लेखक : डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक | समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत | लेखक, प्रेरक वक्ता, प्रशिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता
लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं है; वह समाज की बदलती आकांक्षाओं को शासन की संरचना में स्थान देने की सतत प्रक्रिया है। इसलिए भारत में प्रस्तावित नए परिसीमन की चर्चा को केवल लोकसभा की सीटें बढ़ाने की बहस मानना इसके वास्तविक महत्व को छोटा कर देना होगा। यह प्रश्न मूलतः इस बात का है कि बदलती जनसंख्या, सामाजिक संरचना, क्षेत्रीय असमानताओं और संघीय विविधता के बीच भारत अपने प्रत्येक नागरिक को कितनी प्रभावी राजनीतिक आवाज दे सकता है।
भारत की वर्तमान संसदीय व्यवस्था उस समय के जनसांख्यिकीय परिदृश्य से बनी थी जब देश की आबादी आज की तुलना में बहुत कम थी। १९७१ के बाद लंबे समय तक लोकसभा सीटों के पुनर्समायोजन को रोकने का उद्देश्य उन राज्यों को राजनीतिक नुकसान से बचाना था जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। यह निर्णय उस समय सामाजिक नीति और संघीय संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। देश की विशाल आबादी के कारण एक सांसद के निर्वाचन क्षेत्र में लाखों नागरिक आते हैं। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या एक जनप्रतिनिधि इतनी बड़ी आबादी की आकांक्षाओं, समस्याओं और शिकायतों को पर्याप्त गहराई से समझ और संसद तक पहुँचा सकता है।
इसी धरातल पर परिसीमन की आवश्यकता सामने आती है। निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन यदि वैज्ञानिक, पारदर्शी और न्यायपूर्ण तरीके से किया जाता है, तो जनप्रतिनिधि और जनता के बीच दूरी कम हो सकती है। पहाड़ के दूरस्थ गाँव की महिला, सीमांत किसान, श्रमिक, दलित बस्ती का युवा, आदिवासी परिवार और छोटे व्यापारी की आवाज अपने प्रतिनिधि तक अधिक सहजता से पहुँच सकती है। लेकिन यह भी समझना होगा कि केवल निर्वाचन क्षेत्र छोटा कर देने से लोकतंत्र स्वतः मजबूत नहीं होता। मजबूत लोकतंत्र के लिए सक्षम सांसद, प्रभावी संसदीय समितियाँ, पर्याप्त शोध-सहायता, विधेयकों पर गंभीर चर्चा और जनता से निरंतर संवाद भी आवश्यक हैं।
इसलिए भारत को केवल बड़ी संसद नहीं, बल्कि बेहतर संसद की आवश्यकता है।
परिसीमन का सबसे कठिन प्रश्न जनसंख्या के न्याय और संघीय न्याय के बीच संतुलन का है। यदि जनसंख्या को प्रतिनिधित्व का प्रमुख आधार बनाया जाता है, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बढ़ेंगी। दूसरी ओर, जिन राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन के माध्यम से जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, उन्हें यह आशंका हो सकती है कि उनके राजनीतिक प्रभाव में अपेक्षाकृत कमी आएगी। यही वह बिंदु है जहाँ भारत की संघीय व्यवस्था की परिपक्वता की परीक्षा होगी।
उत्तर और दक्षिण का विवाद भारत के लिए समाधान नहीं है। उत्तर भारत देश की विशाल जनसंख्या, कृषि और श्रम शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि दक्षिण भारत शिक्षा, उद्योग, स्वास्थ्य, विज्ञान, समुद्री व्यापार और मानव विकास के अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसलिए ऐसा लोकतांत्रिक सूत्र आवश्यक है जिसमें जनसंख्या के सिद्धांत का सम्मान हो, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के योगदान और संघीय विश्वास की भी रक्षा हो। भारत की एकता समानता से ही नहीं, न्यायपूर्ण संतुलन से भी निर्मित होती है।
नई जनगणना और परिसीमन सामाजिक न्याय की दिशा में भी बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान राजनीतिक प्रतिनिधित्व में ऐतिहासिक बदलाव की संभावना पैदा करता है। पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी ने सिद्ध किया है कि राजनीतिक अवसर मिलने पर महिलाएँ केवल पद ग्रहण नहीं करतीं, बल्कि विकास की प्राथमिकताओं को भी बदल सकती हैं। पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, स्वच्छता, सुरक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिति जैसे विषयों को महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी से नई शक्ति मिल सकती है।

लेकिन महिला आरक्षण की वास्तविक सफलता केवल संसद में महिलाओं की संख्या से तय नहीं होगी। प्रश्न यह होगा कि क्या महिलाएँ स्वतंत्र रूप से निर्णय ले पाएँगी, क्या उन्हें नीति निर्माण की पर्याप्त समझ और संसदीय संसाधन मिलेंगे और क्या वे राजनीतिक दलों की वास्तविक निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका निभाएँगी। प्रतिनिधित्व को अधिकार और नेतृत्व में बदलना ही आरक्षण की असली सफलता होगी।
जातिगत जनगणना का प्रश्न भी इसी परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि समाज के विभिन्न वर्गों की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति के विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध होते हैं, तो शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी योजनाओं को अधिक वैज्ञानिक आधार दिया जा सकता है। लेकिन आंकड़ों का उद्देश्य समाज को नए संघर्षों में बाँटना नहीं, बल्कि उन वर्गों तक अवसर पहुँचाना होना चाहिए जो ऐतिहासिक या आर्थिक कारणों से पीछे रह गए हैं। सामाजिक न्याय भावनात्मक नारों से नहीं, प्रमाणित आंकड़ों और न्यायपूर्ण नीतियों से मजबूत होगा।
एक साथ चुनाव का विचार भी लोकतांत्रिक पुनर्गठन के व्यापक विमर्श से जुड़ा है। बार-बार होने वाले चुनावों में सार्वजनिक धन, प्रशासनिक ऊर्जा और शासन का समय खर्च होता है। यदि चुनावी चक्र अधिक स्थिर होता है तो सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार, आधारभूत संरचना और दीर्घकालिक आर्थिक योजनाओं पर अधिक निरंतरता से काम करने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर खतरा भी है। राष्ट्रीय मुद्दों और बड़े राजनीतिक चेहरों का प्रभाव स्थानीय समस्याओं को दबा सकता है। गाँव की सड़क, खेत का पानी, प्राथमिक विद्यालय, स्थानीय अस्पताल और तहसील की व्यवस्था जैसे प्रश्न राष्ट्रीय विमर्श में पीछे छूट सकते हैं।
इसलिए किसी भी चुनावी सुधार की कसौटी केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि मतदाता की स्वतंत्र और बहुस्तरीय पसंद होनी चाहिए। लोकतंत्र में स्थिरता आवश्यक है, लेकिन जवाबदेही उससे भी अधिक आवश्यक है।
भविष्य की संसद में सांसदों की संख्या बढ़ती है तो संसदीय व्यवस्था को भी उसी अनुपात में सक्षम बनाना होगा। प्रत्येक सांसद को शोध और नीति संबंधी सहयोग मिलना चाहिए। संसदीय समितियों को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए। महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए। नागरिकों के साथ संवाद के आधुनिक माध्यमों को मजबूत किया जाना चाहिए। संसद में संख्या बढ़ाकर यदि विचार-विमर्श का समय और गुणवत्ता नहीं बढ़ाई गई, तो लोकतंत्र का बाहरी आकार बड़ा और उसकी आंतरिक शक्ति कमजोर हो सकती है।
अंततः इस पूरे परिवर्तन की सबसे बड़ी कसौटी संसद की सीटों की संख्या नहीं, बल्कि अंतिम जन का जीवन है। किसान को उचित मूल्य मिले, युवा को रोजगार मिले, महिला को सम्मान और अवसर मिले, गरीब बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, श्रमिक को सुरक्षा मिले और आदिवासी को अपने अधिकारों का संरक्षण मिले—तभी लोकतांत्रिक पुनर्संरचना सार्थक होगी।
भारत को ऐसा नया लोकतांत्रिक गणित चाहिए जिसमें जनसंख्या का न्याय हो, सामाजिक न्याय हो, महिला न्याय हो, क्षेत्रीय न्याय हो और संघीय संतुलन भी सुरक्षित रहे। परिसीमन केवल नक्शे पर नई रेखाएँ खींचने की प्रक्रिया न बने; वह नागरिक और संसद के बीच दूरी घटाने का माध्यम बने।
भारत का लोकतंत्र संख्या से चलता अवश्य है, लेकिन केवल संख्या से जीवित नहीं रहता। उसकी आत्मा संवाद, संवेदना, समानता, प्रतिनिधित्व और विश्वास में बसती है। इसलिए आने वाला परिसीमन भारत के लिए केवल सीटों की पुनर्गणना नहीं, बल्कि यह तय करने का ऐतिहासिक अवसर है कि इक्कीसवीं सदी का भारतीय लोकतंत्र कितना बड़ा नहीं, बल्कि कितना अधिक न्यायपूर्ण, उत्तरदायी और जन-केंद्रित होगा।
यदि इस परिवर्तन में अंतिम व्यक्ति की आवाज सबसे ऊपर रखी गई, तो नई संसद केवल बड़ी नहीं होगी—वह भारत के लोकतंत्र को अधिक गहरा, अधिक सहभागी और अधिक मानवीय बनाएगी।