आज हमारे देश के लाखों युवा दुनिया की अग्रणी तकनीकी कंपनियों में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि यह प्रतिभा भारत में ही नए एआई मॉडल, सॉफ्टवेयर, चिप डिज़ाइन, डेटा सेंटर और अनुसंधान संस्थानों के निर्माण में योगदान दे। यदि हम केवल विदेशी तकनीकों के उपयोगकर्ता बने रहे, तो आत्मनिर्भर भारत का सपना अधूरा रह जाएगा।
विरेश तिवारी का मानना है कि भारत को एआई के क्षेत्र में दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए, जिसमें सरकार, उद्योग, विश्वविद्यालय और स्टार्टअप मिलकर काम करें। विद्यालयों और महाविद्यालयों में एआई, डेटा साइंस और नवाचार आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, न्याय, उद्योग और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में एआई का व्यापक उपयोग देश की उत्पादकता बढ़ा सकता है। साथ ही भारतीय भाषाओं पर आधारित स्वदेशी एआई मॉडल विकसित करना भी अत्यंत आवश्यक है, ताकि तकनीक का लाभ देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके। भारत ने अंतरिक्ष, डिजिटल भुगतान और वैक्सीन निर्माण में दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई है। अब समय एआई के क्षेत्र में भी विश्व नेतृत्व स्थापित करने का है। इसके लिए अनुसंधान में निवेश, नवाचार को प्रोत्साहन और युवाओं पर विश्वास सबसे बड़ी पूँजी होगी।

यदि आज सही निर्णय लिए गए, तो वर्ष 2047 तक विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक शक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत तकनीक का निर्माता, नवाचार का केंद्र और विश्व का विश्वसनीय मार्गदर्शक बनकर उभरेगा। यही समय है—तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसका निर्माता बनने का।
— विरेश तिवारी
जनतंत्र एवं स्तंभकार