विरेश तिवारी
जनतंत्र एवं स्तंभकार
भारत आज विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। आधुनिक एक्सप्रेस-वे, मेट्रो रेल, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और औद्योगिक विकास हमारी उपलब्धियों की गवाही देते हैं। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच एक ऐसा भारत भी है जो अब भी भूख, गरीबी, अशिक्षा और उपेक्षा से जूझ रहा है। यह वह भारत है जो चमकते शहरों और सरकारी आँकड़ों के पीछे कहीं छिप गया है।आज भी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, हरदोई तथा अनेक पिछड़े क्षेत्रों के साथ-साथ देश के कई जिलों में ऐसे गाँव और बस्तियाँ हैं जहाँ लोगों को दो समय का भरपेट भोजन नहीं मिल पाता। अनेक परिवार ऐसे हैं जिनके राशन कार्ड नहीं बने हैं या किसी कारणवश वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। दूसरी ओर महानगरों और औद्योगिक नगरों—जैसे नोएडा, ग्रेटर नोएडा और अन्य शहरों—में भी ऐसी झुग्गियाँ और बस्तियाँ हैं जहाँ हजारों लोग विकास की मुख्यधारा से दूर जीवन जी रहे हैं।
सबसे अधिक पीड़ादायक स्थिति उन बच्चों की है जिन्हें उनके माता-पिता किसी कारणवश छोड़ चुके हैं। कई बच्चों की परवरिश मामा, मौसी, दादा-दादी या अन्य रिश्तेदारों के भरोसे हो रही है। दुर्भाग्य से इनमें से अनेक बच्चे स्नेह और सुरक्षा के बजाय उपेक्षा, शोषण और अभाव का सामना करते हैं। कुछ बच्चे स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, कुछ बाल श्रम में धकेल दिए जाते हैं और कुछ का बचपन हमेशा के लिए छिन जाता है।आज भी ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाते हैं जहाँ कम उम्र के बच्चे बेहद कम पारिश्रमिक पर काम करते हैं। यह केवल आर्थिक मजबूरी का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उनके बचपन, शिक्षा और भविष्य से जुड़ा गंभीर सामाजिक प्रश्न है। यदि कोई बच्चा स्कूल की जगह श्रम करने को विवश है, तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
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गरीबी केवल आय का अभाव नहीं है। गरीबी का अर्थ है—भूख, कुपोषण, अशिक्षा, असुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी, सम्मानजनक जीवन का अभाव और अवसरों की कमी। जब कोई बच्चा उचित भोजन, शिक्षा और सुरक्षा से वंचित रह जाता है, तो देश अपनी सबसे बड़ी पूँजी खो देता है।सरकार ने अनेक जनकल्याणकारी योजनाएँ शुरू की हैं। निःशुल्क राशन, आयुष्मान भारत, आंगनवाड़ी सेवाएँ, छात्रवृत्तियाँ, पोषण अभियान और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ लाखों लोगों तक पहुँची हैं। लेकिन अभी भी ऐसे परिवार हैं जो इन योजनाओं से बाहर हैं। इसलिए आवश्यकता योजनाओं की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक उनकी प्रभावी पहुँच सुनिश्चित करने की है।अब समय आ गया है कि प्रत्येक जिले में विशेष सर्वेक्षण अभियान चलाया जाए। हर गाँव, हर वार्ड और हर बस्ती में ऐसे परिवारों की पहचान की जाए जो भूख, कुपोषण, बेघरपन, बेसहारा बच्चों या सामाजिक उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। यह कार्य केवल कागज़ी औपचारिकता न होकर समयबद्ध कार्रवाई के साथ पूरा किया जाना चाहिए।
जिलाधिकारी (DM) और जिला प्रशासन की भूमिका इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी जिले में कोई परिवार भूखा सो रहा है, कोई बच्चा शिक्षा से वंचित है या किसी पात्र परिवार को राशन नहीं मिल रहा, तो इसकी नियमित समीक्षा होनी चाहिए। संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर वास्तविक समाधान निकालना आवश्यक है।इसके साथ-साथ उद्योगों, निजी कंपनियों और बड़े औद्योगिक समूहों को भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभानी होगी। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के माध्यम से गाँवों, गरीब बस्तियों और बेसहारा बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कौशल विकास और रोजगार के कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं। यदि प्रत्येक बड़ा उद्योग अपने आसपास के कुछ गाँवों या बस्तियों के समग्र विकास का दायित्व ले, तो परिवर्तन की गति कई गुना बढ़ सकती है।
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समाज की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। धार्मिक संस्थाएँ, सामाजिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएँ, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और सक्षम नागरिक यदि अपने आसपास के जरूरतमंद परिवारों की पहचान कर उन्हें सहयोग दें, तो अनेक जीवन बदल सकते हैं। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके सबसे कमजोर नागरिक के जीवन स्तर से होती है।हमें विशेष रूप से उन बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय अभियान चलाना चाहिए जिन्हें माता-पिता छोड़ चुके हैं या जो असुरक्षित परिस्थितियों में रह रहे हैं। ऐसे बच्चों की पहचान, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक सहायता और सुरक्षित पालन-पोषण के लिए सरकार, समाज और स्वयंसेवी संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा।
विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक विकास से पूरा नहीं होगा। वह तब पूरा होगा जब किसी भी बच्चे को भूख के कारण काम पर न जाना पड़े, जब कोई वृद्ध भूखा न सोए, जब कोई परिवार केवल दस्तावेज़ों के अभाव में सरकारी सहायता से वंचित न रहे और जब समाज अपने सबसे कमजोर वर्ग को भी सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर दे।आज आवश्यकता है कि हम विकास को केवल ऊँची इमारतों, बड़े निवेश और चमकती सड़कों से न मापें, बल्कि इस बात से मापें कि देश के अंतिम व्यक्ति तक भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान पहुँचा या नहीं। यही वास्तविक राष्ट्रनिर्माण है और यही सच्चा सामाजिक न्याय भी।यदि हम आने वाले वर्षों में भूख, बाल श्रम, बेसहारा बच्चों और छिपी हुई गरीबी के विरुद्ध एक संगठित राष्ट्रीय अभियान चला सके, तो भारत न केवल आर्थिक महाशक्ति बनेगा, बल्कि मानवता और सामाजिक न्याय का भी विश्व के सामने एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
आइए संकल्प लें—देश में कोई भूखा न सोए, कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे और कोई भी परिवार विकास की मुख्यधारा से बाहर न रह जाए। यही विकसित भारत की सबसे बड़ी पहचान होगी।