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Updated: 01 August 2026 | Hindi News Portal
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तिरंगे की उड़ान: ग्लासगो से लॉस एंजिल्स तक युवा भारत का स्वर्णिम संकल्प

किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, उसकी अर्थव्यवस्था या उसके प्राकृतिक संसाधनों में ही नहीं बसती। वह शक्ति उस राष्ट्र के युवाओं की ऊर्जा, अनुशासन, चरित्र और संकल्प में साँस लेती है। और जब यही शक्ति खेल के मैदान पर उतरती है तो वह सबसे प्रामाणिक दर्पण बन जाती है जिसमें एक देश अपनी आत्मा को देखता है।

आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क | Updated: 31 Jul 2026, 09:42 PM | Views: 0
तिरंगे की उड़ान: ग्लासगो से लॉस एंजिल्स तक युवा भारत का स्वर्णिम संकल्प

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक

किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, उसकी अर्थव्यवस्था या उसके प्राकृतिक संसाधनों में ही नहीं बसती। वह शक्ति उस राष्ट्र के युवाओं की ऊर्जा, अनुशासन, चरित्र और संकल्प में साँस लेती है। और जब यही शक्ति खेल के मैदान पर उतरती है तो वह सबसे प्रामाणिक दर्पण बन जाती है जिसमें एक देश अपनी आत्मा को देखता है। ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 इसी दर्पण की सबसे चमकदार झलक है। यह केवल पदकों की प्रतियोगिता नहीं थी। यह बदलते भारत की धड़कन थी। यह उस भारत की घोषणा थी जिसने अब केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी होने का गर्व करना छोड़ दिया है और उस युवा शक्ति को विश्व स्तर की उपलब्धियों में ढालना आरंभ कर दिया है।

बारिश से भीगा ट्रैक, काले बादलों के नीचे दौड़ती हुई दो परछाइयाँ, और फिर स्टेडियम में गूंजता राष्ट्रगान। दिलीप महादू गावित ने 100 मीटर टी 47 की दौड़ 10.71 सेकंड में पूरी कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उसी दौड़ में मोहम्मद बासिल ने 10.83 सेकंड के साथ रजत जीतकर तिरंगे को दूसरी बार सम्मान दिलाया। यह केवल दो पदक नहीं थे। यह उस व्यवस्था की जीत थी जिसने महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव के उस लड़के को उठाया जिसके बचपन में पेड़ से गिरने के कारण हाथ चला गया था। यह उस युवा की जीत थी जिसने जन्म से ही शारीरिक चुनौती के साथ जीना सीखा। 10.71 सेकंड का यह समय केवल सीज़न बेस्ट नहीं था, यह कॉमनवेल्थ पैरा रिकॉर्ड था। यह इस बात का प्रमाण था कि भारतीय युवा अब बाधाओं को कारण नहीं मानता, वह उन्हें चुनौती मानता है और चुनौती को पराजित करता है।

उसी दिन जब घड़ी 27 मिनट 49.46 सेकंड पर रुकी तो गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर दौड़ में रजत पदक के साथ एक नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बना दिया। 2016 में गोपी टी का राष्ट्रीय रिकॉर्ड 28 मिनट 17.02 सेकंड था। लगभग आठ वर्षों में 28 सेकंड का यह सुधार छोटा नहीं है। यह वैज्ञानिक प्रशिक्षण का, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं के अनुभव का, और एक धावक की उस जिद का परिणाम है जो लंबी दूरी को भी छोटे लक्ष्य में बदल देती है। भारोत्तोलन मंच पर हरजिंदर कौर ने 69 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता। 2022 में उन्होंने कांस्य जीता था। कांस्य से रजत तक का यह सफर क्रमबद्ध प्रगति की कहानी कहता है। एक दिन में दो एथलेटिक्स पदक, फिर मुक्केबाजी के रिंग से आई खबर कि जैस्मिन ने 5 0 सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया है, पूजा रानी और जैमिनी ने भी पदक सुनिश्चित कर लिए हैं। तीन और पदक पक्के। कुल मिलाकर इस चरण तक भारत के पास 12 पदक थे। दो स्वर्ण, सात रजत, तीन कांस्य। पदक तालिका में बारहवां स्थान।

संख्या अपने आप में सब कुछ नहीं कहती। ग्लासगो की तस्वीर अलग है। पहले अधिकांश पदक कुश्ती, शूटिंग और बैडमिंटन से आते थे। आज एथलेटिक्स, पैरा एथलेटिक्स, भारोत्तोलन, मुक्केबाजी के साथ बैडमिंटन, तीरंदाजी, शूटिंग सभी भारत की ताकत बन रहे हैं। दिलीप गावित और मोहम्मद बासिल का एक ही स्पर्धा में स्वर्ण रजत जीतना पैरा खेलों में भारत की बढ़ती गहराई का प्रमाण है। टोक्यो पैरालंपिक 2021 में भारत ने 19 पदक जीते थे। पेरिस 2024 में यह संख्या बढ़कर 29 हो गई। यही निरंतरता अब कॉमनवेल्थ स्तर पर भी दिखाई दे रही है। 10.71 और 10.83 सेकंड जैसे प्रदर्शन केवल व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं हैं। इनके पीछे आधुनिक कोचिंग, बायोमैकेनिक्स, पोषण विज्ञान और मानसिक प्रशिक्षण का समन्वित प्रयास है।

इस बदलाव की जड़ में भारत का युवा जनसांख्यिकीय लाभ है। 2026 में भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष है। 15 से 29 वर्ष के बीच की आबादी 27 करोड़ से अधिक है। इतनी विशाल युवा शक्ति जब अनुशासन के साथ खेल के मैदान में उतरती है तो संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं। पिछले एक दशक में खेलो इंडिया और टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना ने जमीनी स्तर पर प्रतिभा खोजने का कार्य किया है। विभिन्न राज्य सरकारों की खेल अकादमियों ने भी इस कार्य को गति दी है। परिणामस्वरूप महाराष्ट्र के छोटे गांवों से लेकर केरल के कस्बों तक, पंजाब के खेतों से लेकर हरियाणा के अखाड़ों तक प्रतिभाएं अब महानगरों की प्रतीक्षा नहीं करतीं। वे सीधे राष्ट्रीय शिविरों तक पहुंच रही हैं।

बॉक्सिंग भारत का पारंपरिक रूप से मजबूत क्षेत्र रहा है। विजेंदर सिंह की हिम्मत, मैरी कॉम की निरंतरता और लवलीना बोरगोहैन की आक्रामकता ने एक विरासत बनाई है। अब नई पीढ़ी उस विरासत को आगे ले जा रही है।जैस्मिन का आत्मविश्वास, पूजा रानी का अनुभव और जैमिनी की ऊर्जा यह बताती है कि महिला मुक्केबाजी में भारत की बेंच स्ट्रेंथ पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है। जब एक साथ कई वर्गों में पदक सुनिश्चित होते हैं तो इसका अर्थ केवल जीत नहीं होता। इसका अर्थ होता है कि एक पूरी प्रणाली खड़ी हो गई है।

फिर भी सच्चाई यह है कि लक्ष्य अभी दूर है। विश्व खेल महाशक्तियों ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और कनाडा के पास खेल विज्ञान, खेल मनोविज्ञान, चोट प्रबंधन और प्रतियोगिता संरचना का एक मजबूत तंत्र है। भारत अभी उसे विकसित कर रहा है। आज भी अनेक जिलों में गुणवत्तापूर्ण सिंथेटिक ट्रैक नहीं है। आधुनिक जिम, फिजियोथेरेपिस्ट और प्रशिक्षित कोचों का अभाव है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण अनेक प्रतिभाएं किशोरावस्था में ही खेल छोड़ देती हैं। यदि भारत को 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में 15 से 20 पदकों का लक्ष्य प्राप्त करना है तो केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। निजी क्षेत्र, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और पूर्व खिलाड़ियों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य होगी।

खेल केवल पदक नहीं देते। वे अनुशासन सिखाते हैं। वे नेतृत्व गढ़ते हैं। वे आत्मविश्वास देते हैं। वे राष्ट्रीय गौरव जगाते हैं। वे सामाजिक समरसता का निर्माण करते हैं। वे स्वस्थ नागरिकता की नींव रखते हैं। इसलिए खेल में निवेश केवल खिलाड़ियों पर निवेश नहीं है। यह राष्ट्र के भविष्य पर निवेश है। भारत आज विश्व का सबसे युवा राष्ट्र है। यही युवा शक्ति आने वाले तीन दशकों तक भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक पूंजी बनने वाली है। यदि यही ऊर्जा खेल, विज्ञान, अनुसंधान, नवाचार और राष्ट्रनिर्माण की दिशा में संगठित हो जाए तो भारत को विश्व नेतृत्व से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।

आज आवश्यकता केवल मेडल जीतने की नहीं है। आवश्यकता है ऐसी खेल संस्कृति विकसित करने की जिसमें प्रत्येक गांव प्रतिभा का केंद्र बने। प्रत्येक विद्यालय खेल का मंदिर बने। प्रत्येक प्रशिक्षक राष्ट्रनिर्माता बने। प्रत्येक खिलाड़ी करोड़ों युवाओं की प्रेरणा बने। जिस दिन यह वातावरण बन जाएगा उस दिन भारत पदक तालिका में स्थान खोजने वाला देश नहीं रहेगा। उस दिन अन्य राष्ट्र भारत को चुनौती मानेंगे।

ग्लासगो की उपलब्धियां एक घोषणा हैं कि भारत का युवा अब अवसर की प्रतीक्षा नहीं करता। वह अवसर का निर्माण करता है। उसके सपनों की गति 10.71 सेकंड से भी तेज है। उसका धैर्य 10,000 मीटर की लंबी दौड़ से भी अधिक है। उसका आत्मविश्वास किसी भी बाधा से बड़ा है। दिलीप गावित की जिद, गुलवीर सिंह की मेहनत, हरजिंदर कौर की निरंतरता और भारतीय महिला मुक्केबाजों की तैयारी यह प्रमाणित करती है कि प्रतिभा हमारे पास है, परिश्रम हमारे पास है, आत्मविश्वास हमारे पास है।

भारत का भविष्य किसी भविष्यवाणी का विषय नहीं है। वह उसके युवाओं के पसीने से लिखा जा रहा है। खेल के मैदान में बहने वाली प्रत्येक पसीने की बूंद, तिरंगे के सम्मान में जुड़ने वाला प्रत्येक पदक और राष्ट्रगान के साथ झुकने वाला प्रत्येक विश्व मंच इस बात का साक्षी है कि भारत का स्वर्णिम युग दस्तक दे चुका है। अब आवश्यकता केवल निरंतरता की है, दूरदृष्टि की है और सामूहिक संकल्प की है।

यदि हम अपने युवाओं की प्रतिभा को अवसर, विज्ञान, संसाधन और संस्कार से जोड़ सके तो आने वाला दशक केवल भारत का आर्थिक दशक नहीं होगा। वह भारत के खेल इतिहास का भी स्वर्णिम दशक होगा। तब विश्व भारत को जनसंख्या के कारण नहीं पहचानेगा। तब विश्व भारत को प्रतिभा के कारण पहचानेगा। परिश्रम के कारण पहचानेगा। उत्कृष्टता के कारण पहचानेगा। यही विकसित भारत की वास्तविक पहचान होगी।

ग्लासगो से उठी यह आवाज लॉस एंजिल्स तक जानी चाहिए। हर गांव के मैदान से यह संकल्प उठना चाहिए कि अगला 10.71 सेकंड हमारा होगा। अगला राष्ट्रीय रिकॉर्ड हमारा होगा। अगला पदक हमारे रंगों से सजेगा। क्योंकि जब 27 करोड़ युवा यह ठान लेते हैं कि वे केवल भाग नहीं लेंगे, वे नेतृत्व करेंगे, तब इतिहास रुक नहीं सकता। वह दौड़ता है। वह जीतता है। और वह तिरंगे को सबसे ऊंचा लहराता है।

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