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Updated: 03 September 2026 | Hindi News Portal
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आज का मुद्दा पर प्रकाशित खबरों में स्थानीय संदर्भ, सत्यापन और पाठकों के काम की जानकारी को प्राथमिकता दी जाती है।
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सच का शोर और पत्रकारिता की खामोशी

मुंबई/इंद्र यादव/आजकल कहा जाता है कि कलम में बहुत ताकत होती है। लेकिन सच तो यह है कि अब यह कलम अक्सर 'विज्ञापन' और 'पैसे' के दबाव में दब कर रह गई है।

आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क | Updated: 27 Jun 2026, 05:18 PM | Views: 0 | 2 मिनट पढ़ें
सच का शोर और पत्रकारिता की खामोशी

इस रिपोर्ट में क्या खास है?

  • खबर को स्थानीय पाठकों के संदर्भ में सरल भाषा में समझाया गया है।
  • जहां उपलब्ध हो, आधिकारिक जानकारी, प्रत्यक्ष बयान और जमीन से मिली जानकारी को आधार बनाया जाता है।
  • नई जानकारी आने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाता है और तारीख ऊपर दी जाती है।

मुंबई/इंद्र यादव/आजकल कहा जाता है कि कलम में बहुत ताकत होती है। लेकिन सच तो यह है कि अब यह कलम अक्सर 'विज्ञापन' और 'पैसे' के दबाव में दब कर रह गई है।हम रोज सुबह अखबार पढ़ते हैं या टीवी देखते हैं, यह उम्मीद लेकर कि हमें सच पता चलेगा। अखबार और न्यूज़ चैनल खुद को 'समाज का आईना' और 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' बताते हैं। सुनने में यह सब बहुत अच्छा लगता है, लेकिन असलियत थोड़ी अलग है। आज का यह 'आईना' इतना ज्यादा धुंधला हो चुका है कि इसमें हमें सिर्फ वही दिखता है जो वे हमें दिखाना चाहते हैं।

सच लिखना अब 'बिजनेस' बन गया है

कभी पत्रकारिता एक सेवा और तपस्या हुआ करती थी। आज यह सिर्फ 'टीआरपी' का खेल बन गई है। आज का पत्रकार स्टूडियो में बैठकर दुनिया भर की बातें तो कर लेता है, लेकिन उसके अपने शहर की टूटी सड़कें या गरीब की समस्या उसे कभी नहीं दिखती। क्योंकि वहां से उसे 'टीआरपी' नहीं मिलती। सच लिखने की हिम्मत अब कम और अपने फायदे का सौदा ज्यादा दिखाई देता है।

जनता की आवाज़ या सिर्फ शोर

हम सुनते हैं कि पत्रकार 'जनता की आवाज़' हैं। पर सच ये है कि आजकल के न्यूज़ चैनलों पर सिर्फ शोर सुनाई देता है। जो जितना जोर से चिल्लाएगा, उसे उतना ही 'सच्चा' मान लिया जाता है। सच को आराम से और बिना डर के कहना अब किसी को पसंद नहीं, क्योंकि उसे मसालेदार तरीके से पेश करने में ही सबको मज़ा आता है।

निष्पक्षता का मतलब ही बदल गया है

आज के दौर में निष्पक्ष होना सबसे मुश्किल काम है। अगर आप किसी एक पक्ष की गलत बात नहीं कहेंगे, तो आपको तुरंत किसी एक पार्टी का समर्थक बता दिया जाएगा। सच तो यह है कि लोग अब निष्पक्ष खबर सुनना ही नहीं चाहते। हर कोई वही सुनना चाहता है जो उसकी अपनी पसंद से मेल खाता हो।

बदलाव कैसे आएगा

हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि 'विचारों और संस्कारों' से ही समाज बदलेगा। ये बातें अच्छी हैं, पर क्या ये सिर्फ भाषणों तक सीमित हैं!जब तक पत्रकारिता बिकती रहेगी, तब तक वह जनता की आवाज़ नहीं बन सकती।जब तक हम (पाठक और दर्शक) खुद सच को परखना नहीं सीखेंगे, तब तक हमें झूठ ही परोसा जाएगा।समाज का आईना तब तक साफ नहीं होगा, जब तक हम खुद उसे साफ करने की कोशिश नहीं करेंगे। पत्रकार को अपनी ईमानदारी बचाए रखनी होगी और हमें, यानी आम जनता को, सही और गलत का फर्क समझने की कोशिश करनी होगी।कलम की असली ताकत तभी दिखेगी, जब वह बिना डरे और बिना बिके सच लिखेगी।

क्या आपको लगता है कि आज के दौर में निष्पक्ष खबरें कहीं खो गई हैं, या आप अभी भी ऐसी खबरें ढूंढ लेते हैं जिन पर भरोसा किया जा सके!

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Author: आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क

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