भारत की खूबसूरती उसकी विविधता में है। यहां मंदिर की घंटियां भी हैं, मस्जिदों की अजान भी; दीपावली भी है और ईद भी। सदियों से अलग-अलग आस्थाओं के लोग इस देश को अपनी साझा मातृभूमि मानकर साथ रहते आए हैं। इसलिए आज भारत को सबसे ज्यादा जरूरत किसी नई दीवार की नहीं, बल्कि आपसी विश्वास के नए पुलों की है।इसी संदर्भ में पत्रकार रुबिका लियाकत का नाम चर्चा के योग्य है। लगभग दो दशक के पत्रकारिता अनुभव के बाद वह अब Times Now Navbharat में Senior Executive Editor और Vice President–Special Projects की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रही हैं और News Ki Pathshala का नेतृत्व कर रही हैं।
रुबिका लियाकत की पहचान केवल एक मुस्लिम महिला पत्रकार के रूप में करना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। उनकी पहचान एक ऐसी पत्रकार के रूप में भी है जिसने हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता में लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति, चुनाव और सामाजिक मुद्दों पर अपनी आवाज रखी है।मुस्लिम होकर हिंदू समाज की बात करना विरोधाभास नहीं, भारत की खूबसूरती है
भारत में किसी मुस्लिम महिला का हिंदू समाज की भावनाओं, मंदिरों, सनातन संस्कृति या भारतीय परंपराओं के पक्ष में बात करना किसी तरह का विरोधाभास नहीं होना चाहिए।ठीक उसी तरह किसी हिंदू का मुस्लिम समाज के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा की बात करना भी हिंदू होने के विरुद्ध नहीं है। यही तो भारत है।
हमें ऐसे भारत की जरूरत है जहाँ कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान को छोड़े बिना दूसरे की आस्था का सम्मान कर सके।
आज जब समाज के दोनों समुदायों के बीच अविश्वास पैदा करने की कोशिशें होती हैं, तब मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। पत्रकारिता अगर समाज को केवल उत्तेजित करने के बजाय समझाने और जोड़ने का काम करे, तो उसकी भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
रुबिका लियाकत की नई भूमिका भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। News Ki Pathshala को चैनल ने ऐसे कार्यक्रम के रूप में पेश किया है जिसका उद्देश्य खबरों को केवल बताना नहीं, बल्कि उन्हें समझाना और संदर्भ के साथ सामने रखना है।
BMIहिंदू-मुस्लिम एकता भारत की जरूरत हैआज आवश्यकता इस बात की है कि हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे को वोट बैंक या राजनीतिक बहस का विषय मानने के बजाय भारत के सहयात्री मानें।
हिंदू अपने धर्म पर गर्व करे, मुस्लिम अपनी आस्था पर गर्व करे—लेकिन दोनों इस बात पर भी गर्व करें कि वे भारतीय हैं।आज आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी अमेरिका में अपने संबोधन में कहा कि जो व्यक्ति यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, वह हिंदू होने की भावना को नहीं समझता। यह बात इस समय की बहस में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की ताकत किसी एक समुदाय की संख्या में नहीं, बल्कि सभी भारतीयों की एकता में है।और यहीं रुबिका लियाकत जैसे सार्वजनिक चेहरे एक बड़ा सकारात्मक संदेश दे सकते हैं—मजहब पहचान हो सकता है, लेकिन राष्ट्र सबकी साझा पहचान है।
दुनिया पर प्रभाव डालना है तो पहले दिलों को जोड़ना होगा
भारत आज दुनिया की बड़ी शक्तियों में अपनी जगह बना रहा है। अर्थव्यवस्था, तकनीक, रक्षा, अंतरिक्ष और युवा शक्ति में देश तेजी से आगे बढ़ रहा है।लेकिन भारत की सबसे बड़ी शक्ति केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति नहीं है।भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका सामाजिक सामंजस्य है।अगर हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे पर विश्वास करने लगें, एक-दूसरे के त्योहारों का सम्मान करें और राष्ट्रहित के मुद्दों पर साथ खड़े हों, तो भारत की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।
दुनिया को भारत से यही संदेश मिलना चाहिए—
हमारी पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी मातृभूमि एक है।रुबिका लियाकत जैसी महिला पत्रकारों की भूमिका इसी संवाद को मजबूत करने में हो सकती है। उनकी मुस्लिम पहचान और भारतीय सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रिय भूमिका अपने आप में यह संदेश देती है कि भारतीयता किसी एक धर्म की बपौती नहीं है।भारत हिंदू का भी है, मुस्लिम का भी है, सिख का भी है, ईसाई का भी है—और सबसे ऊपर हर भारतीय का है।मजहब हमें पहचान देता है, लेकिन भारत हमें एक पहचान देता है।
यही वह विचार है जिसे मजबूत करने की जरूरत है।
हिंदू-मुस्लिम साथ आएंगे, विश्वास बढ़ेगा;
विश्वास बढ़ेगा तो भारत मजबूत होगा;
और मजबूत भारत ही दुनिया में अपना नेतृत्व स्थापित करेगा।
— वीरेश तिवारी
जनतंत्र एवं स्तंभकार