आज का मुददा बुलंदशहर (त्रिलोक चन्द) : वर्ल्ड स्ट्रोक के प्रति जागरूकता बढ़ाना जरूरी है, क्योंकि यह एक ऐसी मेडिकल इमरजेंसी है, जो पल भर में किसी की जिंदगी बदल सकती है। कई बार परिवारों को अचानक समझ नहीं आता कि मरीज के साथ क्या हो रहा है। स्ट्रोक के दौरान दिमाग तक खून की सप्लाई अचानक रुक जाती है या दिमाग की कोई नस फट जाती है, जिससे दिमाग को नुकसान पहुंचता है। हालांकि, सभी स्ट्रोक एक जैसे नहीं होते। स्ट्रोक मुख्य रूप से दो तरह से होता है, क्लॉट बनने से नस में रुकावट और नस फटने से ब्लीडिंग।
मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के न्यूरोलॉजी विभाग के सीनियर डायरेक्टर, डॉ. अमित श्रीवास्तव ने बताया, न्यूरोलॉजिस्ट के तौर पर अपने कई वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि स्ट्रोक होने पर परिवारों को अक्सर समझ नहीं आता कि मरीज के साथ क्या हो रहा है। स्ट्रोक को आसान भाषा में ब्रेन अटैक कहा जा सकता है। करीब 80 प्रतिशत स्ट्रोक तब होते हैं, जब दिमाग तक खून पहुंचाने वाली नस में क्लॉट बनने से उसका बहाव रुक जाता है। वहीं, कुछ मामलों में दिमाग की नस फट जाती है और ब्लीडिंग होने लगती है।

क्लॉट के कारण होने वाले स्ट्रोक में नस के अंदर रुकावट आ जाती है, जबकि दूसरे प्रकार के स्ट्रोक में दिमाग की नस फट जाती है और खून आसपास के टिश्यू में फैलने लगता है। इससे खोपड़ी के अंदर दबाव बढ़ता है और दिमाग की स्वस्थ सेल्स को नुकसान पहुंच सकता है।
क्लॉट और ब्लीड के कारण भले ही अलग हों, लेकिन इनके लक्षण अक्सर एक जैसे दिखाई देते हैं। इसलिए स्ट्रोक किस तरह का है, यह पहचानने की कोशिश करने के बजाय इसके शुरुआती लक्षणों को पहचानना जरूरी है। इसके लिए BEFAST को याद रखा जा सकता है। इसमें B यानी बैलेंस, अचानक शरीर का संतुलन बिगड़ना, E यानी आइज़, अचानक देखने में परेशानी होना या चीजें दो-दो दिखाई देना, F यानी फेस, चेहरे का एक तरफ झुक जाना, A यानी आर्म्स, हाथ या पैर में अचानक कमजोरी या सुन्नपन, S यानी स्पीच, बोलने में परेशानी होना, जैसे लड़खड़ाकर बोलना या भ्रम की स्थिति होना, और T यानी टाइम, यानी इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर समय बर्बाद किए बिना मरीज को तुरंत अस्पताल की इमरजेंसी में ले जाना।
स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानने और इससे बचाव के उपायों के बारे में जागरूक होना जरूरी है। समय रहते लक्षणों को पहचानकर तुरंत मेडिकल मदद लेने और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से स्ट्रोक के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है।