Global warming पृथ्वी पर जीवन के लिए खतरा है बढ़ता वैश्विक तापमान
मानवीय गतिविधियों और अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन के कारण ग्लोबल वार्मिंग की समस्या लगातारगंभीर होती जा रही है, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है और मौसम का चक्र पूरी तरह सेअसंतुलित हो गया है।
Global warming की समस्या लगातारगंभीर होती जा रही है
मानवीय गतिविधियों और अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन के कारण ग्लोबल वार्मिंग की समस्या लगातारगंभीर होती जा रही है, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है और मौसम का चक्र पूरी तरह सेअसंतुलित हो गया है। इसके प्रभाव गंभीर प्राकृतिकआपदाओं और जलवायु संकट के रूप में सामने आरहे हैं। कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से वायुमंडल मेंग्रीनहाउस गैसों, विशेष रूप से कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का स्तर तेजी से बढ़ रहा है।जंगलों कोलगातार काटने से कार्बन को सोखने वाले प्राकृतिक साधनों में भारी कमी आई है। कारखानों और वाहनोंविशेष कर हवाई जहाज से निकलने वाला धुआं पर्यावरण को लगातार गर्म कर रहा है।पृथ्वी के तापमानमें हो रही वृद्धि से ग्लेशियर और ध्रुवीय बर्फ तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहाहै और तटीय क्षेत्रों पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है।
कभी सूखा तो कभी अत्यधिक बारिश की स्थितिबन रही है। इसके अलावा भीषण गर्मी (हीटवेव) का प्रकोप बढ़ता जा रहा हैलगातार गर्म होते समुद्रोंऔर बदलते मौसम से समुद्री जीवों का जीवन और कृषि उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैग्लोबल वार्मिंग आज विश्व की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। इससे न केवल मनुष्य, बल्कि धरती पररहने वाला प्रत्येक जीव यहां तक कि वनस्पति भी त्रस्त है। ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए दुनियाभरमें प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन समस्या कम होने के बजाय साल-दर-साल बढ़ती ही जा रही है। चूंकियह एक शुरुआत भर है, इसलिए अगर हम अभी से नहीं संभलें तो भविष्य और भी भयावह हो सकता
है।वैज्ञानिक अनुसंधान की रिपोर्ट बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग धरती के वातावरण के तापमान में लगातारहो रही बढ़ोतरी है। हमारी धरती प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणों से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणेंवायुमंडल से गुजरती हुईं धरती की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर पुन: लौटजाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैंइससे धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं।
यह आवरण लौटती किरणों केएक हिस्से को रोक लेता है और इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है।
गौरतलब हैकि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमानआवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भीसघन होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है और फिर यहीं सेग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव शुरू हो जाता है।ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार तो मनुष्य और उसकी गतिविधियां ही हैं। मानव यूं तोअपने आप को इस धरती का सबसे बुध्दिमान प्राणी समझते हैं लेकिन मनुष्य अनजाने में याजानबूझकर अपने ही जीवन को खत्म करने पर तुला हुआ है।
मनुष्य जनित मानव निर्मित इन गतिविधियों से कार्बन डायआक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन आक्साइड इत्यादि ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा मेंबढ़ोतरी हो रही है जिससे इन गैसों का आवरण सघन होता जा रहा है। यही आवरण सूर्य की परावर्तितकिरणों को रोक रहा है जिससे धरती के तापमान में वृध्दि हो रही है। वाहनों, हवाई जहाजों, बिजलीबनाने वाले संयंत्रों उद्योगों इत्यादि से अंधाधुंध होने वाले गैसीय उत्सर्जन की वजह से कार्बनडायआक्साइड में बढ़ोतरी हो रही है। जंगलों का बड़ी संख्या में हो रहा विनाश इसकी दूसरी वजह है।जंगल कार्बन डायआक्साइड की मात्रा को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं, लेकिन जंगलों की बेतहाशाकटाई से यह प्राकृतिक नियंत्रक भी हमारे हाथ से छूटता जा रहा है।इसकी एक अन्य वजह सीएफसी है जो रेफ्रीजरेटर्स, अग्निशामक दमकल यंत्रों इत्यादि में इस्तेमाल कीजाती है। यह धरती के ऊपर बने एक प्राकृतिक आवरण ओजोन परत को नष्ट करने का काम करती है।ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली घातक पराबैंगनी किरणों को धरती पर आने से रोकती है। वैज्ञानिकोंका कहना है कि इस ओजोन परत में एक बड़ा छिद्र हो चुका है जिससे पराबैंगनी किरणें सीधे धरती परपहुंच रही हैं और इस तरह से उसे लगातार गर्म बना रही हैं। यह बढ़ते तापमान का ही नतीजा है किधु्रवों पर सदियों से जमी बर्फ भी पिघलने लगी है।
विकसित या हो अविकसित देश, हर जगह बिजलीकी जरूरत बढ़ती जा रही है। बिजली के उत्पादन के लिए जीवाष्म ईंधन का इस्तेमाल बड़ी मात्रा मेंकरना पड़ता है। जीवाष्म ईंधन के जलने पर कार्बन डायआक्साइड पैदा होती है जो ग्रीनहाउस गैसों केप्रभाव को बढ़ा देती है। इसका नतीजा ग्लोबल वार्मिंग के रूप में सामने आता है।
पिछले दस सालों में धरती के औसत तापमान में 0.3 से 0.6 डिग्री सेल्शियस की बढ़ोतरी हुई है।आशंका यही जताई जा रही है कि आने वाले समय में ग्लोबल वार्मिंग में और बढ़ोतरी ही होगी।यूपी केबांदा में 19 मई को तापमान 48 सेल्सियस तक पहुंच गया वह दिन दूर नहीं जब देश भर में यहीतापमान जीवन को अस्तव्यस्त करेगा।ग्लोबल वार्मिंग को लेकर कई दशकों से वैज्ञानिक चिंता जाहिर कर रहे थे, लेकिन सरकार और आमजनता दोनों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जिस वजह से अब मौसम में भयानक बदलाव हो रहा है। इससाल मार्च से ही भीषण गर्मी शुरू हो गई थी। अब तो भारत के ही कई शहरों में पारा 50 डिग्री केआसपास है। इस बीच एक और चिंताजनक खबर सामने आई है।गुजरात में भी इन दिनों गर्मी का कहरजारी है। इंसान तो एसी, पंखे और कूलर का सहारा लेकर खुद को किसी तरह बचा ले रहे, लेकिनबेजुबानों के लिए ये गर्मी काल बन गई है। पिछले कुछ दिनों से पश्चिमी गुजरात में बड़ी संख्या में पक्षीआसमान से बेहोश होकर गिर रहे, इसके पीछे की वजह भीषण गर्मी है।
पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक अबतापमान इतना ज्यादा हो गया है कि पक्षी उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे।विशेषज्ञों का मानना है कि आज पक्षी बेहोश होकर गिर रहे हैं आने वाली विपदा का संकेत है यही दशामानव समुदाय की होने वाली है।
आज भी हजारों लोग लू और बढते तापमान को झेल नहीं पाते हैं औरहीट स्ट्रोक, ब्रैन हेमरेज आदि की चपेट में आकर असमय जान गंवा देते हैं।साल दर साल धरती का तापमान बढ़ेगा जिससे ग्लैशियरों पर जमा बर्फ पिघलने लगी है । ग्लैशियरोंकी बर्फ के पिघलने से समुद्रों में पानी की मात्रा बढ़ जाएगी जिससे साल-दर-साल उनकी सतह में भीबढ़ोतरी होती जाएगी। समुद्रों की सतह बढ़ने से प्राकृतिक तटों का कटाव शुरू हो जाएगा जिससे एक बड़ाहिस्सा डूब जाएगा। जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर मनुष्य पर ही पड़ेगा और कई लोगों कोअपनी जान से हाथ धोना पडेग़ा। गर्मी बढ़ने से मलेरिया, डेंगू और यलो फीवर जैसे संक्रामक रोग बढ़ेंगे।संभवत कोरोना भी इसी कड़ी का हिस्सा है। वह समय भी जल्दी ही आ सकता है जब हममें से अधिकाशंको पीने के लिए स्वच्छ जल, खाने के लिए ताजा भोजन और श्वास लेने के लिए शुध्द हवा भी नसीबनहीं हो।
ग्लोबल वार्मिंग का पशु-पक्षियों और वनस्पतियों पर भी गहरा असर पड़ेगा। माना जा रहा है कि गर्मीबढ़ने के साथ ही पशु-पक्षी और वनस्पतियां धीरे-धीरे उत्तरी और पहाड़ी इलाकों की ओर प्रस्थान करेंगे,लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ अपना अस्तित्व ही खो देंगे।
इसमें कोई शक नहीं है कि गर्मी बढ़ने से ठंड भगाने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली ऊर्जा कीखपत में कमी होगी, लेकिन इसकी पूर्ति एयर कंडिशनिंग में हो जाएगी। घरों को ठंडा करने के लिएभारी मात्रा में बिजली का इस्तेमाल करना होगा। बिजली का उपयोग बढ़ेगा तो उससे भी ग्लोबल वार्मिंगमें इजाफा ही होगा। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटा जा सकता है। बशर्ते इसके लिए हमें कईप्रयास करने होंगे। इसके तहत हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा।सोलर सिस्टम भीवातावरण को उष्मा दे रहे हैं अनुसंधान बता रहे हैं कि जिन शहरों में सोलर सिस्टम अधिक हैं वहां कातापमान तुलनात्मक एक से दो सेलशियस बढ़ जाता है।क्या यह जिम्मेदारी केवल सरकार की है? साधन सम्पन्न लोग तमाम तरह से मनमाना आचरण करते हैं
पानी का अपव्यय उर्जा का अपव्यय दूसरों के जीवन में असहजता लाता है लेकिन छोटे गाँव कस्बों मेंभी सबमर्सिबल पंप और हर कमरे में एसी लगाना स्टेटस सिंबल बन गया है। हम सभी भी पेट्रोल,डीजल और बिजली का उपयोग कम करके हानिकारक गैसों को कम कर सकते हैं।जंगलों की कटाई कोरोकना होगा। हम सभी अधिक से अधिक पेड़ लगाएं। इससे भी ग्लोबल वार्मिंग के असर को किया जासकता है। तकनीक का विकास कर हमें ऐसे रेफ्रीजरेटर्स बनाने होंगे जो सीएफसी का उपयोग न करें।अब भी नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी।
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