डॉ. दीपक गोस्वामी
*(मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत
वरिष्ठ लेखक | मोटिवेशनल स्पीकर | प्रशिक्षक | सामाजिक चिंतक | पत्रकारिता एवं सामाजिक सरोकारों के विश्लेषक)*
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किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी संसद, न्यायपालिका अथवा कार्यपालिका से पहले उस निर्भीक चेतना में निहित होती है, जो समाज की आँख बनकर देखती है, कान बनकर सुनती है और विवेक बनकर सत्य को जन-जन तक पहुँचाती है। यही चेतना पत्रकारिता है। इसी कारण पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। परंतु आज यही स्तंभ अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। यह संकट आर्थिक नहीं, तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और वैचारिक है। यह संकट है—असली और नकली पत्रकारिता के बीच धुँधली होती रेखा का।
इसी पीड़ा से प्रेरित होकर प्रदेश की मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने प्रदेशव्यापी अभियान चलाने की घोषणा की है। तीस जुलाई से राजधानी के एक प्रमुख चौराहे पर आरम्भ होने वाला यह अभियान केवल प्रेस कार्डों की जाँच का कार्यक्रम नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा बचाने का प्रयास है। इसकी प्रमुख माँग है कि बिना समुचित सत्यापन किसी को प्रेस पहचान-पत्र न दिया जाए, फर्जी प्रेस कार्ड, फर्जी प्रेस वाहन और पत्रकारिता की आड़ में होने वाले अवैध कृत्यों पर कठोर कार्रवाई हो। यह माँग स्वागत योग्य है, क्योंकि नकली पहचान केवल पत्रकारिता को ही नहीं, लोकतंत्र की विश्वसनीयता को भी चोट पहुँचाती है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। पत्रकारिता उसी स्वतंत्रता का सजीव रूप है। भारत में पत्रकार बनने के लिए न कोई सरकारी लाइसेंस आवश्यक है, न कोई अनिवार्य परीक्षा और न ही कोई निश्चित शैक्षणिक उपाधि। यदि कोई व्यक्ति सत्य की खोज करता है, तथ्यों का निष्पक्ष परीक्षण करता है और जनहित में उन्हें समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है, तो वह पत्रकारिता का दायित्व निभा रहा है। उसका माध्यम चाहे समाचार-पत्र हो, टेलीविजन, डिजिटल मंच, यूट्यूब या स्वतंत्र लेखन—उसकी पहचान उसके मंच से नहीं, उसके चरित्र और कार्य से होगी।
यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है और दुर्भाग्य से यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी। खुलेपन का लाभ लेकर कुछ लोग पत्रकारिता की पवित्र गरिमा को निजी स्वार्थ का साधन बना लेते हैं। यही वे लोग हैं, जिन्हें समाज "फर्जी पत्रकार" कहता है।
यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि प्रेस कार्ड न होना किसी को फर्जी पत्रकार नहीं बनाता और प्रेस कार्ड होना किसी को स्वतः सच्चा पत्रकार भी नहीं बना देता। पत्रकारिता की असली पहचान कार्ड नहीं, चरित्र है; संस्था नहीं, सत्यनिष्ठा है; पहचान-पत्र नहीं, जनविश्वास है।
आज ऐसे छद्म पत्रकारों की तीन प्रमुख श्रेणियाँ दिखाई देती हैं। पहली श्रेणी उन लोगों की है जो पत्रकारिता का भय दिखाकर अधिकारियों, व्यापारियों और आम नागरिकों से धन उगाही करते हैं। दूसरी श्रेणी उन लोगों की है जो पूर्वाग्रह के आधार पर समाचार गढ़ते हैं। तीसरी श्रेणी उन लोगों की है जो स्वयं कोई तथ्य एकत्र नहीं करते, केवल दूसरों की सामग्री को अपने नाम से प्रकाशित कर देते हैं। ये तीनों प्रवृत्तियाँ पत्रकारिता नहीं, बल्कि उसके नाम पर सामाजिक अपराध हैं।
इसके विपरीत वास्तविक पत्रकार वह है जो घटनास्थल पर पहुँचता है, दोनों पक्षों की बात सुनता है, तथ्यों की पुष्टि करता है, सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखता है और समाज के वंचित वर्ग की आवाज़ बनता है। यदि उससे कोई त्रुटि हो जाए तो वह उसे स्वीकार कर सार्वजनिक रूप से सुधार भी प्रकाशित करता है। यही पत्रकारिता का धर्म है।
डिजिटल युग ने पत्रकारिता के स्वरूप को विस्तृत किया है। आज मोबाइल भी समाचार का माध्यम है। कोई भी नागरिक यदि प्रमाण, संतुलन और जनहित के आधार पर तथ्य प्रस्तुत करता है तो वह लोकतांत्रिक संवाद का सहभागी है। वहीं यदि कोई व्यक्ति डिजिटल मंच का उपयोग झूठ, घृणा, ब्लैकमेल या दुष्प्रचार के लिए करता है, तो वह पत्रकार नहीं बल्कि कानून का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति है।
भारतीय ज्ञान परंपरा भी सत्यनिष्ठ संवाद की शिक्षा देती है। महर्षि वेदव्यास ने सत्य को किसी पक्ष का दास नहीं बनने दिया। महर्षि वाल्मीकि ने आदर्श के साथ यथार्थ भी लिखा। देवर्षि नारद का उद्देश्य भी सत्य का संप्रेषण था। इसलिए भारतीय संस्कृति कहती है—
"सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।"
पत्रकारिता का मूल भी यही है—सत्य, संवेदना और उत्तरदायित्व का संतुलन।
समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं, बल्कि पारदर्शिता, आत्मानुशासन और जवाबदेही में है। मीडिया संस्थानों को अपने प्रतिनिधियों की स्पष्ट सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। पत्रकार संगठनों को आचार संहिता का कठोर पालन कराना चाहिए। जो व्यक्ति पत्रकारिता की आड़ में अपराध करे, उसे संरक्षण नहीं, दंड मिलना चाहिए।
अंततः पत्रकारिता कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति एक पवित्र उत्तरदायित्व है। प्रेस कार्ड सुविधा का माध्यम हो सकता है, सम्मान का नहीं। कैमरा केवल उपकरण है, दृष्टि नहीं। कलम केवल साधन है, सत्य नहीं। सत्य तब जन्म लेता है जब पत्रकार अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित और जनहित को सर्वोच्च स्थान देता है।
जिस दिन समाज व्यक्ति की पहचान उसके प्रेस कार्ड से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, सत्यनिष्ठा और जनसेवा से करेगा, उसी दिन असली और नकली पत्रकारिता के बीच का भ्रम समाप्त हो जाएगा। क्योंकि झूठ का जीवन क्षणिक होता है, जबकि सत्य सनातन होता है।
पत्रकारिता जीवित रहे, सत्य सुरक्षित रहे, लोकतंत्र सशक्त रहे—यही हमारी कामना, यही हमारा संकल्प और यही कलम की अंतिम कसौटी है।