विरेश तिवारी — जनतंत्र एवं स्तंभकार
भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की सफलता केवल चुनावी जीत से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी आंकी जाती है कि वे समाज के विभिन्न वर्गों के साथ कितना मजबूत और स्थायी संबंध स्थापित कर पाए हैं। नेतृत्व किसी भी संगठन को दिशा देता है, लेकिन उस दिशा को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य संगठन और उसके कार्यकर्ता करते हैं। यही कारण है कि किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक शक्ति उसके जमीनी कार्यकर्ताओं और समाज के साथ उसके जीवंत संवाद में निहित होती है।
भारतीय जनता पार्टी आज देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारत ने अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है, आधारभूत ढांचे का विस्तार हुआ है, डिजिटल क्रांति ने आम नागरिक के जीवन को प्रभावित किया है और देश आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा है। इन उपलब्धियों ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्थापित किया है।
इसके बावजूद राजनीति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि कोई भी संगठन केवल शीर्ष नेतृत्व की लोकप्रियता के आधार पर लंबे समय तक अपनी ताकत बनाए नहीं रख सकता। नेतृत्व प्रेरणा देता है, लेकिन उस प्रेरणा को जनसमर्थन में बदलने का कार्य कार्यकर्ता करते हैं। इसलिए आने वाले समय में भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों के लिए संगठनात्मक मजबूती सबसे महत्वपूर्ण विषय होगा।
वर्ष 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं माना जाएगा। उत्तर प्रदेश देश की राजनीति का केंद्र है और यहां के चुनावी परिणाम राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और दशा को प्रभावित करते हैं। ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से अधिक अपने संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत बनाना है।
पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक कार्यशैली में बड़ा बदलाव आया है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने राजनीतिक संवाद को नई गति दी है। इससे जनता तक पहुंच आसान हुई है, लेकिन इसके साथ एक चुनौती भी सामने आई है। कई बार वास्तविक जनसेवा की अपेक्षा प्रचार अधिक दिखाई देने लगता है। लोकतंत्र में जनता केवल नारों और तस्वीरों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि वह यह देखती है कि संकट और आवश्यकता के समय कौन उसके साथ खड़ा है। इसलिए सेवा आधारित राजनीति की परंपरा को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
किसी भी संगठन की सबसे बड़ी पूंजी उसका कार्यकर्ता होता है। बूथ स्तर पर काम करने वाला कार्यकर्ता ही संगठन और जनता के बीच सेतु का कार्य करता है। यदि कार्यकर्ता सम्मानित महसूस करता है तो वह पूरी निष्ठा और ऊर्जा के साथ संगठन के लिए कार्य करता है। लेकिन यदि कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे तो संगठन की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। इसलिए राजनीतिक दलों को समय-समय पर अपने कार्यकर्ताओं के योगदान का सम्मान करना चाहिए और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान देना चाहिए।
भारत विविधताओं का देश है। यहां हजारों जातियां, उपजातियां, सामाजिक समूह और पारंपरिक समुदाय निवास करते हैं। इनमें से अनेक ऐसे वर्ग हैं जिनकी जनसंख्या भले कम हो, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से उनका महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजनीति में अक्सर बड़े वोट बैंक की चर्चा होती है, जबकि छोटे सामाजिक समूहों की समस्याएं और अपेक्षाएं पीछे छूट जाती हैं। यदि लोकतंत्र को वास्तव में मजबूत बनाना है तो प्रत्येक वर्ग को सम्मान और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यही समावेशी राजनीति का आधार है।
भाजपा ने अपने विस्तार के दौरान समाज के अनेक वर्गों को साथ जोड़ने का प्रयास किया है, लेकिन भविष्य की राजनीति में यह कार्य और अधिक व्यापक रूप से करना होगा। छोटे समुदायों, पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े लोगों, श्रमिकों, रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं, युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करना आवश्यक होगा। समाज के इन वर्गों की समस्याओं को समझकर उनके समाधान की दिशा में कार्य करना राजनीतिक विश्वास को मजबूत करेगा।
दक्षिण भारत भी भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भाजपा ने वहां अपनी उपस्थिति बढ़ाई है, लेकिन अभी भी विकास और विस्तार की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। दक्षिण भारत की भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं का सम्मान करते हुए वहां स्थायी संगठनात्मक ढांचा विकसित करना समय की आवश्यकता है। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक तथा संगठनात्मक संवाद बढ़ाकर राष्ट्रीय एकात्मता को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।
आज के राजनीतिक परिवेश में युवाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत विश्व का सबसे युवा देशों में से एक है। रोजगार, शिक्षा, तकनीक, स्टार्टअप, कौशल विकास और नवाचार जैसे विषय युवाओं की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। राजनीतिक दलों को केवल चुनावी समय में नहीं, बल्कि निरंतर युवाओं के साथ संवाद बनाए रखना होगा। इसी प्रकार महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भी लोकतंत्र को नई दिशा दे रही है। किसी भी संगठन की मजबूती महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं है।
राजनीति में सफलता का वास्तविक आधार विश्वास होता है। चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता का विश्वास बनाए रखना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। यह विश्वास केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और जनता के साथ निरंतर संवाद से बनता है। जो संगठन समाज के सुख-दुख में सहभागी बनता है, वही लंबे समय तक जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखता है।
आने वाले वर्षों में भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में स्थायी सफलता का मार्ग संगठन, कार्यकर्ता और समाज के बीच मजबूत संबंधों से होकर गुजरता है। नेतृत्व की लोकप्रियता महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे जमीनी स्तर की सक्रियता और सामाजिक विश्वास का समर्थन भी मिलना चाहिए। यदि कार्यकर्ता सम्मानित होगा, समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलेगा और सेवा आधारित राजनीति को प्राथमिकता दी जाएगी, तो संगठन की शक्ति और अधिक बढ़ेगी।
अंततः राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास, सम्मान और अवसर पहुंचाना होना चाहिए। जो राजनीतिक दल इस मूल भावना को समझेगा और उसे व्यवहार में उतारेगा, वही भविष्य की राजनीति में दीर्घकालिक सफलता प्राप्त कर सकेगा। 2027 की तैयारी केवल चुनावी रणनीति का प्रश्न नहीं है, बल्कि संगठन, समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों को और अधिक मजबूत बनाने का अवसर भी है।