लेखक: डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक | देश के चर्चित लेखक, प्रेरक वक्ता, प्रशिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता
समन्वयक — आदर्श संस्कार शाला, भारत
राष्ट्रभक्ति मेरे लिए सबसे पहले कोई नारा नहीं, नैतिक उत्तरदायित्व है। अंतिम पंक्ति में खड़ा परिवार जानता है कि भूख, अभाव, बेरोजगारी और अपमान की पहली दस्तक उसके ही दरवाजे पर पड़ती है। इसलिए मेरे लिए देश से प्रेम का अर्थ केवल ऊँचे शब्द बोलना या वर्ष में दो दिन तिरंगा फहराना नहीं है। देश से प्रेम का अर्थ है—सत्य के साथ खड़ा होना, परिश्रम को पूजा मानना, दूसरे के अधिकार की रक्षा करना और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना।
जब मैं सड़क पर कूड़ा नहीं फेंकता, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुँचाता, कतार में धैर्य से खड़ा रहता हूँ, झूठी गवाही देने से इनकार करता हूँ और किसी कमजोर का अधिकार नहीं छीनता, तब मैं राष्ट्र की आत्मा को स्वच्छ करता हूँ। क्योंकि राष्ट्र केवल संसद, सेना, सीमाओं और शासन का नाम नहीं; राष्ट्र उन करोड़ों नागरिकों के चरित्र का सामूहिक प्रतिबिंब है। नैतिकता वह नींव है जिस पर राष्ट्र की समूची इमारत खड़ी होती है।
मेरे लिए आर्थिक राष्ट्रभक्ति का अर्थ अपने श्रम को देश की समृद्धि से जोड़ना है। मेरे घर तक कभी सरकारी योजना का अनाज पहुँचता है, कभी श्रम के बदले मजदूरी मिलती है, कभी छात्रवृत्ति से पुस्तकें आती हैं। इसलिए मैं समझता हूँ कि राजकोष का प्रत्येक रुपया किसी न किसी भारतीय के श्रम और अधिकार से जुड़ा है। सार्वजनिक धन की चोरी केवल सरकार की हानि नहीं, किसी गरीब की थाली से निवाला छीनना है।
इसलिए समय पर कर देना, रिश्वत से इनकार करना, अपव्यय रोकना, स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देना, कौशल सीखना और श्रम का सम्मान करना भी राष्ट्रभक्ति है। जब मैं अपने गाँव के कुम्हार का मिट्टी का दीपक खरीदता हूँ, बुनकर का कपड़ा पहनता हूँ या स्थानीय कारीगर की वस्तु को प्राथमिकता देता हूँ, तब अर्थव्यवस्था की एक छोटी-सी धारा अपने ही समाज के घर तक पहुँचती है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नीति नहीं, नागरिक चरित्र भी है।
सामाजिक राष्ट्रभक्ति का अर्थ भेद घटाना और बंधुत्व बढ़ाना है। मेरे मोहल्ले में अलग जाति, अलग भाषा, अलग परंपरा और अलग पूजा-पद्धति वाले लोग रहते हैं। अभाव ने हमें यह सिखाया है कि संकट के समय पहचान नहीं, इंसान काम आता है। किसी के घर बीमारी हो तो दवा पहुँचना, किसी की बेटी पढ़ना चाहती हो तो पुरानी पुस्तकें देना, किसी की बारात में पानी पिलाना या किसी भूखे के साथ भोजन बाँटना—ये छोटे काम दिखाई देते हैं, पर इन्हीं से समाज की बड़ी आत्मीयता बनती है।
जब हम दूसरे को नीचा दिखाने के बजाय उसका हाथ थामते हैं, तब राष्ट्र भीतर से मजबूत होता है। जिस समाज में मनुष्य मनुष्य से जुड़ा हो, उसे कोई विभाजन लंबे समय तक कमजोर नहीं कर सकता।मनोवैज्ञानिक स्तर पर राष्ट्रभक्ति आत्मसम्मान, आशा और संघर्षशीलता का नाम है। अंतिम जन का युवा अक्सर सुनता है—“तुम कुछ नहीं कर सकते।” राष्ट्रभक्ति उसके भीतर से उठने वाली वह आवाज है जो कहती है—“तुम भी इस देश के निर्माता हो।”
तिरंगे को देखकर सीना चौड़ा होना स्वाभाविक है, लेकिन राष्ट्रभक्ति की असली परीक्षा तब होती है जब असफलता के बाद भी हम उठ खड़े होते हैं। मानसिक थकान, हीनभावना और निराशा से लड़कर अपने जीवन को बेहतर बनाना भी राष्ट्रसेवा है। जो युवा स्वयं को संभालता है, वह परिवार को संभालता है; जो परिवार को संभालता है, वह समाज को मजबूत करता है; और मजबूत समाज ही मजबूत राष्ट्र बनाता है।
लौकिक जीवन में राष्ट्रभक्ति बड़े अवसरों की प्रतीक्षा नहीं करती। वह रोजमर्रा के छोटे-छोटे कर्मों में दिखाई देती है। समय पर विद्यालय पहुँचना, बुजुर्ग को सार्वजनिक वाहन में स्थान देना, जल और विद्युत बचाना, पौधा लगाना, सड़क पर कूड़ा न फेंकना, सार्वजनिक चिकित्सालय और विद्यालय की संपत्ति को अपना समझना—ये सब राष्ट्रनिर्माण के मौन अध्याय हैं।
राष्ट्रभक्ति भाषण नहीं, निरंतर अनुशासन मांगती है।
परालौकिक बोध में राष्ट्रभक्ति अपनी भूमि के प्रति गहरे उत्तरदायित्व की अनुभूति है। यह धरती केवल मिट्टी नहीं; यह पूर्वजों की स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों की आशाओं की धरोहर है। हमारे गाँव के बुजुर्ग नदी, वृक्ष, खेत और पर्वत को केवल संसाधन नहीं मानते; उनमें जीवन का अंश देखते हैं। इसलिए प्रकृति की रक्षा भी राष्ट्रभक्ति है। आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, उपजाऊ भूमि, सुरक्षित वन और सांस लेने योग्य हवा देना हमारे वर्तमान का ऋण है।
कूटनीतिक दृष्टि से राष्ट्रभक्ति का अर्थ है—विश्व के सामने भारत की प्रतिष्ठा को ज्ञान, चरित्र, क्षमता और शांति से ऊँचा उठाना। हमारा युवा सेना में जाता है, वैज्ञानिक बनता है, खिलाड़ी बनकर तिरंगा ऊँचा करता है, चिकित्सक बनकर जीवन बचाता है, श्रमिक बनकर निर्माण करता है। ये सभी राष्ट्र के वास्तविक राजदूत हैं।
अफवाहों से बचना, विदेश में देश का सम्मान बढ़ाना, अंतरराष्ट्रीय विषयों को समझना और राष्ट्रीय हितों के प्रति सजग रहना भी आधुनिक राष्ट्रभक्ति का हिस्सा है। दृढ़ता और विनम्रता—दोनों साथ हों, तभी राष्ट्र का सम्मान स्थायी बनता है।
शिक्षा राष्ट्रभक्ति को दिशा देती है। मेरे पास महँगी शिक्षा के साधन भले न हों, लेकिन सीखने की भूख है। पुस्तकालय हो, विद्यालय हो, मुक्त ज्ञान-संसाधन हों या किसी शिक्षक का मार्गदर्शन—हर अवसर को ग्रहण करना राष्ट्रसेवा है। और जब मैं कुछ सीखकर किसी छोटे बच्चे को पढ़ाता हूँ, तब ज्ञान की एक किरण दूसरे जीवन तक पहुँचती है।
एक शिक्षित युवा केवल अपना भविष्य नहीं बदलता; वह अपने परिवार की पीढ़ियों का भविष्य बदल सकता है। इसलिए ज्ञान अर्जित करना और ज्ञान बाँटना—दोनों राष्ट्रभक्ति हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण राष्ट्रभक्ति की रीढ़ है। अंधविश्वास समय, श्रम और संसाधनों को नष्ट कर सकता है। इसलिए प्रश्न पूछना, प्रमाण देखना, प्रयोग करना और तर्क के आधार पर निर्णय लेना आवश्यक है। किसान मिट्टी की जाँच करके खाद का उपयोग करे, वर्षाजल का संचय करे, नई तकनीक अपनाए; नागरिक स्वास्थ्य संबंधी भ्रमों से बचे; युवा नवाचार करे—यही वैज्ञानिक राष्ट्रनिर्माण है।
राष्ट्रभक्ति का सबसे जीवंत रूप धरातलीय सेवा है। बाढ़ में सहायता के लिए पहुँचना, गर्मी में प्याऊ लगाना, सर्दी में जरूरतमंद को वस्त्र देना, टूटी नाली की शिकायत करना, मोहल्ले की सफाई में हाथ बँटाना—ये छोटे काम किसी बड़े मंच की प्रतीक्षा नहीं करते। विकास की वास्तविक कसौटी यही है कि समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति कितना सुरक्षित, सम्मानित और सुविधापूर्ण जीवन जी पा रहा है।
राजनीतिक चेतना राष्ट्रभक्ति को विवेक देती है। राष्ट्रभक्ति किसी दल की अंधभक्ति नहीं हो सकती। लोकतंत्र में नागरिक का दायित्व है कि वह संविधान समझे, मतदान करे, प्रत्याशी के चरित्र और कार्य को देखे तथा आवश्यकता पड़ने पर सत्ता से प्रश्न पूछे।
नारे से पहले नीति को पढ़ना और चेहरे से पहले चरित्र को देखना—यही लोकतांत्रिक राष्ट्रभक्ति है।
संवैधानिक दायित्व राष्ट्रभक्ति की कानूनी आधारशिला है। समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व मेरे जैसे अंतिम जन के लिए केवल संवैधानिक शब्द नहीं, सम्मानपूर्ण जीवन की आशा हैं। इसलिए कानून का सम्मान करना, मौलिक कर्तव्यों का पालन करना, दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना और अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण तथा संवैधानिक आवाज उठाना राष्ट्रभक्ति है।
संवेदनशीलता राष्ट्रभक्ति का हृदय है। युद्ध में शहीद सैनिक का परिवार हो, कर्ज से दबा किसान हो, महानगरों में संघर्ष करता प्रवासी श्रमिक हो, सड़क किनारे सोता बच्चा हो या अकेला वृद्ध—उनके दुख को केवल समाचार मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं। राष्ट्र की शक्ति उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, अपने सबसे कमजोर नागरिक के आँसू पोंछने की क्षमता से मापी जानी चाहिए।
वैश्विक दृष्टि से राष्ट्रभक्ति संकीर्णता नहीं, योगदान है। जलवायु परिवर्तन, महामारी, गरीबी और प्राकृतिक आपदाएँ सीमाओं में बँधी नहीं रहतीं। इसलिए अपनी संस्कृति पर गर्व करते हुए विश्व से सीखना और विश्व को कुछ देना भी राष्ट्रभक्ति है। भारत ज्ञान, चिकित्सा, विज्ञान, योग, दर्शन, करुणा और शांति की अपनी परंपरा से विश्व के लिए योगदान दे सकता है।
भौगोलिक राष्ट्रभक्ति हमें अपनी धरती से जोड़ती है। हिमालय से समुद्र तक, मरुस्थल से पूर्वोत्तर के वनों तक, खेतों से महानगरों तक—भारत का प्रत्येक भूभाग हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। नदी को नाला बनने से रोकना, पर्वत को कचरे से बचाना, जंगलों और जैव विविधता की रक्षा करना, खेतों की उर्वरता बनाए रखना और नगरों को सांस लेने योग्य बनाना भी राष्ट्रभक्ति है।
आध्यात्मिक आयाम में राष्ट्रभक्ति अहंकार नहीं, समर्पण है। यह भावना कि मेरा देश मुझसे बड़ा है और मैं उसके लिए अपने हिस्से का दीपक जला सकता हूँ। प्रार्थना, ध्यान और निस्वार्थ कर्म तभी सार्थक हैं जब उनका प्रकाश व्यवहार में दिखाई दे। यदि मंदिर में सिर झुकाने वाला हाथ बाहर किसी भूखे को भोजन नहीं दे सकता, तो उसकी भक्ति अधूरी है।
अंतिम जन का युवा इसी सत्य को सबसे गहराई से समझता है—राष्ट्र की सेवा ही सच्ची पूजा है।
अंततः राष्ट्रभक्ति किसी एक दिन का उत्सव नहीं, प्रतिदिन का अभ्यास है। यह केवल सीमा पर खड़े सैनिक की वीरता में नहीं, खेत में झुकते किसान की मेहनत में भी है; प्रयोगशाला में जागते वैज्ञानिक में भी है; विद्यालय में पढ़ाते शिक्षक में भी है; सड़क साफ करते श्रमिक में भी है; ईमानदारी से काम करते कर्मचारी में भी है और अपने छोटे से घर में बच्चों को अच्छे संस्कार देते माता-पिता में भी है।
राष्ट्रभक्ति महलों से नहीं, झोपड़ियों से भी जन्म लेती है।
जब अंतिम पंक्ति का युवा पढ़ता है, श्रम करता है, ईमानदारी से कमाता है, कानून का सम्मान करता है, कर देता है, प्रकृति बचाता है, विज्ञान को अपनाता है, संविधान को समझता है, मतदान करता है और अपने पड़ोसी के सुख-दुःख में खड़ा होता है—तब राष्ट्र भीतर से शक्तिशाली बनता है।
क्योंकि राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं कि हम देश के बारे में कितना बोलते हैं; बल्कि यह है कि हम देश के लिए प्रतिदिन कितना अच्छा करते हैं।
राष्ट्रभक्ति तिरंगे को सलाम करने से आगे की यात्रा है—
यह उस अंतिम व्यक्ति के जीवन में सम्मान, अवसर, न्याय और आशा पहुँचाने का संकल्प है।
और जिस दिन भारत का प्रत्येक नागरिक अपने छोटे-से कर्तव्य को इतनी निष्ठा से निभाने लगेगा कि उससे किसी दूसरे भारतीय का जीवन थोड़ा बेहतर हो जाए, उस दिन राष्ट्रभक्ति नारा नहीं रहेगी—राष्ट्र के चरित्र की पहचान बन जाएगी।