डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
देश के चर्चित लेखक | मोटिवेशनल स्पीकर | प्रशिक्षक | सामाजिक कार्यकर्ता
मनुष्य के जीवन में अनेक संबंध जन्म के साथ मिल जाते हैं, पर एक संबंध ऐसा है जिसे मनुष्य स्वयं चुनता है—मित्रता। यही कारण है कि मित्रता संसार का सबसे स्वतंत्र, सबसे पवित्र और सबसे उत्तरदायी संबंध मानी गई है। रक्त का संबंध शरीर से जुड़ता है, किंतु मित्रता आत्मा से जुड़ती है। माता-पिता जीवन देते हैं, गुरु दिशा देते हैं, पर सच्चा मित्र जीवन की कठिन राहों में साहस देता है। वह हमारी सफलताओं पर सबसे अधिक प्रसन्न होता है और हमारी असफलताओं में सबसे पहले हमारे साथ खड़ा दिखाई देता है। इसलिए कहा गया है कि सच्चा मित्र ईश्वर का वह उपहार है, जिसे हम स्वयं अपने जीवन में चुनते हैं।
वैदिक संस्कृति में मित्र को केवल साथी नहीं, बल्कि "सखा" कहा गया है। सखा वह होता है जो केवल साथ चलने वाला नहीं, बल्कि सत्य के मार्ग पर चलाने वाला हो। ऋग्वेद में मित्रता को विश्वास, सहयोग और धर्म का आधार माना गया है। मित्र वह है जो हमारे गुणों को विकसित करे और हमारी कमियों को दूर करने का साहस रखे। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन की मित्रता इसका सर्वोच्चउदाहरण है। कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अर्जुन का अंध-समर्थन नहीं किया, बल्कि उसके मोह को दूर कर धर्म का बोध कराया। सच्चा मित्र वही है जो हमारी प्रसन्नता के लिए झूठ न बोले, बल्कि हमारे कल्याण के लिए सत्य कहने का साहस रखे।समय बदलता है, साधन बदलते हैं और जीवन की गति भी बदलती है। आज मित्रता का स्वरूप भी बदल गया है। मोबाइल की घंटियाँ, सामाजिक माध्यम, वीडियो कॉल और डिजिटल मंचों ने दूरियों को मिटा दिया है। आज मित्र हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी हमारे साथ खड़ा हो सकता है। वह विदेश में रहकर हमारी पढ़ाई में सहायता कर सकता है, नौकरी के अवसर बता सकता है, कठिन समय में आर्थिक सहयोग दे सकता है या जीवन की दिशा बदलने वाला एक विचार दे सकता है। आधुनिक युग की यह मित्रता गलत नहीं है, क्योंकि समय के साथ माध्यम बदलते हैं, भावनाएँ नहीं।

किन्तु इसी युग का दूसरा चेहरा भी उतना ही कठोर है। आज संबंधों में स्वार्थ का प्रवेश पहले से अधिक दिखाई देता है। मित्रता कई बार लाभ, प्रतिष्ठा और सुविधा का साधन बन जाती है। जब तक लाभ मिलता है, तब तक निकटता बनी रहती है; जैसे ही स्वार्थ समाप्त होता है, संबंध भी समाप्त हो जाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने बहुत पहले ही चेतावनी दी थी कि जो व्यक्ति स्वार्थ पूरा होते ही मुँह मोड़ ले, वह मित्र नहीं, अवसरवादी है। राजनीति, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तो यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है, पर दुर्भाग्य यह है कि अब यह सामान्य जीवन में भी प्रवेश कर चुकी है।फिर भी संसार से सच्ची मित्रता समाप्त नहीं हुई है। जब तक कृष्ण हैं, तब तक सुदामा भी रहेंगे। सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों का सर्वोच्च आदर्श है। एक ओर अपार वैभव था, दूसरी ओर घोर गरीबी; एक ओर राजमहल था, दूसरी ओर टूटी हुई झोपड़ी। फिर भी दोनों के बीच न धन आया, न पद, न दूरी और न समय। सुदामा माँगने नहीं गए थे और श्रीकृष्ण ने गिनकर नहीं दिया। जहाँ लेने-देने का हिसाब समाप्त हो जाए, वहीं से सच्ची मित्रता आरम्भ होती है।
आज भी सच्चे मित्र की पहचान कठिन नहीं है। वह आपकी अनुपस्थिति में भी आपका सम्मान करता है। वह आपकी सफलता से ईर्ष्या नहीं करता, बल्कि उसे अपनी सफलता मानकर प्रसन्न होता है। वह आपकी भूल पर सार्वजनिक उपहास नहीं उड़ाता, बल्कि एकांत में समझाता है। संसार यदि आपके विरुद्ध खड़ा हो जाए, तब भी वह आपका हाथ छोड़कर नहीं जाता। वह आपकी कमज़ोरियों का लाभ नहीं उठाता, बल्कि उन्हें आपकी शक्ति में बदलने का प्रयास करता है। वह आपकी जेब नहीं, आपका चरित्र देखता है; आपका पद नहीं, आपका व्यक्तित्व पहचानता है।वैश्विक युग ने मित्रता की सीमाएँ भी समाप्त कर दी हैं। अब मित्रता केवल एक गाँव, एक शहर या एक देश तक सीमित नहीं रही। अनेक बार अनजान देशों के लोग भी संकट की घड़ी में एक-दूसरे की सहायता करते दिखाई देते हैं। प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों और वैश्विक संकटों में मानवता ने यह सिद्ध किया है कि सच्ची मित्रता सीमाओं से बड़ी होती है। भाषा, धर्म, जाति, रंग और राष्ट्र अलग हो सकते हैं, पर करुणा और विश्वास का कोई भूगोल नहीं होता।निस्वार्थ मित्रता का अर्थ यह नहीं कि उसमें अपेक्षाएँ बिल्कुल न हों। अपेक्षा होती है—विश्वास की, सम्मान की, समय की और संवेदनशीलता की। सच्चा मित्र आपके आँसू देखकर कारण पूछने से पहले आपका हाथ पकड़ लेता है। आपका फोन कई घंटों तक न उठे तो वह क्रोधित नहीं होता, चिंतित हो जाता है। आपकी तरक्की पर उपहार माँगने से पहले आपकी सेहत पूछता है। आपके माता-पिता को अपने माता-पिता जैसा सम्मान देता है और आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी प्रतिफल की इच्छा के आपके साथ खड़ा हो जाता है। यही मित्रता का सर्वोच्च स्वरूप है।
आज आवश्यकता मित्रों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि मित्रता की गुणवत्ता बढ़ाने की है। हजारों परिचित जीवन की एक सच्ची मित्रता का स्थान नहीं ले सकते। सामाजिक माध्यमों पर लाखों अनुयायी होने से कोई धनी नहीं हो जाता; वास्तव में धनी वह है जिसके पास संकट के समय बिना बुलाए पहुँचने वाला एक सच्चा मित्र हो। वही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।अंततः स्मरण रखिए—सच्चा मित्र जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। धन समाप्त हो जाए तो पुनः अर्जित किया जा सकता है; पद चला जाए तो फिर प्राप्त किया जा सकता है; पर यदि एक सच्चा मित्र खो जाए, तो जीवन की अमूल्य निधि खो जाती है। इसलिए मित्र खोजने से पहले स्वयं ऐसा व्यक्ति बनिए जिस पर कोई निस्संकोच विश्वास कर सके। अपने भीतर श्रीकृष्ण की करुणा, सुदामा की निष्ठा, अर्जुन की पारदर्शिता और विदुर की सत्यनिष्ठा का विकास कीजिए।
दुनिया स्वार्थ के रिश्तों को गिनती है, इतिहास केवल सच्ची मित्रता को याद रखता है। यदि आपके जीवन में एक भी ऐसा मित्र है जो आपकी सफलता में आपसे अधिक प्रसन्न हो, आपकी असफलता में आपसे पहले आपके साथ खड़ा हो जाए और आपके आँसू देखकर स्वयं की आँखें भी नम कर ले, तो समझिए ईश्वर ने आपको अपने सबसे अनमोल उपहारों में से एक उपहार प्रदान किया है। मित्रता कोई सौदा नहीं, दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता इसलिए अमर है, क्योंकि उसमें स्वार्थ नहीं, समर्पण था; अपेक्षा नहीं, अपनापन था; और लाभ नहीं, प्रेम था। यही सच्ची मित्रता का सनातन, शाश्वत और अलौकिक सत्य है।