समय को समझने के लिए विशाल ग्रंथों से अधिक आवश्यक है वह दृष्टि, जो प्रकृति के छोटे से नियम में विराट सत्य को देख सके। पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग चौबीस घंटे में तीन सौ साठ अंश घूमती है। इस गणना से एक अंश लगभग चार मिनट के बराबर बैठता है। यही साधारण गणित हमें आकाश, धरती, शरीर और जीवन के बीच संबंध दिखाता है। समय केवल घड़ी की सुई नहीं है; वह गति का अनुभव, परिवर्तन का क्रम और अस्तित्व की धड़कन है।
पृथ्वी का अक्ष अपनी कक्षा के लंबवत से लगभग तेईस अंश छब्बीस कला झुका हुआ है। इसी झुकाव और सूर्य की परिक्रमा के कारण वर्ष भर सूर्य का प्रत्यक्ष उत्तर-दक्षिण गमन दिखाई देता है। लगभग इक्कीस जून को सूर्य का उत्तरायण चरम बिंदु आता है और उसकी किरणें कर्क रेखा के निकट लगभग लंबवत पड़ती हैं। कर्क रेखा लगभग तेईस अंश छब्बीस कला उत्तरी अक्षांश पर स्थित है। उस समय दोपहर के आसपास सूर्य लगभग सिर के ऊपर दिखाई दे सकता है और वस्तुओं की छाया अत्यंत छोटी हो जाती है। यह चमत्कार नहीं, प्रकृति के नियमों का सुंदर प्रदर्शन है।
कर्क रेखा भारत के अनेक राज्यों से होकर गुजरती है। गुजरात से लेकर मिजोरम तक उसका विस्तार हमें बताता है कि एक ही सूर्य कितनी विविध भूमि, भाषाओं और जीवन-पद्धतियों को एक साथ प्रकाशित करता है। प्रकृति सीमाएँ नहीं मानती, फिर भी प्रशासन और सामाजिक व्यवस्था के लिए मनुष्य ने समय को एकरूप बनाया।
इसे देशांतर के माध्यम से समझिए। पृथ्वी पश्चिम से पूर्व घूमती है, इसलिए अलग-अलग देशांतरों पर स्थानीय सौर समय अलग होता है। भारत का पूर्वी और पश्चिमी विस्तार लगभग उनतीस अंश है। एक अंश लगभग चार मिनट के बराबर मानें तो दोनों छोरों के स्थानीय सौर समय में लगभग दो घंटे का अंतर बनता है। यदि प्रत्येक नगर अपनी सूर्य-घड़ी के अनुसार चलता, तो रेल, संचार, प्रशासन, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा में भारी कठिनाई उत्पन्न होती। इसलिए भारत ने एक मानक समय स्वीकार किया, जिसका आधार बयासी अंश तीस कला पूर्व देशांतर है। यह मानक रेखा उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर क्षेत्र के निकट से गुजरती है और भारतीय मानक समय को समन्वित करने में आधार प्रदान करती है।
बयासी अंश तीस कला को चार मिनट प्रति अंश के लगभग से गुणा करने पर लगभग पाँच घंटे तीस मिनट का अंतर मिलता है। इसी कारण भारतीय मानक समय समन्वित सार्वभौमिक समय से पाँच घंटे तीस मिनट आगे है। यह विविधताओं के बीच राष्ट्रीय एकता का व्यावहारिक अनुशासन है। प्रकृति ने हमें अनेक स्थानीय समय दिए, मनुष्य ने सुविधा और समन्वय के लिए एक सामाजिक समय चुन लिया। यही सभ्यता की शक्ति है।
शरीर के भीतर भी समय इसी प्रकार काम करता है। प्रकाश और अंधकार हमारे जैविक चक्र को प्रभावित करते हैं। प्रातः सूर्य का प्रकाश मस्तिष्क को जागरण का संकेत देता है, जबकि अंधकार शरीर को विश्राम की ओर ले जाता है। नींद, भूख, ऊर्जा और जागरण पर समय तथा प्रकाश का गहरा प्रभाव पड़ता है। मनुष्य की एक घड़ी भीतर भी चलती रहती है। फिर भी किसी व्यक्ति की दिनचर्या को केवल उसके देशांतर से आलस्य या परिश्रम का प्रमाण मानना उचित नहीं। जीवनशैली और सामाजिक परिस्थितियाँ भी शरीर की लय निर्धारित करती हैं। विज्ञान सिखाता है कि सुंदर विचार प्रमाण के साथ ही पूर्ण होते हैं।
वैदिक और भारतीय दार्शनिक परंपरा ने समय को केवल माप की इकाई नहीं माना। काल को सृष्टि, परिवर्तन और क्षय की व्यापक शक्ति के रूप में देखा गया। श्रीकृष्ण के वचन में काल का विराट रूप सामने आता है। उज्जैन प्राचीन भारतीय खगोलीय परंपरा में महत्वपूर्ण केंद्र रहा। हमारे पूर्वज आकाशीय गति, ऋतु और कालचक्र को जीवन से जोड़ते थे। किसान के लिए वर्षा का समय, बीज बोने का समय और फसल काटने का समय केवल तारीख नहीं, जीवन की आवश्यकता है। लोकज्ञान इसी अनुभव से जन्म लेता है।
सबसे गहरा प्रश्न फिर भी गणित के पार खड़ा है। विज्ञान बताता है कि पृथ्वी क्यों घूमती है और समय कैसे मापा जाता है। दर्शन पूछता है कि नियमों से बंधे इस ब्रह्मांड के अस्तित्व का अर्थ क्या है। विज्ञान नियम का वर्णन करता है; दर्शन उस नियम के अनुभव और अर्थ की खोज करता है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि सत्य को देखने के दो मार्ग हो सकते हैं।
अंतिम जन के लिए समय का अर्थ और भी धरातलीय है। मजदूर के लिए समय मजदूरी मिलने तक का इंतजार है, किसान के लिए मौसम की करवट है, विद्यार्थी के लिए परीक्षा की घड़ी है और परिवार के लिए लौटते हुए व्यक्ति की प्रतीक्षा है।घड़ी सबके लिए समान क्षण गिनती है, पर उन क्षणों का मूल्य सबके लिए समान नहीं होता। यही समय का मानवीय रहस्य है।
प्रकृति में समय चक्र है—प्रभात, दिवस, संध्या और रात्रि; बीज, अंकुर, पुष्प और फल; जन्म, यौवन, वृद्धावस्था और मृत्यु। मनुष्य इस चक्र को रोक नहीं सकता, केवल उसके साथ चलना सीख सकता है। जो व्यक्ति समय को केवल खर्च होने वाली वस्तु मानता है, वह जीवन खोता है। जो उसे चेतना, अवसर और उत्तरदायित्व के रूप में जीता है, वह जीवन का अर्थ पाता है।
समय को नापना नहीं, समझना चाहिए। एक अंश की गति हमें ब्रह्मांड की व्यवस्था दिखाती है, सूर्य की किरणें प्रकृति का गणित समझाती हैं, मानक समय राष्ट्र की एकता सिखाता है और जीवन की धड़कन हमें वर्तमान का मूल्य बताती है। समय किसी एक घड़ी में बंद नहीं है। वह आकाश में गति है, शरीर में लय है, समाज में अनुशासन है, किसान में ऋतु है, श्रमिक में रोटी है और साधक में साधना है। यदि ब्रह्म को उस व्यवस्था का नाम दें जिसमें सब जन्मता, बदलता और विलीन होता है, तो काल उसी व्यवस्था की निरंतर धारा है। इसलिए सुंदर सत्य यही है—समय को पकड़ना संभव नहीं, पर उसे सार्थक बनाना मनुष्य के हाथ में है। समय ही ब्रह्म है, और ब्रह्म ही वह कालधारा है जिसमें हम सब बह रहे हैं।
लेखक: डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत
देश के चर्चित लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर एवं सामाजिक कार्यकर्ता