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Updated: 01 October 2026 | Hindi News Portal
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मुंशी प्रेमचंद: जिनकी कलम ने भारत के अंतिम जन को आवाज़ दी

यदि भारत के करोड़ों किसानों, मजदूरों, दलितों, उपेक्षितों, विधवाओं, अनाथ बच्चों और अभावग्रस्त परिवारों को एक साथ बोलने का अवसर मिलता, तो उनकी सम्मिलित आवाज़ का नाम मुंशी प्रेमचंद होता। उन्होंने केवल कहानियाँ नहीं लिखीं, बल्कि उन लोगों का इतिहास लिखा जिनके आँसू कभी राजदरबारों तक नहीं पहुँचे।

आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क | Updated: 01 Aug 2026, 07:16 PM | Views: 0 | 3 मिनट पढ़ें
मुंशी प्रेमचंद: जिनकी कलम ने भारत के अंतिम जन को आवाज़ दी

डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक

यदि भारत के करोड़ों किसानों, मजदूरों, दलितों, उपेक्षितों, विधवाओं, अनाथ बच्चों और अभावग्रस्त परिवारों को एक साथ बोलने का अवसर मिलता, तो उनकी सम्मिलित आवाज़ का नाम मुंशी प्रेमचंद होता। उन्होंने केवल कहानियाँ नहीं लिखीं, बल्कि उन लोगों का इतिहास लिखा जिनके आँसू कभी राजदरबारों तक नहीं पहुँचे। उनकी कलम ने महलों की चमक नहीं, झोपड़ियों का अँधेरा देखा; राजाओं के वैभव का नहीं, किसान की फटी हथेलियों का वर्णन किया। यही कारण है कि प्रेमचंद केवल साहित्यकार नहीं, भारतीय जनमानस की अंतरात्मा हैं।

जिस समय भारत अंग्रेज़ी शासन और सामंती शोषण की दोहरी बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, उस समय साहित्य का बड़ा भाग कल्पना, श्रृंगार और मनोरंजन में उलझा था। प्रेमचंद ने उस परंपरा को तोड़ा। उन्होंने साहित्य को रेशमी कालीनों से उठाकर खेत की मेड़ पर बैठाया, अदालत की चौखट पर खड़ा किया, मजदूर की हथेली पर रखा और भूखी माँ की आँखों में उतार दिया। उनके लिए साहित्य का सबसे बड़ा पात्र वही था, जिसकी पीड़ा सबसे बड़ी थी।

'गोदान' का होरी केवल एक किसान नहीं, वह भारत की मिट्टी का चेहरा है। जीवनभर परिश्रम करने वाला यह व्यक्ति अपनी सबसे छोटी इच्छा—एक गाय—भी पूरी नहीं कर पाता। उसका संघर्ष बताता है कि गरीबी केवल धन का अभाव नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था का परिणाम है जिसमें श्रम करने वाला सबसे अधिक वंचित रह जाता है।

'पूस की रात' का हल्कू जब ठिठुरती रात में अपने खेत की रखवाली करते हुए काँपता है, तब पाठक केवल ठंड महसूस नहीं करता, बल्कि उस व्यवस्था की निष्ठुरता को भी महसूस करता है जिसने किसान से उसकी गरिमा तक छीन ली। 'ईदगाह' का नन्हा हामिद जब खिलौनों के स्थान पर अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है, तब प्रेमचंद पूरी मानवता को सिखा देते हैं कि प्रेम का मूल्य धन से नहीं, संवेदना से आँका जाता है।

'ठाकुर का कुआँ' और 'सद्गति' केवल कहानियाँ नहीं, भारतीय समाज के अंतरमन पर लगे वे आईने हैं जिनमें जातिगत अन्याय का कुरूप चेहरा स्पष्ट दिखाई देता है। वहीं 'निर्मला', 'सेवासदन' और 'बड़े घर की बेटी' यह सिद्ध करती हैं कि प्रेमचंद स्त्री को केवल करुणा की प्रतिमा नहीं, बल्कि समाज की नैतिक शक्ति मानते थे।

'नमक का दरोगा' में वंशीधर का चरित्र आज भी ईमानदारी का सर्वोच्च उदाहरण है। भारी रिश्वत का प्रलोभन ठुकराकर वे यह सिद्ध करते हैं कि चरित्र बिक सकता है—यह मान लेना ही सबसे बड़ा पतन है। अंततः उनकी सत्यनिष्ठा ही उन्हें सम्मान दिलाती है।

प्रेमचंद की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने समस्या बताकर हाथ नहीं खड़े किए। उन्होंने मनुष्य के भीतर छिपे विवेक, न्याय और करुणा को भी जगाया। इसलिए उनकी रचनाएँ निराशा नहीं, परिवर्तन का विश्वास जगाती हैं। उनकी भाषा विद्वानों की नहीं, जन-जन की भाषा थी। वे जानते थे कि जो साहित्य जनता की भाषा में नहीं बोलेगा, वह जनता के हृदय तक कभी नहीं पहुँचेगा।

आज समय बदल गया है, पर प्रश्न नहीं बदले। किसान आज भी संकट में है, बेरोज़गार युवा आज भी संघर्ष कर रहा है, सामाजिक विषमताएँ नए रूपों में उपस्थित हैं। इसलिए प्रेमचंद का साहित्य आज भी केवल पाठ्यक्रम का विषय नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शक है।

मुंशी प्रेमचंद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उन्होंने तीन सौ से अधिक कहानियाँ और अनेक कालजयी उपन्यास लिखे। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने भारतीय साहित्य को मनुष्य का साहित्य बना दिया। जब भी कोई अन्याय के विरुद्ध कलम उठाएगा, जब भी कोई लेखक अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज़ बनेगा, तब-तब प्रेमचंद जीवित रहेंगे। उनकी कलम की स्याही सूख चुकी है, पर उसके शब्द आज भी भारतीय समाज की धड़कनों में बह रहे हैं।

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Author: आज का मुद्दा डिजिटल डेस्क

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