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Updated: 09 September 2026 | Hindi News Portal
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आज का मुद्दा पर प्रकाशित खबरों में स्थानीय संदर्भ, सत्यापन और पाठकों के काम की जानकारी को प्राथमिकता दी जाती है।
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पेइंग गेस्ट : किराये की चारदीवारी में कैद छात्रों का सच

दिल्ली के सत्य निकेतन में सात सितंबर को ढही छात्र-आवासीय इमारत केवल ईंट, सीमेंट और सरिये का ढेर नहीं थी। वह उस शहरी व्यवस्था का आईना थी, जिसमें देशभर से पढ़ने और रोजगार की तलाश में महानगरों का रुख करने वाले हजारों युवा अपनी शिक्षा के साथ-साथ असुरक्षित आवास का जोखिम भी उठाने को विवश हैं।

आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क | Updated: 08 Sep 2026, 04:00 PM | Views: 0 | 5 मिनट पढ़ें
पेइंग गेस्ट : किराये की चारदीवारी में कैद छात्रों का सच

इस रिपोर्ट में क्या खास है?

  • खबर को स्थानीय पाठकों के संदर्भ में सरल भाषा में समझाया गया है।
  • जहां उपलब्ध हो, आधिकारिक जानकारी, प्रत्यक्ष बयान और जमीन से मिली जानकारी को आधार बनाया जाता है।
  • नई जानकारी आने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाता है और तारीख ऊपर दी जाती है।

दिल्ली के सत्य निकेतन में सात सितंबर को ढही छात्र-आवासीय इमारत केवल ईंट, सीमेंट और सरिये का ढेर नहीं थी। वह उस शहरी व्यवस्था का आईना थी, जिसमें देशभर से पढ़ने और रोजगार की तलाश में महानगरों का रुख करने वाले हजारों युवा अपनी शिक्षा के साथ-साथ असुरक्षित आवास का जोखिम भी उठाने को विवश हैं।

इस दुर्घटना में सात लोगों की मृत्यु हुई और बारह लोगों को मलबे से सुरक्षित निकाला गया। भवन कई दशक पुराना बताया गया था और उसके निचले हिस्से में निर्माण संबंधी कार्य चल रहा था। दुर्घटना के बाद नगर निकाय के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और भवन स्वामी परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार किया गया।

लेकिन असली प्रश्न गिरफ्तारी से आगे है।

क्या अगली इमारत को गिरने से पहले बचाया जाएगा?

यही इस दुर्घटना की सबसे बड़ी पुकार है।

महानगरों में छात्रावासों की कमी ने निजी छात्र-आवास के एक बड़े बाजार को जन्म दिया है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, कोटा और अन्य शिक्षा केंद्रों में हजारों युवा घर से दूर रहकर पढ़ते हैं। सरकारी तथा विश्वविद्यालयीय छात्रावास सीमित हैं, इसलिए निजी मकान, कमरे और छात्र-आवास उनकी पहली आवश्यकता बन जाते हैं।

समस्या निजी आवास के अस्तित्व में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब कमरे की कमाई सुरक्षा पर भारी पड़ने लगे।

एक मकान में जितने अधिक कमरे बनाए जा सकते हैं, बनाए जाते हैं। एक कमरे में जितने अधिक बिस्तर लगाए जा सकते हैं, लगाए जाते हैं। एक बिस्तर से जितना अधिक किराया लिया जा सकता है, लिया जाता है। धीरे-धीरे रहने का स्थान मनुष्य की आवश्यकता नहीं, केवल आय का साधन बन जाता है।

छात्र भी मजबूर है। उसे महाविद्यालय से निकटता चाहिए, कम किराया चाहिए, भोजन चाहिए, बिजली-पानी चाहिए और पढ़ाई के अनुकूल वातावरण चाहिए। वह चमकदार कमरा देखकर संतुष्ट हो जाता है। लेकिन वह यह नहीं पूछ पाता कि भवन की स्वीकृत ऊंचाई कितनी है, उसकी वास्तविक क्षमता कितनी है, अग्नि से बचाव की व्यवस्था कैसी है, आपातकालीन निकास कहां है, विद्युत भार कितना है और भवन की मजबूती की अंतिम जांच कब हुई थी।

यही सबसे बड़ा खतरा है।

आज छात्र-आवास का चयन केवल कमरे का चयन नहीं होना चाहिए। यह जीवन की सुरक्षा का निर्णय है।

संकरी गलियां इस समस्या को और गंभीर बना देती हैं। कई स्थानों पर भवनों के बीच पर्याप्त दूरी नहीं होती। बालकनियां एक-दूसरे के सामने होती हैं। ऊपर बिजली के तारों का जाल और नीचे वाहनों तथा दुकानों का दबाव रहता है। ऐसी स्थिति में आग, भूकंप अथवा भवन के किसी हिस्से के गिरने की घटना केवल एक परिवार को नहीं, पूरी बस्ती को संकट में डाल सकती है।

सबसे चिंताजनक स्थिति उन भवनों की है जिनका उपयोग मूल रूप से जिस उद्देश्य के लिए किया गया था, बाद में उससे बिल्कुल अलग रूप में होने लगा। आवासीय भवनों को अत्यधिक संख्या में छात्रों के रहने के स्थान में बदल दिया जाता है। नीचे दुकान, भोजनालय या भंडारगृह और ऊपर कमरों की भरमार। भवन की मूल संरचना वही रहती है, लेकिन उस पर भार कई गुना बढ़ जाता है।

फिर आता है विद्युत व्यवस्था का प्रश्न।

एक छोटे भवन में अत्यधिक शीतलन यंत्र, पानी गर्म करने वाले उपकरण, भोजन पकाने के साधन और अनेक विद्युत उपकरण लगा दिए जाते हैं। यदि तारों और विद्युत भार की क्षमता पर्याप्त न हो तो छोटी-सी चूक भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।

यहां प्रश्न केवल भवन स्वामी से नहीं पूछा जाना चाहिए।

नगर निकाय कहां था?

निर्माण स्वीकृति देने वाली व्यवस्था कहां थी?

अग्नि सुरक्षा की जांच कौन कर रहा था?

विद्युत सुरक्षा की जांच कब हुई?

और सबसे बड़ा प्रश्न—यदि भवन नियमों का उल्लंघन वर्षों से कर रहा था, तो उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया?

दुर्घटना के बाद जांच करना आवश्यक है, लेकिन उससे अधिक आवश्यक है दुर्घटना से पहले खतरे को पहचान लेना।

इसलिए समाधान केवल तोड़फोड़ नहीं है। समाधान व्यवस्था को बदलने में है।

सबसे पहला कदम होना चाहिए कि प्रत्येक छात्र-आवास का अनिवार्य पंजीकरण हो। भवन के बाहर एक संकेत चिह्न हो, जिसे विद्यार्थी अपने दूरभाष से पढ़कर भवन की पूरी जानकारी प्राप्त कर सके। उसमें भवन की स्वीकृत मंजिलें, रहने वालों की अधिकतम संख्या, अग्नि सुरक्षा की स्थिति, विद्युत सुरक्षा, भवन की अंतिम मजबूती जांच और पंजीकरण की वैधता स्पष्ट हो।

दूसरा कदम होना चाहिए—सार्वजनिक सुरक्षा श्रेणी।
जिस प्रकार किसी भोजनालय की स्वच्छता देखी जाती है, उसी प्रकार छात्र-आवास की सुरक्षा भी सार्वजनिक रूप से दिखाई देनी चाहिए। विद्यार्थी को कमरे की सुंदरता से पहले भवन की सुरक्षा दिखाई दे।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण उपाय है—सरकारी छात्रावासों का व्यापक विस्तार।

जब हजारों विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त छात्रावास उपलब्ध नहीं होंगे तो निजी आवास पर दबाव बढ़ेगा ही। विश्वविद्यालयों, नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों को उपलब्ध भूमि का उपयोग करके सुरक्षित, सस्ते और मानकयुक्त छात्रावास बनाने चाहिए।

चौथा उपाय—अनिवार्य दुर्घटना बीमा।

प्रत्येक पंजीकृत छात्र-आवास में रहने वाले विद्यार्थी का दुर्घटना बीमा होना चाहिए। इसका खर्च किराये में शामिल किया जा सकता है। दुर्घटना होने पर परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता मिले, ताकि उसे मुआवजे के लिए वर्षों तक कार्यालयों और न्यायालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।

पांचवां उपाय—किराया समझौते में सुरक्षा की स्पष्ट जिम्मेदारी।

किसी भी छात्र से ऐसा समझौता नहीं कराया जाना चाहिए जिसमें भवन स्वामी अपनी मूल सुरक्षा जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए। किसी व्यक्ति को किराये पर कमरा देना केवल धन लेने का अधिकार नहीं, सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी है।

छठा उपाय—विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही।

जो संस्थान हजारों विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं, उन्हें उनके आवास के प्रश्न से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता। कम-से-कम प्रमाणित और सुरक्षित छात्र-आवासों की सूची उपलब्ध कराना संस्थागत जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए।

और सबसे जरूरी है—निरीक्षण दुर्घटना के बाद नहीं, दुर्घटना से पहले हो।

सत्य निकेतन जैसी घटनाओं के बाद कुछ भवनों को बंद कर देना तत्काल कार्रवाई हो सकती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। स्थायी समाधान तब होगा जब प्रत्येक महानगर में पुराने और अधिक भार वाले भवनों की नियमित जांच हो, अवैध निर्माण की पहचान हो और खतरनाक भवनों को समय रहते खाली कराया जाए।

किसी मां-बाप के लिए छात्र-आवास का कमरा केवल दस या पंद्रह हजार रुपये का किराया नहीं है। उस कमरे में रखी किताबों में परिवार की उम्मीद होती है। मेज पर रखा दीपक उस बच्चे के भविष्य का प्रकाश होता है। बिस्तर पर रखा बैग घर से दूर संघर्ष कर रहे एक युवा के सपनों का प्रतीक होता है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए—

“कमरा कितना सुंदर है?”

प्रश्न होना चाहिए—

“जिस छत के नीचे मेरा बच्चा सो रहा है, क्या वह छत सुरक्षित है?”

सत्य निकेतन की सात मौतें केवल सात परिवारों का दुःख नहीं हैं। वे महानगरों के उस विकास मॉडल पर प्रश्न हैं जिसमें इमारतें ऊंची होती गईं, किराये बढ़ते गए, विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती गई, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था उसी गति से मजबूत नहीं हुई।छात्र देश का भविष्य है। उसे शिक्षा के लिए घर से दूर भेजना किसी परिवार के लिए विश्वास का सबसे बड़ा निर्णय होता है। उस विश्वास की रक्षा करना केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं, समाज और शासन की भी जिम्मेदारी है।

हमें ऐसे महानगर नहीं चाहिए जहां विद्यार्थी डिग्री लेकर तो निकल जाए, लेकिन हर रात उस छत के नीचे भय के साथ सोए जिसके नीचे वह अपने भविष्य का सपना देख रहा है।अब समय है कि छात्र-आवास को केवल किराये का व्यवसाय नहीं, बल्कि मानवीय सुरक्षा की जिम्मेदारी माना जाए।

क्योंकि किराये की चारदीवारी में रहने वाला विद्यार्थी भले ही किरायेदार हो, उसका जीवन किसी की निजी संपत्ति नहीं है।

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लेखक

डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत
देश के चर्चित लेखक, प्रेरक वक्ता, प्रशिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता

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Author: आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क

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