डॉ. दीपक गोस्वामी
देश के चर्चित लेखक, प्रेरक वक्ता, प्रशिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता
सात समंदर पार एक ऐसा देश है जहाँ सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से कम और सरकारी घोषणाओं की खड़खड़ाहट से अधिक होती है। वहाँ सिंहासन पर बैठने वाले के सिर पर मुकुट हो या न हो, हाथ में एक मोटी कलम अवश्य होती है। उस कलम की नोक पर लिखा रहता है—टैरिफ टैक्स।
उस शब्द का असर बड़ा विचित्र है। जैसे ही घोषणा होती है, सब्ज़ी वाला तराजू सीधा कर लेता है, दुकानदार नया मूल्य-पट्ट टाँग देता है, व्यापारी माथे पर हाथ रख लेता है और गृहिणी रसोई का गणित फिर से लिखने बैठ जाती है। लगता है जैसे कर नहीं बढ़ा, पूरे बाजार का रक्तचाप बढ़ गया हो।
टैरिफ टैक्स अपने आप में कोई खलनायक नहीं है। हर देश अपने उद्योगों की रक्षा के लिए कभी-कभी आयात शुल्क बढ़ाता है। समस्या तब पैदा होती है जब नीति विवेक से नहीं, अहंकार से संचालित होने लगती है। वही क्षण होता है जब अर्थशास्त्र दरबार का विदूषक बन जाता है और राजनीति स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा व्यापारी समझने लगती है।
यहीं से हमारी व्यंग यात्रा प्रारंभ होती है और व्यंग्य के प्रतीकात्मक महानायक जी प्रवेश करते है—आधुनिक युग के भस्मासुर।
पुराणों वाला भस्मासुर सिर पर हाथ रखकर भस्म करता था। यह आधुनिक भस्मासुर कलम चलाकर जेब हल्की करता है। उसके सामने वस्तुओं की एक लंबी सूची रहती है—इस्पात, कपड़ा, दवा, मोटर, खिलौने, अन्न, मशीनें और जाने क्या-क्या। हर पंक्ति के सामने एक ही आदेश—"टैरिफ टैक्स बढ़ाओ।"
दरबार में तभी प्रतीकात्मक नव नायक आधुनिक वाणासुर आता है। हजार हाथों वाला नहीं, हजार सलाहों वाला। एक हाथ में गणना, दूसरे में प्रचार, तीसरे में ताली और बाकी हाथ जय-जयकार के लिए सुरक्षित।
वह मुस्कराकर कहता है—"महाराज! कर बढ़ाइए। दुनिया पहले चौंकेगी, फिर डरेगी, फिर झुकेगी।"
महाराज प्रसन्न।
घोषणा जारी।
पहले केले पर शुल्क।
फिर कमीज़ पर।
फिर इस्पात पर।
फिर मोटरों पर।
फिर दवाओं पर।
घोषणाएँ ऐसी बरसने लगीं जैसे सावन में बादल नहीं, कर बरस रहे हों।
शुरू-शुरू में दुनिया मुस्कराई। लोगों ने सोचा—"कुछ दिन का उत्साह है, फिर सब सामान्य हो जाएगा।"
लेकिन जब मूल्य सचमुच बढ़ने लगे, तब दूसरे देशों ने भी अपनी-अपनी लाल कलमें निकाल लीं। उन्होंने भी कहा—"यदि तुम हमारे माल पर कर लगाओगे, तो हम भी तुम्हारे माल पर शुल्क लगाएंगे।"
अब दृश्य बड़ा मनोरंजक था।
एक देश कर बढ़ाता।
दूसरा उत्तर देता।
पहला फिर बढ़ाता।
दूसरा फिर प्रत्युत्तर देता।
और बीच में बैठा साधारण नागरिक अपने मासिक बजट के पन्ने फाड़-फाड़कर नया हिसाब लिखता।
व्यापार का युद्ध शुरू होते ही सबसे पहले घायल सैनिक नहीं, ग्राहक होता है।
बाजार में तीन तख्तियाँ दिखाई देने लगीं।
पहली—"विदेशी वस्तु महँगी है।"
दूसरी—"देशी वस्तु अपनाइए।"
तीसरी—"जो उपलब्ध है, उसी में संतोष कीजिए।"
सबसे अधिक भीड़ तीसरी तख्ती के सामने थी।
एक व्यापारी बोला—"गोदाम भरा पड़ा है, ग्राहक खाली जेब लेकर घूम रहा है।"
एक मजदूर बोला—"काम वही है, पर अतिरिक्त समय का काम गायब है।"
एक गृहिणी बोली—"थाली छोटी हो रही है और भाषण बड़े।"
एक अर्थशास्त्री बोला—"यह वैश्विक पुनर्संतुलन है।"
पास खड़ा किसान मुस्करा दिया। उसने कहा—"बेटा! खेत में फसल प्रतिस्पर्धा से नहीं, ऋतु, पानी और भरोसे से उगती है। व्यापार भी वैसा ही होता है।"
भस्मासुर ने उसकी बात नहीं सुनी।
वाणासुर ने ताली बजा दी।
दरबार में तालियाँ बढ़ती गईं और बाजार में मूल्य।
धीरे-धीरे लोगों ने रास्ता बदलना शुरू किया। किसी ने नए व्यापारिक साथी खोज लिए, किसी ने स्थानीय उत्पादन बढ़ा लिया, किसी ने नए मार्ग बना लिए। दुनिया ठहरती नहीं, रास्ता बदल लेती है।
भस्मासुर को लगा था कि वह सबको झुका देगा। पर उसे यह समझने में देर लगी कि व्यापार आदेश से नहीं, विश्वास से चलता है।
विश्वास टूटे तो अनुबंध टूटते हैं।
अनुबंध टूटे तो निवेश रुकता है।
निवेश रुका तो रोजगार डगमगाता है।
और जब रोजगार डगमगाता है तो सबसे पहले किसी महल का नहीं, एक साधारण रसोईघर का चूल्हा प्रभावित होता है।
उसी समय एक वृद्ध कुम्हार अपने चाक पर मिट्टी घुमा रहा था। उसने बिना ऊपर देखे कहा—
"घड़ा बाहर से थपकी और भीतर से सहारा मिलने पर बनता है। केवल चोट दोगे तो मिट्टी बिखर जाएगी।"
दरबार तक यह बात पहुँची नहीं, पर बाजार ने सुन ली।
धीरे-धीरे व्यापारियों ने नए रास्ते खोज लिए।
उद्योगों ने नए साझेदार बना लिए।
ग्राहकों ने नई आदतें सीख लीं।
और दुनिया ने फिर सिद्ध कर दिया कि व्यापार नदी की तरह है। जहाँ बाँध बहुत ऊँचा बनाओगे, वह नया रास्ता खोज लेगी।
अंततः आधुनिक भस्मासुर आईने के सामने खड़ा था।
एक हाथ में लाल कलम।
दूसरे में नई शुल्क सूची।
सामने अपना ही चेहरा।
पीछे खाली होती तालियाँ।
और दूर कहीं एक बच्चा पतंग उड़ा रहा था।
पतंग पर कोई शुल्क नहीं था।
हवा पर कोई कर नहीं था।
मुस्कान पर कोई प्रतिबंध नहीं था।
तभी लगा कि दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार वस्तुओं का नहीं, विश्वास का है।
कर आवश्यक हो सकते हैं, पर अहंकार कभी आवश्यक नहीं होता।
प्रतिस्पर्धा विकास ला सकती है, पर प्रतिशोध समृद्धि नहीं लाता।
इतिहास गवाह है—दीवारें बनाने वाले राजा कुछ समय के लिए चर्चित अवश्य हुए, पर पुल बनाने वाले युगों तक स्मरण किए गए।
याद रखिए—
बाजार ताली से नहीं, थाली से चलता है।
व्यापार धमकी से नहीं, भरोसे से चलता है।
कर से तिजोरी भर सकती है, पर रिश्ते नहीं।
और अंत में—
यदि नीति का उद्देश्य जनता का जीवन सरल बनाना है तो हर निर्णय की कसौटी केवल एक होनी चाहिए—क्या इससे सामान्य नागरिक की थाली सुरक्षित हुई? यदि उत्तर "हाँ" है तो नीति सफल है, यदि "नहीं" है तो सबसे ऊँची घोषणा भी केवल शोर है।
तो आइए, मुस्कराइए भी और सोचिए भी।
क्योंकि व्यंग्य का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि ऊँचे सिंहासनों को आईना दिखाना है।
अरे, चिंता छोड़िए।
थोड़ा मुस्कराइए।
दो रोटियाँ बाँटिए।
और इतनी ज़ोर से हँसिए कि अहंकार की दीवारों में भी दरार पड़ जाए।