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Updated: 31 July 2026 | Hindi News Portal
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श्रावण, प्रकृति हरियाली बम और शिव आराधना

आया सावन झूम के। आकाश में काले मेघ घिरे, धरती ने पहली बूंद को माथे से लगाया और वन में कोयल की कूक गूंज उठी। यह केवल ऋतु का परिवर्तन नहीं है। यह जीवन का नवजागरण है।

आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क | Updated: 30 Jul 2026, 05:17 PM | Views: 0
श्रावण,  प्रकृति हरियाली बम और शिव आराधना

डॉ0 दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक

आया सावन झूम के। आकाश में काले मेघ घिरे, धरती ने पहली बूंद को माथे से लगाया और वन में कोयल की कूक गूंज उठी। यह केवल ऋतु का परिवर्तन नहीं है। यह जीवन का नवजागरण है। श्रावण आते ही प्रकृति स्वयं शिवमय हो जाती है। पत्ते पत्ते पर जल की बूंदें शिवलिंग सी चमकती हैं, नदियां उफनती हैं, खेत लहलहाते हैं और जन मन में भक्ति की लहर उठती है। श्रावण जीवन में हरियाली लाता है और शिव भक्ति का महापर्व बनकर मनुष्य को भीतर से सींचता है।

वैदिक दृष्टि से श्रावण का संबंध सोम और जल तत्व से है। वेदों में जल को जीवन का मूल कहा गया है और शिव को जलधारी। श्रावण में निरंतर वर्षा से पृथ्वी का ताप घटता है, विष दूर होता है। प्राचीन ऋषियों ने इसी कारण इस मास में रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और बिल्वपत्र अर्पण का विधान किया। माना गया कि इस समय किया गया जप तप सहस्र गुना फल देता है क्योंकि प्रकृति स्वयं ध्यान की अवस्था में होती है। मेघों की गर्जना मंत्र जैसी लगती है और वर्षा की बूंदें हवन की आहुति जैसी पवित्र।

भौतिक धरातल पर श्रावण कृषि का प्राण है। भारत की अधिकांश खेती वर्षा पर निर्भर है। बीज बोने, रोपाई करने और फसल बचाने का समय यही है। किसान बैल और हल लेकर खेत में उतरता है तो उसके कंठ में भी शिव का नाम होता है। भोलेनाथ को आशुतोष कहा गया है, शीघ्र प्रसन्न होने वाले। किसान भी यही चाहता है कि मेहनत शीघ्र फले। इसी मास में प्रकृति में हरियाली बम फूटते हैं। बेल, नीम, पीपल, बरगद नए पत्तों से भरते हैं। घास उगती है, चारा मिलता है, पशु पुष्ट होते हैं। इसीलिए शिव को अर्पण करने के लिए कहा गया है जो प्रकृति से मिला है। दूध, दही, बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, जल। यह अर्पण केवल पूजा नहीं है, यह कृतज्ञता है। जो धरती से लिया उसे धरती के स्वामी को लौटा देना।

और यहीं से हरियाली बम की कथा आरंभ होती है। हरियाली बम कोई पटाखा नहीं है। यह मिट्टी, गोबर और जीवन का संगम है। विधि सरल है। एक मुट्ठी गीली मिट्टी लें। उसमें गाय का गोबर मिलाएं। बीच में बरगद, पीपल, नीम, आम, जामुन, बेल, आंवला या जिस भी वृक्ष का बीज आपके पास हो उसे रख दें। फिर उसे गोल पेड़े जैसा बना लें। सूखा कर रख लें। बस यही हरियाली बम है।

अब इसे जंगल में, नदी किनारे, सड़क के किनारे, खाली पड़ी जमीन पर, खेत की मेड़ पर, कहीं भी श्रद्धा से फेंक दें। गड्ढा खोदने की आवश्यकता नहीं। रोज पानी देने की आवश्यकता नहीं। फिर सावन के मेघ आएंगे। पहली वर्षा की बूंदें उस मिट्टी के पेड़े को गलाएंगी। गोबर खाद बन जाएगा। मिट्टी नरम होगी। और उसी नमी में सोया हुआ बीज आंख खोलेगा। एक नन्हा अंकुर फूटेगा। समय के साथ वह वृक्ष बनेगा। छाया देगा, फल देगा, पक्षियों को आश्रय देगा, धरती का ताप हर लेगा। यही शिव की प्रकृति सेवा है। यही हरियाली बम आराधना है।

इसमें तीन बातें एक साथ घटती हैं। पहली वैदिक। गोबर को पवित्र माना गया है। मिट्टी को माता कहा गया है। बीज को जीवन कहा गया है। तीनों को एक करना यज्ञ है। दूसरी भौतिक। वर्षा के जल को व्यर्थ बहने नहीं देता। बीज को सीधे जमीन पर डालने से पक्षी खा जाते हैं। पर मिट्टी गोबर के कवच में बीज सुरक्षित रहता है। वर्षा उसे स्वयं जगा देती है। तीसरी परालौकिक। जब हम बिना किसी स्वार्थ के एक बीज धरती को सौंपते हैं, तो हम अहंकार त्यागते हैं। हम फल की प्रतीक्षा नहीं करते। हम केवल बोते हैं। यही शिव वाला वैराग्य है। कर्म करो, फल की चिंता मत करो।

परालौकिक अर्थ में श्रावण आत्मा की शुद्धि का मास है। शिव संहारक भी हैं और कल्याणकारी भी। वे विष पीकर जगत को बचाते हैं। श्रावण में मनुष्य भी अपने भीतर का विष, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या पीने का संकल्प लेता है। उपवास, मौन, रुद्रपाठ, शिव चालीसा, यह सब अंतःकरण को धोते हैं। कहा जाता है कि श्रावण में शिव पार्वती सहित कैलाश से पृथ्वी पर अधिक निकट आते हैं। इसलिए इस मास में की गई प्रार्थना सीधे सुनी जाती है। भक्त कावड़ लेकर चलता है, पैरों में छाले होते हैं पर मन में आनंद होता है। यह यात्रा शरीर की नहीं, आत्मा की है।

लौकिक जीवन में श्रावण उत्सव और संबंधों का सेतु है। तीज, नागपंचमी, रक्षाबंधन, सभी इसी मास में आते हैं। झूले पड़ते हैं, गीत गाए जाते हैं, सखियां मिलती हैं। सावन के झूले पर बैठी स्त्री जब गाती है तो उसमें खेत, पति, परिवार और ईश्वर सभी समाए होते हैं। मंदिरों में भीड़ होती है, बम बम भोले की गूंज होती है। 

यह सामूहिकता मनुष्य को अकेलेपन से बचाती है। श्रावण सिखाता है कि अकेले शिव भी अधूरे हैं, उन्हें शक्ति चाहिए, उन्हें गण चाहिए, उन्हें भक्त चाहिए।

सामाजिक स्तर पर श्रावण समता का पाठ पढ़ाता है। शिव के दरबार में राजा और रंक का भेद नहीं। जो जल चढ़ा दे वही प्रिय। कावड़ यात्रा में डॉक्टर भी चलता है और मजदूर भी। एक ही पंक्ति में, एक ही कीचड़ में। यही लोकतंत्र का सच्चा रूप है। श्रावण में अन्नदान, वस्त्रदान, जलसेवा के आयोजन होते हैं। प्यासे को पानी, भूखे को भोजन। शिव का एक नाम आशुतोष है और दूसरा औघड़। वे मरघट में भी रहते हैं और महल में भी। इसलिए श्रावण समाज को याद दिलाता है कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को भी भूलना नहीं है। हरियाली बम भी अंतिम जन की पूजा है। जिसके पास मंदिर नहीं, जिसके पास धन नहीं, उसके हाथ में भी मिट्टी और बीज है। वह भी शिव को कुछ दे सकता है।

आर्थिक दृष्टि से श्रावण बाजार को गति देता है। सावन के मेले, शिव मंदिरों के आसपास की दुकानें, बेलपत्र, फूल, धूप, वस्त्र, चूड़ियां, मेहंदी। कावड़ यात्रा के मार्ग में भोजन, आवास, सेवा के केंद्र खुलते हैं। लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए यह मास आशा का मास है। यदि वर्षा अच्छी हुई तो मंडी भरी रहेगी, ऋण चुकेंगे, विवाह होंगे, उत्सव होंगे। शिव का त्रिशूल तीन गुणों का प्रतीक है और अर्थव्यवस्था भी उत्पादन, वितरण और उपभोग के त्रिशूल पर टिकी है। श्रावण इन तीनों को संतुलित करता है। एक व्यक्ति दस हरियाली बम फेंके। सौ लोग ऐसा करें तो हजार वृक्ष। हजार लोग करें तो एक वन। बिना पैसे के, बिना सरकारी योजना के, केवल श्रद्धा और मिट्टी से।

भौगोलिक रूप से भारत में श्रावण का प्रभाव सबसे अधिक दिखता है। हिमालय से गंगा निकलती है और शिव के जटाजूट से बहती मानी जाती है। उत्तर में हरिद्वार, ऋषिकेश, दक्षिण में रामेश्वरम, पश्चिम में सोमनाथ, पूर्व में बैद्यनाथ। सभी जगह जल और शिव का संबंध। वर्षा से नदियां पुनर्जीवित होती हैं, भूजल बढ़ता है, जंगल सघन होते हैं। यही कारण है कि श्रावण को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा गया। पेड़ लगाना, जल बचाना, नदी की पूजा करना, यह सब इसी मास में विशेष रूप से किया जाता है। हरियाली बम कर शिव को अर्पण करने का अर्थ यही है कि हमने प्रकृति को बचाया तो शिव प्रसन्न होंगे।

नैतिक धरातल पर श्रावण संयम सिखाता है। इस मास में मांस, मदिरा, तामसिक भोजन का त्याग करने की परंपरा है। क्योंकि शरीर को हल्का रखकर मन को साधना सरल होती है। शिव योगी हैं, वैरागी हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि भोग से पहले त्याग आवश्यक है। श्रावण में सत्य बोलना, क्रोध न करना, दान देना, इन व्रतों को महत्व दिया गया है। जब व्यक्ति अपने इंद्रियों को वश में करता है तभी वह परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्य ठीक से निभा पाता है।

कूटनीतिक और वैश्विक संदर्भ में शिव शांति और संतुलन के देवता हैं। समुद्र मंथन में जब विष निकला तो देव और दानव दोनों घबराए। तब शिव ने विष पी लिया। आज का विश्व भी अनेक विषों से भरा है। युद्ध, प्रदूषण, असमानता, जलवायु संकट। श्रावण हमें वही शिव वाला मार्ग दिखाता है। पहले स्वयं विष पीओ, फिर जगत को अमृत दो। भारत की परंपरा में शिव को विश्वनाथ कहा गया है। काशी केवल एक नगर नहीं, वह विश्व की चेतना का केंद्र है। जब भारत श्रावण में जल और वृक्षों के संरक्षण की बात करता है तो वह केवल अपने लिए नहीं बोलता, वह पूरे विश्व के लिए बोलता है।

व्यापार और वाणिज्य में भी श्रावण का स्थान है। प्राचीन काल में श्रावण के बाद व्यापारिक यात्राएं आरंभ होती थीं। सड़कें सुधरती थीं, नदियां नौकाओं के योग्य होती थीं। आज भी श्रावण के बाद त्योहारों का सीजन आता है।इसलिए व्यापारी इस मास में हिसाब दुरुस्त करते हैं, ईश्वर को धन्यवाद देते हैं और नई योजना बनाते हैं। शिव को भोले भंडारी कहा गया है। वे बिना भेदभाव के सबको देते हैं। व्यापारी भी यही सीखता है कि लाभ के साथ सेवा भी आवश्यक है।

और सबसे महत्वपूर्ण बात, अंतिम जन के लिए श्रावण। जो व्यक्ति हाशिए पर है, जिसके पास कुछ नहीं है, उसके लिए भी शिव का द्वार खुला है। एक लोटा जल, एक बिल्वपत्र, एक सच्चा भाव। बस। शिव को महंगे चढ़ावे नहीं चाहिए। उन्हें बेलपत्र प्रिय है जो हर जगह मिल जाता है। उन्हें जल प्रिय है जो नदी में बहता है। इसीलिए श्रावण गरीब से गरीब व्यक्ति को भी भक्ति का अधिकार देता है। कावड़ में कंधे पर गंगाजल लेकर चलने वाला व्यक्ति राजा से अधिक गर्व अनुभव करता है क्योंकि वह जानता है कि वह शिव के लिए कुछ कर रहा है।

श्रावण और शिव आराधना की लोक उपयोगिता इसी में है कि यह व्यक्ति, परिवार, समाज, प्रकृति और राष्ट्र सभी को एक सूत्र में बांधती है। यह हमें याद दिलाती है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका पुत्र है। जो हरियाली हमने काटी है उसे वापस लगाना होगा। जो नदियां हमने मैली की हैं उन्हें साफ करना होगा। जो रिश्ते हमने तोड़े हैं उन्हें जोड़ना होगा।

इसलिए इस श्रावण में संकल्प लें। हरियाली बम चलाइए। मिट्टी का पेड़ा बनाइए, बीज रखिए, और धरती पर बिखेर दीजिए। एक पेड़ लगाएं और उसे शिव को अर्पण करें। एक बाल्टी जल बचाएं और उसे शिव को अर्पण करें। एक भूखे को भोजन दें और उसे शिव को अर्पण करें। वर्षा उसे सींचेगी, शिव उसे स्वीकार करेंगे, और आने वाला समय आपको आशीर्वाद देगा। प्रकृति संरक्षण ही सच्ची शिव आराधना है और निस्वार्थ नेह समर्पण ही सच्चा जलाभिषेक है।

सावन आएगा और जाएगा। पर यदि हमने इस मास को केवल भीगने और गाने तक सीमित नहीं रखा, यदि हमने इसे जीने का ढंग बना लिया, तो जीवन में भी सावन बना रहेगा। भीतर हरियाली रहेगी, मन में शिव रहेगा और जगत में कल्याण रहेगा।

यही श्रावण का संदेश है। यही शिव का वरदान है।

 

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