और व्याख्यान दिए। वे युवाओं को विज्ञान और तकनीक की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। यह उनके जीवन का ऐसा पहलू है, जिस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। आम तौर पर लोग किसी बड़े पद पर पहुँचने को जीवन की अंतिम उपलब्धि मान लेते हैं। पद समाप्त होने के बाद वे अपनी पहचान को लेकर असमंजस में पड़ जाते हैं। कलाम ने इसके विपरीत रास्ता चुना। उन्होंने अपनी पहचान को पद के बजाय अपने काम से जोड़े रखा।

राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी वे शिक्षक थे, लेखक थे, वैज्ञानिक सोच रखने वाले मार्गदर्शक थे और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत थे। उनका सार्वजनिक जीवन यह प्रश्न उठाता है कि क्या हमारी पहचान केवल उस कुर्सी पर निर्भर होनी चाहिए, जिस पर हम बैठे हैं, या उस उपयोगिता पर भी, जिसे हम कुर्सी से उठने के बाद समाज को देते हैं?समाज में ऐसे अनेक लोग हैं, जो किसी संस्था, संगठन, सरकारी विभाग या राजनीतिक पद पर रहते हुए सम्मान प्राप्त करते हैं। लेकिन स्थायी सम्मान वही अर्जित करता है, जो पद समाप्त होने के बाद भी अपने अनुभव और ज्ञान से समाज को कुछ देता रहता है।कलाम का उदाहरण बताता है कि पद अस्थायी हो सकता है, लेकिन ज्ञान बाँटने की क्षमता और समाज के प्रति जिम्मेदारी जीवनभर कायम रह सकती है।

सादगी, खानपान और जीवनशैली: बड़ी पहचान के पीछे साधारण आदतेंकलाम के जीवन के बारे में उनके सहयोगियों और परिचितों ने उनकी सादगी, अनुशासन और काम के प्रति समर्पण का उल्लेख किया है। उनके व्यक्तित्व में बाहरी दिखावे की तुलना में अध्ययन, विचार और काम का स्थान अधिक था। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सार्वजनिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत सादगी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।उनके खानपान के बारे में प्रकाशित संस्मरणों में साधारण भोजन, दक्षिण भारतीय व्यंजनों और समय पर भोजन करने की आदत का उल्लेख मिलता है। उनके निकट सहयोगी सृजन पाल सिंह की पुस्तक What Can I Give? में कलाम की दिनचर्या और खानपान से जुड़े प्रसंगों का वर्णन है। उनमें कम तेल वाले डोसे, सांभर, दही और सादे भोजन का उल्लेख मिलता है। 

 इन विवरणों को किसी व्यक्ति के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य-नियम नहीं समझना चाहिए। हर व्यक्ति की शारीरिक जरूरतें अलग होती हैं। लेकिन कलाम की जीवनशैली से समय का सम्मान, अपनी दिनचर्या के प्रति सजगता और अनावश्यक दिखावे से दूरी जैसी सीख अवश्य ली जा सकती है।उनके जीवन की असली सादगी केवल कपड़ों या भोजन में नहीं थी। वह इस बात में भी दिखाई देती थी कि उन्होंने अपनी सार्वजनिक पहचान को व्यक्तिगत वैभव के प्रदर्शन के बजाय ज्ञान और सेवा से जोड़कर रखा।आज जब समाज में सफलता को अक्सर महँगी गाड़ियों, बड़े घरों, महँगे कपड़ों और सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली चमक से मापा जाता है, तब कलाम की जीवनशैली हमें सफलता की दूसरी परिभाषा पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। किसी व्यक्ति कावास्तविक मूल्य इस बात से नहीं तय होना चाहिए कि उसके पास कितनी वस्तुएँ हैं, बल्कि इससे कि उसके ज्ञान, आचरण और काम से कितने लोगों को लाभ हुआ।

धर्म से संवाद, समाज से जुड़ाव
कलाम मुस्लिम परिवार में जन्मे थे, लेकिन उनके जीवन और विचारों में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान का उल्लेख मिलता है। उनके पिता के घर में अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच संवाद की परंपरा का जिक्र उनके जीवन पर लिखे गए संस्मरणों में मिलता है।इस प्रसंग को आज के भारत के संदर्भ में समझना महत्त्वपूर्ण है। विविधता केवल किसी देश की जनसंख्या का तथ्य नहीं होती; वह उसके सामाजिक व्यवहार की परीक्षा भी होती है। अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और परंपराओं के लोग यदि एक-दूसरे को सम्मान देते हुए साथ काम कर सकें, तो विविधता राष्ट्रीय शक्ति बनती है।

 कलाम की वैज्ञानिक पहचान और उनका धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन इस बात की याद दिलाते हैं कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने और अपनी आध्यात्मिक परंपरा से संवाद रखने को अनिवार्य रूप से एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं देखा जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति की आस्था निजी हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में दूसरों के प्रति सम्मान और समान नागरिकता का सिद्धांत सबके लिए महत्त्वपूर्ण है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम महान व्यक्तियों को अपने-अपने खाँचों में बाँटकर उनकी विरासत को छोटा न करें। उनके जीवन से वे मूल्य ग्रहण करें, जो पूरे समाज को बेहतर बना सकते हैं।

किताबें, विचार और विकसित भारत का सपना
कलाम केवल वैज्ञानिक या राष्ट्रपति नहीं थे; वे लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा Wings of Fire ने अनेक पाठकों को उनके जीवन और वैज्ञानिक यात्रा से परिचित कराया। India 2020, Ignited Minds और My Journey जैसी पुस्तकों में उनके विचार, अनुभव और राष्ट्र के भविष्य से जुड़े प्रश्न सामने आते हैं। उनका विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक प्रगति का विचार नहीं था। वेविज्ञान और तकनीक, शिक्षा, ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भरता और युवाओं की भागीदारी को राष्ट्रीय परिवर्तन के महत्त्वपूर्ण हिस्सों के रूप में देखते थे।उनके विचारों को आज पढ़ते समय यह भी जरूरी है कि हम उन्हें केवल प्रेरणादायक वाक्यों तक सीमित न कर दें। 

यदि कोई विद्यार्थी उनकी पुस्तक पढ़ता है, तो वह केवल सपना देखने की बात न सीखे, बल्कि अध्ययन और कौशल-विकास की जिम्मेदारी भी समझे। कोई कारोबारी उनकी कहानी पढ़े, तो वह केवल सफलता का उत्सव न मनाए, बल्कि नवाचार, टीमवर्क और दीर्घकालीन दृष्टि को अपनाने पर विचार करे। कोई जनप्रतिनिधि उनके जीवन से प्रेरणा ले, तो वह युवाओं की शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और सार्वजनिक संस्थाओं की गुणवत्ता को अपने काम का हिस्सा बनाए।

महान व्यक्तियों की स्मृति तभी उपयोगी होती है, जब वह हमारे व्यवहार में कोई सकारात्मक बदलाव लाती है।अंतिम व्याख्यान: जिस कर्तव्य से जीवन जुड़ा था, उसी के बीच अंतिम क्षण आया27 जुलाई 2015 को डॉ. कलाम शिलांग स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में विद्यार्थियों को व्याख्यान देने पहुँचे थे। उनके व्याख्यान का विषय था—Creating a Livable Planet Earth अर्थात ऐसा पृथ्वी-ग्रह बनाना, जिस पर जीवन बेहतर ढंग से फल-फूल सके। व्याख्यान के दौरान वे अचानक गिर पड़े।

 उन्हेंअस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसी दिन उनका निधन हो गया। वे 83 वर्ष के थे। उनके अंतिम क्षणों के बारे में एक भावनात्मक कथन प्रचलित है। आपने भी एक पुस्तक में पढ़े प्रसंग का उल्लेख किया है कि उनसे पूछा गया था कि वे अपने जीवन का अंत किस प्रकार चाहते हैं और उन्होंने पढ़ाते हुए अंतिम साँस लेने की इच्छा जताई थी। 

उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों में मुझे इस कथन के ठीक इन्हीं शब्दों और उस कथित बातचीत की पुष्टि नहीं मिली। इसलिए इसे उनके प्रमाणित शब्दों के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।लेकिन प्रमाणित घटना अपने आप में अत्यंत अर्थपूर्ण है। वे राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद भी शिक्षा और विद्यार्थियों से संवाद के काम में लगे रहे। उनकी मृत्यु व्याख्यान देते समय हुई। यह उनके जीवन की उस निरंतरता को सामने लाती है, जिसमें ज्ञान बाँटना उनके सार्वजनिक जीवन का केंद्रीय हिस्सा बना रहा।इस घटना का महत्त्व यह नहीं कि इसे किसी चमत्कार या पूर्वनिर्धारित इच्छा का रूप दे दिया जाए। महत्त्व यह है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी उस काम को जारी रखा, जिसे वे समाज के लिए उपयोगी मानते थे।

किसी व्यक्ति के जीवन का मूल्य केवल उसकी आयु से नहीं मापा जा सकता। यह भी देखा जाना चाहिए कि उसने अपने समय, प्रतिभा और अनुभव का कितना हिस्सा दूसरों के हित में लगाया। कलाम की अंतिम सार्वजनिक यात्रा इस प्रश्न को हमारे सामने छोड़ जाती है।

भारत को कलाम से क्या सीखना चाहिए?
आज भारत के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं—गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी आत्मनिर्भरता, सामाजिक विश्वास और सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही। इन चुनौतियों का समाधान किसी एक महान व्यक्ति की जीवनी पढ़ लेने से नहीं होगा। लेकिन ऐसे जीवन हमें सही दिशा चुनने में सहायता कर सकते हैं।विद्यार्थियों के लिए उनकी कहानी का संदेश है कि आर्थिक सीमाएँ अंतिम निर्णय नहीं हैं; अध्ययन, कौशल और मेहनत से नए रास्ते बनाए जा सकते हैं।

शिक्षकों के लिए संदेश है कि शिक्षा केवल परीक्षा में अंक दिलाने का माध्यम नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य जिज्ञासा, तर्क, चरित्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना भी है।वैज्ञानिकों और कारोबारियों के लिए संदेश है कि नवाचार, सहयोग और दीर्घकालीन दृष्टि के बिना कोई देश तकनीकी रूप से मजबूत नहीं बन सकता।राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व के लिए संदेश है किजिम्मेदारी स्वीकार करना, टीम को सम्मान देना और जनता के साथ संवाद बनाए रखना पद की गरिमा को बढ़ाता है।

और आम नागरिक के लिए संदेश है कि देश का विकास केवल सरकारों, संस्थानों या बड़े नेताओं की जिम्मेदारी नहीं है। अपने काम में ईमानदारी, बच्चों की शिक्षा में सहयोग, सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान और समाज में आपसी विश्वास बनाए रखना भी राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा है।

निष्कर्ष: व्यक्ति चला जाता है, लेकिन उसका काम भविष्य से संवाद करता रहता है
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी पुस्तकें पढ़ी जा सकती हैं, उनके वैज्ञानिक योगदान का अध्ययन किया जा सकता है और उनके जीवन से निकले मूल्यों पर विचार किया जा सकता है। उनका जीवन किसी एक पद, एक पुरस्कार या एक उपलब्धि की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा है, जिसने ज्ञान के माध्यम से अपनी सीमाओं का विस्तार किया और अपने अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास किया।उनका जीवन हमें यह भी समझाता है कि महानता केवल असाधारण उपलब्धि हासिल करने में नहीं है। 

महानता इस बात में भी है कि व्यक्ति अपने ज्ञान को दूसरों के लिए उपयोगी बनाए, असफलता से सीखे, सफलता में सहयोगियों को सम्मान दे और अपने पद से परे अपनी जिम्मेदारी को पहचानता रहे।राष्ट्रपति भवन में बिताए पाँच वर्षों ने उन्हें देश का प्रथमनागरिक बनाया था; लेकिन विद्यार्थियों के बीच बिताए वर्षों ने उन्हें करोड़ों लोगों के मन में जगह दी। विज्ञान ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी, लेखन ने उनके विचारों को दूर तक पहुँचाया और शिक्षा के प्रति समर्पण ने उनके जीवन को एक स्थायी सामाजिक अर्थ दिया।भारत को आज भी ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है, जो बड़े सपने देखें, लेकिन केवल अपने लिए नहीं; जो सफलता चाहें, लेकिन जिम्मेदारी से समझौता करके नहीं; जो पद प्राप्त करें, लेकिन पद को ही अपनी संपूर्ण पहचान न बना लें।

डॉ. कलाम की विरासत का सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि हम उनकी तस्वीरों पर मालाएँ चढ़ाने के साथ-साथ उनके जीवन से निकली सीख को अपने व्यवहार में भी उतारें।क्योंकि किसी महान व्यक्ति को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका केवल उसकी जयंती मनाना नहीं, बल्कि उसके विचारों से अगली पीढ़ी का भविष्य बेहतर बनाना है।

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Author: आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क

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