विरेश तिवारी, जनतंत्र एवं स्तंभकार
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। हर गुजरते दिन के साथ भारत पदक तालिका में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। एथलेटिक्स, मुक्केबाज़ी, कुश्ती, बैडमिंटन, भारोत्तोलन और अन्य खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने जिस आत्मविश्वास और जुझारूपन का परिचय दिया है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत अब केवल प्रतिभाओं का देश नहीं, बल्कि खेल महाशक्ति बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
एक समय था जब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत की उम्मीदें कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों तक सीमित रहती थीं, लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। देश के लगभग हर राज्य से खिलाड़ी विश्व मंच पर तिरंगा लहरा रहे हैं। छोटे शहरों और गाँवों से निकले युवा खिलाड़ी यह साबित कर रहे हैं कि अवसर मिलने पर भारतीय प्रतिभा किसी भी देश से कम नहीं है।इस बार की प्रतियोगिता की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल पदकों की संख्या नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों का आत्मविश्वास है। अब भारतीय खिलाड़ी मैदान में उतरते ही विरोधियों पर मानसिक दबाव बना देते हैं। दुनिया की बड़ी-बड़ी टीमें भारत को चुनौती के रूप में देखने लगी हैं। यह परिवर्तन वर्षों की मेहनत, बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक खेल विज्ञान और खिलाड़ियों के प्रति बदलती सरकारी सोच का परिणाम है।
भारत सरकार की खेलो इंडिया, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) जैसी योजनाओं ने अनेक खिलाड़ियों को नई दिशा दी है। बेहतर कोच, अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण, पोषण, खेल चिकित्सा और आधुनिक सुविधाओं ने भारतीय खिलाड़ियों का स्तर ऊँचा किया है। निजी संस्थानों और कॉरपोरेट जगत की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है, जिससे खिलाड़ियों को आर्थिक मजबूती मिली है।लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेल मैदानों की कमी, प्रशिक्षित कोचों का अभाव, खेल चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य पर सीमित ध्यान तथा कई राज्यों में खेल सुविधाओं की असमान उपलब्धता जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं। यदि इन कमियों को दूर कर लिया जाए तो भारत आने वाले वर्षों में ओलंपिक सहित हर बड़े खेल आयोजन में शीर्ष देशों की श्रेणी में पहुँच सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक जिले में विश्वस्तरीय खेल अकादमी स्थापित हो, विद्यालयों में खेल को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान कम उम्र से ही शुरू की जाए। खिलाड़ियों को केवल पदक जीतने के बाद नहीं, बल्कि तैयारी के दौरान भी हर संभव सहयोग मिलना चाहिए।भारतीय खिलाड़ियों ने यह भी साबित किया है कि खेल केवल शारीरिक क्षमता का नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य और मानसिक दृढ़ता का भी नाम है। कई खिलाड़ियों ने कठिन आर्थिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया है। ऐसे खिलाड़ियों की जीवन यात्रा देश के करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है।
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जैसा कि मैं, विरेश तिवारी, वर्षों से लिखता रहा हूँ कि यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है तो शिक्षा, स्वास्थ्य और खेल—इन तीनों क्षेत्रों में समान रूप से निवेश करना होगा। खेल केवल पदक नहीं दिलाते, बल्कि स्वस्थ समाज, अनुशासित युवा और मजबूत राष्ट्र का निर्माण भी करते हैं। यही कारण है कि विकसित देशों ने खेलों को अपनी राष्ट्रीय नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
आज भारत के सामने अवसर है कि वह इस गति को बनाए रखे। यदि केंद्र और राज्य सरकारें, खेल महासंघ, निजी क्षेत्र और समाज मिलकर खिलाड़ियों को निरंतर सहयोग दें तो वह दिन दूर नहीं जब भारत कॉमनवेल्थ गेम्स ही नहीं, बल्कि ओलंपिक में भी शीर्ष देशों की सूची में स्थायी स्थान बना लेगा।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का यह प्रदर्शन केवल खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि नए भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह उस राष्ट्र की कहानी है जो हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है और दुनिया को अपनी क्षमता का परिचय दे रहा है। आज हर भारतीय खिलाड़ी के साथ पूरा देश खड़ा है और यही राष्ट्रीय एकता भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।आइए, हम अपने खिलाड़ियों का सम्मान करें, उनके संघर्ष को समझें और खेल संस्कृति को अपने परिवार, विद्यालय और समाज का हिस्सा बनाएँ।
क्योंकि आज का एक खिलाड़ी आने वाले भारत का प्रेरणास्रोत है, और आज का यह अभियान भविष्य के स्वर्णिम भारत की नींव रख रहा है।