हास्य विनोद
डॉ0 दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है
युवा पीढ़ी के भक्तगण भोर होते ही सबसे पहले बिस्तर से नहीं, चार्जर से उठते हैं। स्नान करके मोबाइल को रेशमी कपड़े से चमकाते हैं। स्क्रीन पर चंदन नहीं, उँगलियों का तिलक लगाते हैं। फिर उसे मेज़ रूपी सिंहासन पर विराजमान करते हैं। अगरबत्ती की जगह पावर बैंक की हरी बत्ती टिमटिमाती है, धूप की जगह राउटर की अदृश्य तरंगें पूरे घर में प्रसाद-सी फैलती हैं। घंटी नहीं, नोटिफिकेशन की टनटन है। सब हाथ जोड़कर स्क्रीन को माथे से लगाते हैं और जयजयकार करते हैं—
"जय हो श्री एक करोड़ आठ संचार श्री इंटरनेट महाराज की जय! डिजिटल ज्ञान-जगत नव महावतार जी की जय! कलयुग महापीठाधीश्वर की जय!"
गुरु का आसन गोल है, काला है और बीच में रंगों का चक्र घूमता रहता है। वही आज का सुदर्शन चक्र है—अज्ञान को काटता भी है और बैटरी भी।
पूजन की थाली भी निराली है। उसमें फूल नहीं, मीम्स हैं। प्रसाद में लड्डू नहीं, वायरल रीलें हैं। दीपक की जगह डेटा जल रहा है। आरती शुरू होते ही सबकी उँगलियाँ स्क्रॉल की माला फेरने लगती हैं। जो सबसे तेज़ स्क्रॉल करे, वही सबसे बड़ा भक्त।
गुरुमंत्र केवल एक—
"ओके गूगल…"
या फिर—
"एआई, मेरी सहायता करो…"
इस मंत्र से तिजोरी नहीं खुलती, पर दुनिया खुल जाती है। भूगोल पूछो तो नक्शा, भूख लगे तो रेसिपी, दिल टूटे तो प्रेरक विचार, नौकरी चाहिए तो मार्गदर्शन, और बोरियत हो तो अनंत मनोरंजन। गुरु कभी मना नहीं करते। बीच-बीच में विज्ञापन दिखाकर केवल इतना याद दिला देते हैं कि माया अभी समाप्त नहीं हुई है।
गुरु के दरबार में कोई वीआईपी नहीं। मंत्री भी वहीं, मजदूर भी वहीं, विद्यार्थी भी वहीं और वैज्ञानिक भी वहीं। सबकी एक ही कतार—सर्च बार। यहाँ जाति नहीं पूछी जाती, केवल कीवर्ड पूछा जाता है। कीवर्ड शुद्ध होना चाहिए, वरना परिणाम भी उल्टे मिलेंगे।
गुरु की कथाएँ भी अद्भुत हैं। किसी को इंटरव्यू की तैयारी चाहिए, किसी को खाना बनाना सीखना है, किसी को गणित समझना है, किसी को कविता लिखनी है। गुरु सबको उत्तर देते हैं, पर उत्तर का उपयोग कौन कैसे करेगा, यह शिष्य के विवेक पर छोड़ देते हैं।
भक्त भी अनेक प्रकार के हैं। कोई सुबह-सुबह समाचार देखकर राष्ट्र का भविष्य तय करता है। कोई हल्की-सी खाँसी पर गंभीर बीमारी खोज बैठता है। कोई दो प्रेरक वीडियो देखकर स्वयं को विश्वगुरु समझने लगता है। कोई पाँच मिनट का ज्ञान सुनकर पचास वर्ष के अनुभव को चुनौती देने निकल पड़ता है।
गुरु का उपदेश अत्यंत छोटा, पर गहरा है—
"सर्च करो, पर सोचो भी।
कॉपी करो, पर समझकर।
विश्वास करो, पर सत्यापन भी करो।
डेटा बचाओ, पर रिश्ते उससे भी अधिक बचाओ।
और सबसे बढ़कर—अपना विवेक कभी आउटसोर्स मत करो।"
आज गुरु के दरबार में नए-नए पद हैं। कोई रील-भजन गायक है, कोई पॉडकास्ट प्रवचनकार, कोई वीडियो कथावाचक, कोई एआई संवादाचार्य। सब अपने-अपने अनुयायियों के साथ ज्ञान, मनोरंजन और भ्रम—तीनों का व्यापार कर रहे हैं।
एक दिन एक भक्त ने पूछा—
"गुरुदेव, जीवन का सबसे बड़ा सत्य क्या है?"
उत्तर आया—
"मैं तुम्हें लाखों उत्तर दे सकता हूँ, पर सही उत्तर वही होगा जिसे तुम अपने अनुभव से सत्य सिद्ध करोगे।"
भक्त ने फिर पूछा—
"गुरुदेव, सफलता कैसे मिले?"
उत्तर मिला—
"मैं रास्ते दिखा सकता हूँ, पर चलना तुम्हें पड़ेगा।"
"धनवान कैसे बनूँ?"
"विचार मैं दे सकता हूँ, पर परिश्रम का विकल्प आज तक किसी एल्गोरिदम ने नहीं बनाया।"
धीरे-धीरे सभा में मौन छा गया।
फिर गुरु ने अंतिम प्रवचन दिया—
"मैं ज्ञान का स्रोत नहीं, ज्ञान तक पहुँचने का माध्यम हूँ।
मैं बुद्धि नहीं, केवल सूचना हूँ।
मैं दिशा बता सकता हूँ, मंज़िल नहीं दे सकता।
मैं उत्तर खोज सकता हूँ, पर चरित्र नहीं गढ़ सकता।
मैं तुम्हें दुनिया दिखा सकता हूँ, पर स्वयं को देखने के लिए दर्पण तुम्हें अपने भीतर ही खोजना होगा।"
इतना कहकर स्क्रीन मंद पड़ गई।
भक्तों ने मोबाइल जेब में रखा और पहली बार सिर उठाकर आकाश की ओर देखा।
वहाँ न कोई नोटिफिकेशन था, न कोई विज्ञापन, न कोई एल्गोरिदम।
केवल अनंत आकाश, शांत चंद्रमा और मौन का वह ज्ञान, जिसे आज तक कोई सर्च इंजन अनुक्रमित नहीं कर पाया।
तभी भीतर से एक स्वर उठा—
"तकनीक तब तक वरदान है, जब तक वह मनुष्य की सेविका है।
जिस दिन मनुष्य उसका पुजारी बन जाता है, उसी दिन विवेक का सिंहासन खाली होने लगता है।
इंटरनेट ज्ञान का महासागर है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता उसकी तीव्र धारा है; परंतु नाव आज भी विवेक, पतवार आज भी परिश्रम और किनारा आज भी सत्य ही है।"