डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत
देश के चर्चित लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर एवं सामाजिक कार्यकर्ता
यौवन केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं, मनुष्य के भीतर प्रकृति द्वारा बजाया गया वह सबसे तीव्र संगीत है, जिसमें देह जागती है, आँखें सपने देखती हैं, मन अपनत्व खोजता है और हृदय किसी ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा करता है जिसके सामने वह स्वयं को बिना किसी आवरण के रख सके। इसी यौवन-द्वार पर तीन शक्तियाँ एक साथ दस्तक देती हैं—आकर्षण, कामना और प्रेम। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक सभ्यता ने इन तीनों की पहचान मिटाकर उन्हें एक ही नाम दे दिया—प्रेम।
आकर्षण आँख का धर्म है, कामना शरीर की जैविक पुकार और प्रेम हृदय का अनुशासन। आकर्षण किसी चेहरे पर ठहरता है, कामना किसी देह की ओर खींचती है, लेकिन प्रेम किसी मनुष्य के पूरे अस्तित्व को स्वीकार करने की कठिन साधना है।
आकर्षण कहता है—“तुम मुझे अच्छे लगते हो।”
प्रेम पूछता है—“क्या मैं तुम्हारे कठिन दिनों में भी तुम्हारे साथ रहूँगा?”
यही दोनों के बीच की वह महीन रेखा है जिसे आज का उपभोक्तावादी संसार लगातार मिटा रहा है।
कभी मनुष्य का प्रेम केवल निजी मामला नहीं था। अनेक पारंपरिक समाजों में युवा जीवन समुदाय, संस्कृति, श्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा रहता था। मध्य भारत की कुछ आदिवासी परंपराओं में वर्णित घोटूल जैसी संस्थाएँ इसी सामुदायिक युवा जीवन का एक उदाहरण हैं। इनके स्वरूप अलग-अलग समुदायों में अलग रहे हैं और इन्हें आधुनिक संबंधों का आदर्श प्रतिरूप मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। फिर भी एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या हमने समुदाय का आँगन तोड़ दिया और उसकी जगह बाजार का गलियारा बना दिया?
आज आकर्षण का सबसे बड़ा मंच डिजिटल संसार है। चेहरा प्रदर्शन है, व्यक्तित्व प्रोफ़ाइल है, जीवनशैली विज्ञापन है और स्वीकृति लाइक की संख्या में दिखाई देती है। हम मनुष्य को जानने से पहले उसकी तस्वीर जान लेते हैं, उसके विचार सुनने से पहले उसकी डिजिटल छवि पर मोहित हो जाते हैं। परिणाम यह कि वास्तविक मनुष्य और उसकी आभासी छवि के बीच का अंतर बढ़ता जाता है।
आकर्षण प्रकृति का अपराध नहीं। किसी की आँख, मुस्कान, आवाज़, बुद्धिमत्ता या व्यक्तित्व से प्रभावित होना मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। लेकिन आकर्षण की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह नवीनता से संचालित होता है। जो आज असाधारण लगता है, कल सामान्य लग सकता है।
प्रेम इसके विपरीत है।
प्रेम नवीनता समाप्त होने के बाद शुरू होता है।
जब रूप के पीछे स्वभाव दिखाई देने लगे, जब उत्साह के पीछे जिम्मेदारियाँ दिखाई देने लगें, जब मतभेद के बावजूद सम्मान बचा रहे और जब दूसरे की स्वतंत्रता हमारे अपने अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण लगने लगे—तब आकर्षण धीरे-धीरे प्रेम में परिवर्तित होने लगता है।
दैहिक कामना भी मनुष्य के अस्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा है। उसे अपराध या पाप कहकर दबाना स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं। भारतीय पुरुषार्थ-चिंतन ने काम को जीवन के चार पुरुषार्थों में स्थान दिया। लेकिन उसी परंपरा का दूसरा संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है—काम जीवन का एक आयाम है, सम्पूर्ण जीवन नहीं।
समस्या कामना में नहीं, कामना के अंधत्व में है।
जब इच्छा के सामने विवेक झुक जाता है, जब दूसरे व्यक्ति का व्यक्तित्व अदृश्य होकर केवल शरीर दिखाई देता है, जब संबंध आत्मीयता के बजाय उपभोग बन जाता है, तब प्रेम का स्थान धीरे-धीरे वासना घेरने लगती है।
वासना केवल शरीर की भूख नहीं; वह दूसरे मनुष्य को उसकी संपूर्णता से काटकर केवल अपनी इच्छा की वस्तु बना देने की मानसिकता भी है।
यहीं से शुरू होता है—वासना का महामार्ग।
यह मार्ग बहुत चमकदार है। इसके किनारे नवीनता के विज्ञापन लगे हैं—नया चेहरा, नया अनुभव, नया आकर्षण, नया संबंध। हर मोड़ पर बाजार कहता है—“अगली बार शायद अधिक सुख मिलेगा।”
लेकिन मनुष्य का मन बाजार की वस्तुओं जैसा नहीं है।
नवीनता उत्तेजना दे सकती है, पर स्थायी संतोष नहीं। शरीर को अनुभव मिल सकता है, लेकिन मन को अर्थ चाहिए। स्पर्श मिल सकता है, लेकिन आत्मीयता के लिए विश्वास चाहिए। साथ मिल सकता है, लेकिन टिकने के लिए प्रतिबद्धता चाहिए।इसीलिए कभी-कभी मनुष्य भीड़ के बीच सबसे अधिक अकेला होता है।
आज हजारों संपर्क संभव हैं, लेकिन ऐसा व्यक्ति मिलना कठिन हो सकता है जिसके सामने हम अपनी असफलता, भय, कमजोरी और आँसू बिना अभिनय के रख सकें। डिजिटल संसार ने संपर्क को सरल बनाया है, पर आत्मीयता स्वतः पैदा नहीं की।
यहाँ एक और भ्रम जन्म लेता है—विकल्पों की अधिकता को स्वतंत्रता समझ लेना।
स्वतंत्रता का अर्थ है कि मनुष्य अपने निर्णय को समझकर चुने और उसके परिणाम की जिम्मेदारी स्वीकार करे। स्वच्छंदता केवल यह कह सकती है कि मुझे परिणाम की चिंता नहीं। पर हर चुनाव के बाद अगला चुनाव आवश्यक हो जाए और कोई संबंध भीतर स्थिरता न दे पाए, तो विकल्प स्वतंत्रता नहीं, बेचैनी भी बन सकते हैं।
बाजार इस बेचैनी को समझता है।
वह मनुष्य को कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होने देता, क्योंकि असंतोष उपभोग को जन्म देता है। नया वस्त्र, नया सौंदर्य-मानक, नया अनुभव, नया मनोरंजन, नया डिजिटल मंच—सब मिलकर एक ऐसी मानसिक अर्थव्यवस्था बना सकते हैं जिसमें व्यक्ति लगातार अपने आपको और दूसरों को बदलता रहता है।
लेकिन प्रेम का स्वभाव बाजार के विपरीत है।
बाजार कहता है—नया खोजो।
प्रेम कहता है—जिसे चुना है, उसे समझो।
बाजार कहता है—बेहतर विकल्प तलाशो।
प्रेम कहता है—अपने विकल्प को बेहतर बनाने का प्रयास करो।
बाजार आकर्षण बेचता है।
प्रेम धैर्य माँगता है।
बाजार क्षण बेचता है।
प्रेम समय माँगता है।
यही कारण है कि प्रेम आसान दिखाई देता है, लेकिन निभाना कठिन होता है।
प्रेम केवल चुंबन, स्पर्श या साथ बैठने का नाम नहीं। प्रेम उस दिन दिखाई देता है जब सामने वाला बीमार हो; जब आर्थिक कठिनाई हो; जब विचार अलग हों; जब आकर्षण की चमक सामान्य जीवन की धूप में फीकी पड़ जाए; जब समझौते की आवश्यकता हो और फिर भी सम्मान बचा रहे।
युवा पीढ़ी को प्रेम से डराने की आवश्यकता नहीं है। उसे यह भी नहीं सिखाना चाहिए कि हर दैहिक इच्छा गलत है। आवश्यकता है वैज्ञानिक यौन-शिक्षा, सहमति की समझ, भावनात्मक परिपक्वता, आत्मसम्मान और संबंधों की जिम्मेदारी की।
मानसिक स्वास्थ्य को भी इस विषय में सनसनी से नहीं, संवेदनशीलता से समझना होगा। चिंता, अवसाद, अकेलापन या नींद की समस्याओं का कारण केवल आधुनिक प्रेम या यौन व्यवहार नहीं होते; इनके पीछे अनेक व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और जैविक कारण हो सकते हैं। फिर भी स्वस्थ आत्मीय संबंध, सामाजिक समर्थन और संवाद मनुष्य के भावनात्मक जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं।भारतीय परंपरा का वास्तविक संदेश भी दमन नहीं, संतुलन है। इच्छा को समझो, इंद्रियों को पहचानो, संबंधों में मर्यादा रखो और जीवन को केवल शरीर की सीमा में मत बाँधो।
आज आवश्यकता अतीत में लौटने की नहीं, बल्कि उसके मानवीय तत्वों को आधुनिक विवेक के साथ पुनर्जीवित करने की है।
समुदाय हो—लेकिन स्वतंत्रता के साथ।
मर्यादा हो—लेकिन दमन के बिना।
कामना हो—लेकिन सहमति और जिम्मेदारी के साथ।
प्रेम हो—लेकिन स्वामित्व के बिना।
यौवन को वासना से भयभीत मत कीजिए; उसे विवेक दीजिए।
आकर्षण को अपराध मत बनाइए।
कामना को पाप मत कहिए।
लेकिन आकर्षण और कामना को प्रेम का पर्याय भी मत बनाइए।
क्योंकि—
आकर्षण आँखों को बाँधता है,
कामना शरीर को खींचती है,
लेकिन प्रेम मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है।
प्रेम में देह हो सकती है, पर प्रेम केवल देह नहीं।
प्रेम में आकर्षण हो सकता है, पर प्रेम केवल आकर्षण नहीं।
प्रेम में कामना हो सकती है, पर प्रेम कामना से कहीं बड़ा है।
प्रेम तब जन्म लेता है जब “मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ” बदलकर “मैं तुम्हें समझना चाहता हूँ” हो जाता है; जब अधिकार की जगह सम्मान आता है; जब अपेक्षा की जगह सहभागिता आती है; जब सुख के क्षणों के साथ कठिन समय की जिम्मेदारी भी स्वीकार की जाती है।
आज का युवा प्रेम से वंचित नहीं है। वह प्रेम के अर्थ से भ्रमित है।उसे हजार चेहरे दिखाई देते हैं, पर एक आत्मीय चेहरा दुर्लभ है। उसे हजारों प्रतिक्रियाएँ मिलती हैं, पर वास्तविक समझ कम मिलती है। उसे विकल्प अनगिनत मिलते हैं, पर ठहरने का साहस कम मिलता है।इसलिए प्रेम को बचाने का रास्ता देह का निषेध नहीं, देह से आगे मनुष्य को देखने की दृष्टि है।जब तक प्रेम में संवाद, श्रम, समय, विश्वास और समुदाय वापस नहीं आएँगे, तब तक मनुष्य आकर्षण की चमक और अकेलेपन की अँधेरी सुरंग के बीच झूलता रहेगा।
एक स्वाइप से दूसरे स्वाइप तक।
एक आकर्षण से दूसरे आकर्षण तक।
एक अनुभव से दूसरे अनुभव तक।
और अंततः स्वयं से वही प्रश्न पूछता रहेगा—
“इतने लोगों के करीब होकर भी मैं इतना अकेला क्यों हूँ?”
शायद उत्तर बहुत सरल है—
क्योंकि शरीरों की दूरी कम करना आसान है,
पर दो मनुष्यों के बीच की दूरी मिटाने में समय लगता है।
और प्रेम—
समय माँगता है।