डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत
लोकतंत्र केवल शासन की एक व्यवस्था नहीं, बल्कि जनता और शासन के बीच सतत संवाद का जीवंत सेतु है। जब यह संवाद सहज रूप से चलता रहता है, तब समाज में विश्वास, सहयोग और विकास का वातावरण निर्मित होता है। किंतु जब नागरिकों को यह अनुभव होने लगता है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, तब वे संविधान और नैतिकता की मर्यादा में रहकर ऐसे साधनों का चयन करते हैं, जिनसे शासन का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो सके। भारत की सांस्कृतिक परंपरा ने ऐसा ही एक विलक्षण मार्ग विश्व को दिया—सत्याग्रह, उपवास और अनशन।
अनशन का अर्थ केवल भोजन का त्याग नहीं है। यह आत्मसंयम, नैतिक आग्रह और अहिंसक प्रतिरोध का सर्वोच्च रूप है। इसमें विरोधी के प्रति घृणा नहीं होती, बल्कि उसके विवेक को जगाने का प्रयास होता है। यही कारण है कि भारतीय जनजीवन में अनशन को केवल राजनीतिक साधन नहीं, बल्कि नैतिक चेतना का माध्यम माना गया है। इसने अनेक अवसरों पर शासन को आत्ममंथन के लिए बाध्य किया और समाज को यह विश्वास दिलाया कि सत्य और अहिंसा आज भी परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति हैं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने विश्व को यह दिखाया कि बिना शस्त्र उठाए भी अन्याय का सामना किया जा सकता है। इस विचार को जीवन का स्वरूप देने वाले महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी थे। उन्होंने अनेक बार उपवास को आत्मशुद्धि, सामाजिक जागरण और जनकल्याण का साधन बनाया। उनका अंतिम उपवास तेरह जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को नई दिल्ली में आरंभ हुआ। उस समय देश विभाजन की विभीषिका से उबरने का प्रयास कर रहा था। सांप्रदायिक हिंसा ने समाज को गहरे घाव दिए थे। गांधीजी ने किसी सरकार के विरुद्ध नहीं, बल्कि समाज की अंतरात्मा को जगाने के लिए उपवास किया। पाँच दिनों तक चले इस उपवास के पश्चात विभिन्न धार्मिक और सामाजिक प्रतिनिधियों ने शांति बनाए रखने तथा परस्पर विश्वास स्थापित करने का सार्वजनिक संकल्प लिया। अठारह जनवरी को गांधीजी ने उपवास समाप्त किया। बारह दिन बाद, तीस जनवरी को उनकी हत्या कर दी गई, किंतु उनका यह संदेश अमर हो गया कि नैतिक शक्ति किसी भी राजनीतिक शक्ति से अधिक प्रभावशाली हो सकती है।
स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक जनआंदोलनों का सबसे प्रभावशाली अध्याय लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लिखा गया। उन्नीस सौ चौहत्तर में उन्होंने बिहार से आरंभ हुए छात्र आंदोलन को व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप दिया। भ्रष्टाचार, बढ़ती महँगाई, प्रशासनिक अनियमितताओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के विरुद्ध उन्होंने "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान किया। उनका उद्देश्य केवल शासन परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीति, शिक्षा, प्रशासन और समाज के नैतिक पुनर्निर्माण का था।
इस आंदोलन में देशभर के विद्यार्थियों, युवाओं, किसानों, कर्मचारियों और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। इसके बाद देश में आपातकाल लागू हुआ, नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए और अनेक विपक्षी नेताओं को कारागार में भेज दिया गया। किंतु लोकतंत्र की चेतना समाप्त नहीं हुई। उन्नीस सौ सतहत्तर के आम चुनावों में जनता ने अपने मताधिकार के माध्यम से सत्ता परिवर्तन का निर्णय दिया। इस घटना ने विश्व को यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता की चेतना ही करती है। जनशक्ति यदि शांतिपूर्ण और संगठित हो, तो वह इतिहास की दिशा बदल सकती है।
लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण दायित्व यह भी है कि विकास के साथ न्याय बना रहे। इसी प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाने का श्रेय नर्मदा बचाओ आंदोलन को जाता है। उन्नीस सौ अस्सी के दशक के मध्य से आरंभ हुए इस आंदोलन में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर तथा उनके सहयोगियों ने बड़े बाँधों से प्रभावित होने वाले परिवारों के पुनर्वास, आजीविका और सम्मानजनक जीवन के अधिकार का प्रश्न उठाया। आंदोलन में अनशन, धरना, पदयात्रा और न्यायिक प्रक्रिया—सभी संवैधानिक उपाय अपनाए गए।
भारत के उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न चरणों में इस विषय पर महत्वपूर्ण निर्णय दिए और पुनर्वास की प्रक्रिया को गंभीरता से लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया। यद्यपि विकास परियोजनाएँ आगे बढ़ीं, परंतु इस आंदोलन ने यह सुनिश्चित किया कि विकास केवल संरचनाओं का निर्माण नहीं, बल्कि मनुष्यों के जीवन की सुरक्षा और गरिमा से भी जुड़ा हुआ विषय है। इसने देश को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि प्रगति का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि मानवीय न्याय भी है।
भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित मणिपुर ने भी एक ऐसे सत्याग्रह को देखा जिसने पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया। पाँच नवम्बर दो हजार को इरोम चानू शर्मिला ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को हटाने की माँग करते हुए अनिश्चितकालीन उपवास आरंभ किया। उन्हें आत्महत्या के प्रयास से संबंधित प्रावधानों के अंतर्गत अनेक बार हिरासत में लिया गया और चिकित्सकीय निगरानी में कृत्रिम पोषण दिया जाता रहा। उनका संघर्ष लगभग सोलह वर्षों तक चला और नौ अगस्त दो हजार सोलह को उन्होंने अपना उपवास समाप्त किया।
यद्यपि उनके उपवास के दौरान संबंधित अधिनियम समाप्त नहीं हुआ, किंतु उनके संघर्ष ने सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा का विषय बना दिया। बाद के वर्षों में कुछ क्षेत्रों से इस अधिनियम को चरणबद्ध रूप से हटाने अथवा उसके दायरे में परिवर्तन करने जैसे निर्णय भी लिए गए, यद्यपि इन निर्णयों के पीछे अनेक प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी कारण भी रहे। इसलिए किसी एक आंदोलन को उसका एकमात्र कारण मानना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। फिर भी यह निर्विवाद सत्य है कि इरोम शर्मिला का सत्याग्रह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अहिंसक प्रतिरोध का सबसे लंबा और सबसे अनुकरणीय उदाहरण माना जाता है।
इन सभी घटनाओं का गंभीर अध्ययन हमें एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचाता है। अनशन की शक्ति शरीर की दुर्बलता में नहीं, बल्कि आत्मबल की दृढ़ता में निहित होती है। जिस आंदोलन का आधार सत्य, अनुशासन, अहिंसा और व्यापक जनहित होता है, वह समाज की चेतना को अवश्य प्रभावित करता है। उसकी सफलता केवल तत्कालीन सरकारी निर्णयों से नहीं मापी जाती, बल्कि उससे उत्पन्न सामाजिक जागरण, नैतिक विमर्श और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से भी आँकी जाती है।
इसी ऐतिहासिक यात्रा का अगला चरण भ्रष्टाचार के विरुद्ध हुए व्यापक जनआंदोलन, किसानों के शांतिपूर्ण संघर्ष, लद्दाख से उठी नई लोकतांत्रिक आवाज़ तथा भारतीय संविधान में निहित शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अधिकार के विश्लेषण के साथ अगले भाग में प्रस्तुत किया जाएगा।